‘एक तारा’ कविता का भाव सौंदर्य/मूल संवेदना : Ek tara kavita ka bhav saundarya/Mool samvedna


‘एक तारा’ कविता का भाव सौंदर्य/मूल संवेदना

‘एक तारा’ कविता छायावाद के अत्यंत प्रतिष्ठित एवं आधार स्तंभों में से एक कवि सुमित्रानंदन पंत के द्वारा रचित है। सुमित्रानंदन पंत को “प्रकृति के सुकुमार कवि” के नाम से भी जाना जाता है। अपनी कविताओं में प्रकृति के नानाविध रूपों का जो नवीनता एवं ताज़गी के साथ पंत ने चित्रांकन किया है, उसके लिए इन्हें यह उपमा दी जाती है। आलोचक इन्हें “हिंदी का वर्ड्सवर्थ” भी कहते हैं।


“एक तारा” प्रकृति के एक अनूठे एहसास का चित्रण करने वाली अत्यंत आकर्षक कविता है, जिसमें कवि ने आकाश के एक तारे के माध्यम से संध्या का चित्रण करने के साथ-साथ अकेलेपन को भी व्याख्यायित किया है।

शाम का समय है और पूरा ग्राम प्रांत शांत है। कवि का आशय है कि महानगरों में जीवन रात भर चलता रहता है, लेकिन गांव में आज भी शाम के साथ सारी गतिविधियां मद्धम पड़ जाती हैं। शाम में सारी वन-ध्वनियां शांत हो गई हैं, जैसे वीणा के तारों में स्वर सोये होते हैं। पंछियों का कलरव भी एकाकार होकर अब मंद पड़ने लगा है। गोधन वापस अपने खूंटे पर लग चुका है जिससे गोपथ की धूलि भी पुनः बिछ गई है। सारा कच्चा रास्ता (पगडंडियां) धूसर सदृश प्रतीत हो रहा है। शांति के इस वातावरण की पीड़ा को झींगुर का तीखा स्वर बेध कर सन्नाटे को और गहन बना रहा है।

कवि को शाम का यह शांत समय विभिन्न प्रकार के विचारों में डुबो रहा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो अभिलाषाओं की तीखी धार मानस पटल को बेध रही है। धीरे-धीरे शाम और गहराने लगी। गंगा के गतिशील और निर्मल लहरों में किरणों का लाल कमल (डूबते हुए सूरज का लाल रंग) अपने कोमल दलों को बंद कर चुका है। लालिमायुक्त आसमान सूर्यास्त के कारण कालिमामय हो चुका है। सूरज की सुनहरी किरणों की जगह जल पर एक नीली रेखा पड़ चुकी है। मानो शीत से प्रभावित लाल होंठ नील पड़ गए हों।

कवि ने पुनः सूरज को स्वर्ण विहग अर्थात डूबने के पूर्व सोने जैसे रंग के पक्षी के रूप में चित्रित किया है। रक्तोत्पल और स्वर्ण विहग सूरज के लिए नूतन उपमाएं हैं। यह सोने का पंछी पश्चिम की ओर जाकर जाने किस गुफा में छुप गया अर्थात अस्त हो गया! 

 शाम के गहराने के साथ-साथ वृक्षों की शिखाओं पर अंधकार की मृदुल चादर सी चढ़ गई, ऐसे में कवि को आकाश में पश्चिम दिशा में एक एकटक चमकता हुआ तारा दिखाई देता है। अब यहां से कवि एक अकेले तारे की विविध रूपों में कथा सुनाना प्रारंभ करते हैं, कवि तारे के सौंदर्य को देखकर अभिभूत हैं।

कवि को वह अकेला तारा अकलुष (स्वच्छ) अनिंद्य (बुराई से परे) ऐसा प्रतीत हो रहा मानो हृदय में विराजित विवेक शक्ति अनवरत प्रकाशित हो! कवि प्रश्नाकुल हैं और सोचते हैं कि वह किस ऐश्वर्य-अभिलाषा से संचालित है? वह किसके समीप किस लिए प्रकाशित है? एक अकेला चमकता तारा ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो वह चांदी का दीपक हो,जो अबाध आलोकित हो रहा हो! 

कवि को तारे का अकेलापन व्यथित भी करता है और चिंतित भी। कवि को लगता है कि इस अखिल संसार में अपनापन दुर्लभ है। सभी इतने अकेले हैं कि लगता है यह संसार जनशून्य है। कवि ने सानिध्य प्राप्ति के लिए निष्फल इच्छा शब्द का प्रयोग कर अकेले व्यक्ति को निर्धन बताया है।

 यहां तक आते-आते कवि के विचार तनिक और व्यक्तिगत एवं दार्शनिक हो जाते हैं। कवि बड़ी सुंदर बात कहते हैं कि अबाध इच्छाओं का आवेग विवेक रूपी बंधनों को नहीं मानता है। अविरत इच्छाओं से अभिभूत होकर ही सागर और लहरें अनवरत नाच रही हैं। यह सूरज, यह चांद, यह सितारे यह सब अपनी दुर्निवार कामनाओं के वशीभूत होकर चलायमान हैं। कवि अकेले तारे से फिर प्रश्न करते हैं कि उसके प्राण विकल क्यों हैं? क्या चुप-चुप जलकर नयन सजल है? जीवन इस तरह कितना निरर्थक होता है! कवि ने एकाकीपन की तुलना अंधकार से करते हुए इसके भाव को विषाद एवं असहनीय बताते हुए इस दुःख को सीमाहीन बताया है।

 सांध्यकालीन प्रकृति का सौंदर्य चित्रण और एक तारे के एकाकीपन का अंकन करने के बाद कविता की अंतिम पंक्तियों तक आते-आते कवि अस्तित्ववादी दर्शन से प्रभावित नज़र आते हैं।

अब कवि को तारा अकेला तो दिखता है परंतु व्यथित नहीं, बल्कि अपने आलोक के साथ मग्न दिखाई देता है। तारे को मायावी बंधनों से कोई मतलब नहीं,वह सागर की ऐसी मुक्त मीन है जो अपने सानिध्य में नित्य नवीन और प्रसन्न है। कवि को वह तारा दीपक की अटूट लौ के समान अतुलनीय लगता है, जो शुक्र तारे के समान संसार का अंधेरा नष्ट कर रहा है। कवि को एक तारा भंवरे की मधुर और तीखी ध्वनि-सा लगता है,जो संसार में अकेले प्राणी को थककर सोने पर नींद की लोरी सुना कर उसका बोझ कम कर दे! 

इसके उपरांत कवि ने दिखाया है कि आसमान का आँगन बादलों रूपी सुंदर कलियों से जगमगा उठा। यही अंततः स्वयं का और जग का दर्शन है कि एक समय के बाद हमारे आसपास का वातावरण सुंदर हो जाता है अथवा हमें समायोजन करना आ जाता है। 

इस प्रकार यह कविता एक तरफ जहां प्रकृति के रूपों का हृदयग्राही चित्रण करती है,वहीं दूसरी तरफ मानव जीवन की कुछ स्वाभाविक परिस्थितियों का चित्रण भी दार्शनिकता के साथ करती है। अंत में कवि अकेलेपन और एकांत के बीच के अंतर को रूपायित करने में सफल होते हैं। 

© डॉ. संजू सदानीरा 
विभागाध्यक्ष- हिन्दी साहित्य
मोहता स्नातकोत्तर महाविद्यालय सादुलपुर। 

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