गिरिजा कुमार माथुर की कविता ‘मिट्टी के सितारे’ की मूल संवेदना

 गिरिजा कुमार माथुर की कविता ‘मिट्टी के सितारे’ की मूल संवेदना


गिरिजा कुमार माथुर नई कविता के सुप्रसिद्ध कवि हैं। “वी शैल ओवरकम” का हिंदी अनुवाद “हम होंगे कामयाब” माथुर साहब ने ही किया था, जो एक अत्यंत लोकप्रिय एवं प्रेरणादाई कविता है। “नाश और निर्माण”, “धूप के धान” और “शिलापंख चमकीले” उनके प्रसिद्ध काव्य संकलन हैं।


मिट्टी के सितारे कविता के माध्यम से कवि गिरिजा कुमार माथुर ने कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए हैं। इस कविता में कवि ने संकेतात्मक शैली में आशावाद का स्वर बुलंद किया है। कवि को इस बात का अफ़सोस है कि हमेशा से घुल-मिलकर रह रहे लोग एकाएक अनजान बन गए। आपसी संपर्क के सभी दरवाजे बंद हो गए और पुराने संबंध टूट गए। कवि के मन में विचार आ रहा है कि यह कैसा समाज बन गया जिसमें वह अपने ही घर में पराए हो गए। संभवत कवि वैमनस्य और भय के उस वातावरण से व्यथित हैं,जो एक ही देश में अलग-अलग जीवन शैली और विचारधारा वाले लोगों के साथ हो रहा है। कवि को भेदभाव से भरी वह स्थिति भी नज़र आती है जिसमें देश की आधी आबादी दुख के अंधेरों में सिमटी है और शेष आधी सुखों की चकाचौंध में मगन है। यहां कवि को उस उम्मीद के लिए भी सराहा जाना चाहिए जहां वे इस अंधेरी रात के बाद सुबह के उजाले की बात कर रहे हैं। कवि जैसे जीवन को चुनौती देते हुए दिखाई दे रहे हैं कि वह जीवन की मिट्टी के सितारे मेहनतकश वर्ग हैं। बेशक वह राख के समान दिखाई दे रहे होंगे परंतु असल में वह राख के अंदर छिपे हुए अंगारे हैं। शोषक वर्ग को सावधान करते हुए कवि लिखते हैं कि अपने शोषण के विरुद्ध बोलने की जो शक्ति श्रमिकों ने अपने हृदय में छुपा रखी है वही कालांतर में शोषण की उस व्यवस्था को ध्वस्त करती है। 


आगामी पंक्तियों में कवि व्यक्ति-चेतना की शक्ति के प्रति आश्वस्ति दिखाते हुए बोलते हैं कि नेतृत्व शक्ति से संपन्न एक अकेला व्यक्ति भी सूर्य की तुलना में कदाचित मानवता का मार्ग अधिक  प्रशस्त कर सकता है। एक अकेले व्यक्ति की ताकत कवि ने कम नहीं आंकी है क्योंकि एक अकेली चिंगारी संपूर्ण वन खंड को जला सकती है।


कठिनाइयां सर उठाकर सामने खड़ी है। पैरों में थकान है,दीपक की लौ भी मद्धम है मंज़िल पर भी शत्रुओं की निगाह है।अर्थात समस्याएं चहुमुखी हैं  लेकिन इरादे बुलंद हैं और थोड़े और परिश्रम के बाद जीत सुनिश्चित है।


अंतिम पंक्तियों में कवि बताते हैं कि दिखाई देती हुई व्यवस्था के इर्द-गिर्द ही सर्वाधिक अव्यवस्था होती है और पूंजीवाद के सहारे अनीति बलवती होती है। इन सब के बाद भी कवि को इंसानी संकल्प शक्ति पर आस्था है और वह मानते हैं कि शीर्ष पर बैठे व्यक्ति अगर व्यवस्था को दुरुस्त नहीं करेंगे तो जन समूह स्वयं उसे ठीक कर देगा।


इस प्रकार गिरिजा कुमार माथुर की यह कविता न सिर्फ़ प्रासंगिक है बल्कि वर्तमान दौर में अनेक निहितार्थ लिए हुए है।


© डॉ. संजू सदानीरा

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