धूमिल द्वारा रचित ‘मोचीराम’ कविता की मूल संवेदना

 धूमिल द्वारा रचित ‘मोचीराम’ कविता की मूल संवेदना


धूमिल का नाम हिंदी साहित्य की साठोत्तरी कविता में उल्लेखनीय योगदान के लिए लिया जाता है। धूमिल की कविताओं के बिना हिंदी कविता का प्रमुख विकास और बदलते तेवर को चिन्हित करना अधूरा है। आम आदमी की ज़ुबान में समाज की विद्रूपता को बड़ी सच्चाई के साथ उन्होंने उजागर किया है। “संसद से सड़क तक”, “कल सुनना मुझे” एवं “सुदामा पांडे का गणतंत्र” उनके प्रमुख काव्य संकलन हैं।


‘मोचीराम’ धूमिल की एक अत्यंत चर्चित एवं मार्मिक कविता है । कवि और चर्मकार (मोची) के बीच की बातचीत और इस पेशे से जुड़े हुए व्यक्ति की मनःस्थिति का अनावरण कविता अत्यंत गहराई से करती है।


कवि लिखते हैं कि रांपी (चमड़ा काटने का औजार) को हाथ में लिए हुए मोची की आंखों ने चेहरा ऊपर कर ग्राहक के रूप में खड़े कवि को देखा और विश्वास भरे स्वर में हंसकर बताया कि उसकी नज़र में कोई छोटा या बड़ा नहीं बल्कि हर आदमी एक जोड़ी जूता है, जो उसके सामने मरम्मत के लिए खड़ा है। यहां आशय यह है कि व्यक्ति अपने आप में बेशक एक संपूर्ण इकाई है परंतु वह समाज से निरपेक्ष नहीं है। हर व्यक्ति किसी भी पेशे से जुड़े दूसरे व्यक्ति के लिए उपभोक्ता अथवा कमाई का ज़रिया है। कविता बड़ी सांकेतिक है। “आजकल कोई आदमी जूते की नाप से बाहर नहीं है” पंक्ति गहरा निहितार्थ रखती है।


अभावग्रस्त व्यक्ति के जूते ठीक करते वक़्त वैसे ही दूसरे व्यक्ति (मोची) का ध्यान पूरी तरह मानवता से युक्त रहता है। उसे महसूस होता है कि जर्जर फटे जूते पर लगाए जाने वाला हर टांका जूता पहनने वाले व्यक्ति पर लगता है। कवि ने मोची के माध्यम से अलग-अलग आर्थिक स्थिति एवं मनोवृत्तियों वाले लोगों की खबर ली है। मोची के सामने ऐसा जूता भी आता है जो पूरी तरह फटा है और उसके ऊपर लगे ढेर सारे पैबंदों की तुलना चेचक वाले चेहरे से की है। जूते के चलने लायक बनने की उम्मीद वैसे ही है, जैसे टेलीफोन के खंबे पर फँसी पतंग का किसी बच्चे को मिलना। इस कदर फटे जूते को ठीक करने से पहले मोची जूते पहनने वाले को कहना चाहते हैं कि इस पर पैसे फेंकना व्यर्थ है लेकिन वह ऐसा कह नहीं पाता उसे अपने और उस ग्राहक की जाति (गरीबी) एक ही दिखाई देती है और तब करुणा से भरे हुए उसके हाथ जूते पर चकत्तियों की जगह मानो अपनी आंखें टाँकते हैं। ऐसा करके वह पेशेवर हुनर को पीछे रखते हैं। अब जूते पहने वाले एक नकचढ़ी व्यक्ति की बात करते हुए बताया गया है कि वह जूते आराम से नहीं बल्कि ऐसे पहनता है जैसे उसकी नकेल कसी हो। कविता में एक ऐसे रईस व्यक्ति की बात की गई है जो ज़ाहिल और कठोर है। जूता ठीक कराते समय पूरी फरमाइश लगाता है और मजदूरी देते समय पीछे हट जाता है। मोची की वाजिब मजदूरी से कम देकर उसे शरीफ़ों को ठगने वाला बताने पर आगे बढ़ने पर अचानक जूते से कोई कील चुभती है। यह पेशे पर पड़ी हुई चोट का एक प्रकार से प्रतिकार होती है। मोची को हर समय इस बात को ख़याल रहता है कि जूते और पैरों के बीच हमेशा एक आदमी फंसा होता है तो जूते के फटने का दर्द और और ठीक किए जाने की चोट अपनी छाती पर सहता है। धूमिल ने अपनी आदत के मुताबिक इस कविता में भी आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करके अपनी बात को स्पष्ट किया है। 


कविता के माध्यम से वह बताते हैं कि इंसान के पास अगर जीवित रहने का सार्थक उद्देश्य नहीं है और उसे हर बात को लाभ-हानि की दृष्टि से ही देखने की आदत है तो मानव तस्करी और धर्म के धंधे में कोई फ़र्क नहीं है। पेशे के अलावा भी मनुष्य बहुत कुछ होता है। मौसम, सर्दी-गर्मी और ऋतुओं का प्रभाव सबको अपनी तरफ आकर्षित करता है। कविता में कवि ने वर्ण-व्यवस्था, जाति-व्यवस्था और वर्ग आधारित भेदभाव को भी चिन्हित किया है। बसंत ऋतु की सुंदरता को कवि ने बिल्कुल अछूते अंदाज़ में चित्रित किया है। वसंत में धुंध समाप्त हो चुकी होती है और पेड़ों पर बड़े-बड़े लाल फूल इस तरह दिखाई देते हैं मानो आसमान पर चंदोवा तना है और लाल-पत्तों वाली हजार झालरों को धूप में पकने के लिए छोड़ दिया गया हो!


कवि कहते हैं कि ऐसे मायावी मौसम में रांपी को संभालना मोची के लिए मुश्किल हो जाता है। झुंझलाया हुआ बच्चा जैसे स्कूल जाने से कतराता है, वैसे ही मोची का मन भी ऐसे सुहाने मौसम में काम पर जाने से इनकार करता है। ऐसा लगता है मानो कुल्हाड़ी से पेड़ पर वार करने की तरह पेड़ कवि के मन पर वार कर रहे हैं। पेशे की मजबूरी और जंगल का सौन्दर्य है कवि के मन में ज़ंग कर रहे हैं। सुनने में यह बात बड़ी अजीब लग सकती है, मगर यह चौंकने की नहीं सोचने की बात है। जो लोग ज़िंदगी को अनुभव से नहीं सिर्फ़ किताबों से जानते हैं उनके लिए मोची का बसंत ऋतु पर मोहित होना हैरतअंगेज हो सकता है। ऐसे लोग मोची की तुलना शायर से कर सकते हैं, जबकि सच तो यह है कि एक ही व्यक्ति मोची और शायर दोनों हो सकता है। जिनकी सोच में अब तक यह बात नहीं आ पाई है वह एक प्रकार की अल्पज्ञता अथवा ग़लतफहमी का शिकार है कि हर पेशा एक जाति है और शेर- ओ- शायरी की भाषा पर एक दूसरी जाति-विशेष का अधिकार है।


दूसरी तरफ सच तो यह है कि आग की प्रकृति अगर जलाना है तो वह भेदभाव नहीं करती। ठीक उसी तरह बसंत ऋतु की मादकता अगर मोह सकती है तो कोई भी इससे मोहित हो सकता है। सभ्यता की यात्रा में कुछ लोगों को अभिव्यक्ति की सुविधा बहुत पहले मिल गई तो इन्हीं के कारण बहुतों तक यह सुविधा नहीं पहुंच पाई। पढ़ना जानने के बावजूद पेशेगत लाचारी ने एक बहुत बड़े समुदाय को बोलने से वंचित रखा। यह इकट्ठी चुप अपने आप में अपनी अभिव्यक्ति के लिए तैयार हो रही है। कवि ने इनकार से भरी हुई एक चीख और, एक समझदार चुप दोनों का गंभीर निहितार्थ संकेतित किया है। उनके अनुसार अन्याय आधारित (कु)व्यवस्था का ध्वंस करने में और समानतायुक्त समाज का निर्माण करने में इस चुप और चीख का अपनी-अपनी जगह बराबर योगदान है।


इस प्रकार साठोत्तरी कविता के प्रमुख कवि धूमिल ने ‘मोचीराम’ कविता के माध्यम से एक साथ अलग-अलग कई महत्त्वपूर्ण बातों को विमर्श के अंदाज में उठाते हुए अपनी लिखने की सार्थकता सिद्ध की है।


© डॉ. संजू सदानीरा 

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