नरेश मेहता द्वारा रचित कविता “माँ “का भावार्थ

 नरेश मेहता द्वारा रचित कविता “माँ “का भावार्थ


नरेश मेहता नयी कविता के अत्यंत महत्वपूर्ण कवियों में गिने जाते हैं। अज्ञेय द्वारा सम्पादित “दूसरा सप्तक’ के कवियों में नरेश मेहता भी थे। ”वन पाखी सुनो”, ‘बोलने दो चीड़ को’, मेरा समर्पित एकांत, उत्सवा इत्यादि इनके काव्य संकलन हैं।संशय की एक रात, महाप्रस्थान, प्रवाद पर्व, प्रार्थना पुरुष, शबरी एवं चैत्या इत्यादि इनके खंडकाव्य हैं। नरेश मेहता द्वारा रचित “माँ” एक अत्यंत भावपूर्ण कविता है। कविता आकार में छोटी परन्तु विषयगत रूप से अत्यन्त विस्तृत है। कवि की दृष्टि में माँ होने का अर्थ महज़ शारीरिक बनावट न होकर स्वभावगत वैशिष्ट्य है।


कवि कहते हैं कि वो नहीं जानते कि माँ कौन है क्योंकि उन्होंने उसे कभी देखा नहीं लेकिन कुछ क्रियाकलाप ऐसे हैं जो जहाँ भी है, वहाँ माँ है।कवि के अनुसार जहाँ भी कच्चे आंगन को गोबर से लिपा जाता है, जहाँ भी द्वार पर कोई आटे और कुमकुम से अल्पना बनाता है,जहां भी कोई लोहे की कड़ाई में मेथी के साग को छौंकता है,वहाँ माँ का होना दिखता है।


आख़िरी पंक्ति तक तक आते-आते कविता और भी अर्थपूर्ण हो जाती है। कवि लिखते हैं कि दूर तक रास्ता निहारने वाली चिंता भरी आँखे जहाँ भी टकटकी लगाए दिखती हैं, वहाँ माँ होती है और ग़ौरतलब बात है कि माँ के लिए कवि ने स्त्रीलिंग क्रियाओं का प्रयोग नहीं किया है। गोया माँ होना शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक स्थिति है। यह कविता विमर्श के लिए एक संभावना रखती है। घर की सार संभाल करने के लिए, भोजन पकाने के लिए और किसी के प्रति चिंतातुर होकर प्रेम से भरने के लिए स्त्री या माँ होना जरूरी नहीं है,बस इंसान होकर हम ये सब कर सकते हैं।


कवि ने कदाचित माँ को नहीं देखा लेकिन माँ जैसे काम करने वाले दूसरे लोगों को निश्चय ही देखा होगा। कवि का मन्तव्य व्याख्याकार के मन्तव्य से भिन्न भी हो सकता है।लिखने वाले,पढ़ने वाले और व्याख्या करने वाले के मानसिक स्तर में निश्चित रूप से भिन्नता हो सकती है लेकिन किसी भी तरह से यहाँ अर्थों का अतिक्रमण नहीं होता है। कवि ने स्वयं अपने कृतित्व में इसकी गुंजाइश छोड़ी है। 

 

इस प्रकार यह कविता न सिर्फ़ माँ की भूमिका को स्पष्ट करती है, वरन लघु आकार के बावजूद भावनात्मक अर्थ की कई परतें खोलती है। 


© डॉ. संजू सदानीरा



नरेश मेहता

 “माँ”


मैं नहीं जानता पर,

क्योंकि नहीं देखा है कभी-

पर, जो भी

जहाँ भी लीपता होता है

गोबर के घर-आँगन,

जो भी

 जहाँ भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है 

आटे-कुंकुम से अल्पना,

जो भी 

जहाँ भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है 

मैथी की भाजी,

जो भी 

जहाँ भी चिंता भरी आँखें लिये निहारता होता है

 दूर तक का पथ- 


वही,

हाँ, वही है माँ !!

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