मैथिलीशरण गुप्त रचित कैकेयी परिताप की मूल संवेदना

मैथिलीशरण गुप्त रचित कैकेयी परिताप की मूल संवेदना

“कैकेयी परिताप” अपने आप में कोई स्वतंत्र रचना न होकर मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित “साकेत” महाकाव्य का एक अंश है। “कैकेयी परिताप” “साकेत” महाकाव्य के अष्टम सर्ग से उद्धृत है।


इस हिस्से में राम के वन गमन को लेकर कैकेयी के ग्लानि-भाव को गुप्त जी द्वारा अत्यंत मार्मिकता के साथ दिखाया गया है। गुप्त जी ने ऐसे पौराणिक स्त्री पात्रों की तरफ हमारा ध्यान आकृष्ट किया है, जिन्होंने अब तक साहित्य और जन-मानस में अपेक्षित स्थान नहीं पाया था। ऐसे पात्रों में कैकेयी,उर्मिला,यशोधरा और विष्णुप्रिया का नाम देखा जा सकता है।


“कैकेयी परिताप” अर्थात कैकेयी के मन का पश्चाताप दिखाना इस अंश का मूल काम है इसलिए यह शीर्षक उपयुक्त है। “तदनंतर बैठी सभा उटज के आगे” की चित्रात्मकता के साथ इस अंश का प्रारंभ होता है। वातावरण निर्माण में कवि का बिंबात्मक सौंदर्य प्रशंसनीय है। श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ वन में कैकेयी की इच्छानुसार जा चुके हैं। 


देवासुर संग्राम में अपने अतुलिनीय पराक्रम से महाराज दशरथ के प्राण बचाने के कारण दशरथ द्वारा मुंह मांगा वरदान मांगने का आग्रह कैकेयी से किया गया। कैकेयी ने समय आने पर मांग लेने का कह कर बात को वहीं विराम दिया। बाद में राम के राज्याभिषेक के समय कैकेयी ने अपने दोनों वरदान महाराज दशरथ से मांग लिए। पहला कि भारत राजगद्दी पर बैठे और दूसरा कि राम 14 वर्ष के लिए वन गमन करें। वचन पूरा करने की बाध्यता के कारण दशरथ को झुकना पड़ा। दशरथ राम का वियोग सहन नहीं कर पाए और उसी दुख में काल कवलित हो गए। उधर भरत और शत्रुघ्न ननिहाल गए हुए थे। वापस आते ही भरत ने सारी स्थितियों को देखकर अत्यंत दुख और क्रोध प्रकट किया। मां कैकेयी के प्रति भरत अत्यंत कठोर हो गए और उन्हें अत्यंत कटु बातें कही।


दरअसल कैकेयी देवताओं के षड्यंत्र का शिकार हुई थी। देवता चाहते थे कि किसी भांति यह राज्याभिषेक रुक जाये,राम वन गमन करें और वहाँ वे रावण से युद्ध करके उसका संहार करें। इस हेतु हुई देवताओं की मंत्रणा में देवी सरस्वती को इसके लिए राजी किया गया। महारानी कैकेयी की मुंहलगी दासी मंथरा की जीभ पर विराज कर सरस्वती ने जो कुछ कहलाया था, उसने अपना काम कर दिया था। कैकेयी राम को वन में भेजने का निमित्त बनी और युगों-युगों तक भर्त्सना का शिकार हुईं। 


विवेक प्राप्ति के बाद कैकेयी भरत एवं अयोध्यावासियों के साथ वन में जाकर राम के समक्ष अयोध्या वापसी के लिए विनय करती हैं। कैकेयी अपने आप को बहुत लांछित करती हैं। भरत के द्वारा भी मां का बार-बार अपमान प्रदर्शित होता है। राम पूर्णतया शांतचित्त रहते हुए मां कैकेयी और भ्राता भरत की बात सुनते हैं और उनके संतप्त हृदय को सांत्वना देते हैं। देवताओं के षड्यंत्र द्वारा बनी इस संपूर्ण स्थिति के लिए भरत कैकेयी को एवं कैकेयी मंथरा को दोष देती है और कहती है कि अगर उन्हें भरत ने उकसाया हो तो वह पति के समान पुत्र से भी वंचित हो जाए। वह अपने मन को भी कोसती है कि वह उनका साथ छोड़ गया और लालच में आ गया। अत्यंत द्रवित स्वर में कैकेयी कहती हैं कि आज तक पुत्र कुपुत्र हो सकता था पर माता कुमाता नहीं, दुर्भाग्य से अब लोग कहेंगे कि पुत्र पुत्र ही रहा लेकिन माता कुमाता हो गई। 


कैकेयी कहती हैं कि उन्होंने भरत का बाहरी कोमल व्यक्तित्व ही देखा उसके चरित्र की दृढ़ता नहीं देखी। युग-युग तक अब रघुकुल की इस अभागन रानी की चर्चा होती रहेगी। ऐसा कहकर वह अपनी पीड़ा दर्शाती हैं। उनका आर्तनाद और सच्चा पश्चाताप देखकर राम के साथ-साथ सारी सभा ने एक ही उद्घोष किया कि जिस मां ने भरत सम भ्राता जना, वह सौ-सौ बार धन्य हैं। मां कैकेयी ‘लाल’ कहकर स्वयं ही लज्जित हो जाती है। जो ‘लाल’ ( भरत)सबका प्रिय है आज अपने स्वार्थ से उन्होंने उसे भी गंवा दिया। “श्रीखंड आज अंगार चंड है” अर्थात इतना शांत चित्त भरत आज अपनी मां पर कुपित है। मोह के मद में (स्वार्थ के सागर में) डूब कर उन्होंने वही किया,जो लोभवश लोग करते हैं।


 कैकेयी की मर्मांतक पीड़ा से कौशल्या ने उन्हें संभाला और याद दिलाया कि कैसे आधी रात को राम की नींद टूट जाती थी तो फिर उन्हें कैकेयी ही सुला सकती थी। “देवों की ही नहीं दैत्यों की दुर्वृत्ति भी चलती है” ऐसा जब कैकेयी कहती है तो दैत्य सर धुनते हैं क्योंकि इस बार भी षड्यंत्र देवताओं का था। 


कैकेयी की अत्यंत पीड़ा है कि उन्हें अपयश का पात्र बनना पड़ा। कैकेयी को अपना वह पूर्व रूप भी याद आया जिसमें वह अनुशासन की प्रतिमूर्ति थी। सब उनके अनुसार चलते थे। आज वही स्वयं के समक्ष नतमस्तक हैं क्योंकि स्वविवेक पर से उनका नियंत्रण हट गया था। वह राम से बार-बार अयोध्या लौट चलने का आग्रह करती हैं। उन्हें पिता के तर्पण की दुहाई देती हैं। राम कहते हैं कि वे वापस अयोध्या भी आएंगे पहले वह उनका एक आदेश पूरा कर लें फिर दूसरा भी कर लेंगे। राम मां को मना लेते हैं। कैकेयी की आत्मग्लानि सभी को द्रवित कर देती है।

इस प्रकार “कैकेयी परिताप” कैकेयी की मनःस्थिति और मनोव्यथा को पूरी तरह स्पष्ट करने में सफल रहता है। लोक में “साकेत” के माध्यम से कैकेयी के प्रति एक नवीन करुण दृष्टि पैदा होती है। पौराणिक चरित्र कैकेयी के प्रति लोगों को जो शिकायत है उसे “साकेत” का वर्णन किंचित कम करता है।


© डॉ. संजू सदानीरा

Leave a Comment