राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस ; इतिहास, महत्त्व, चुनौतियाँ और संभावनाएँ : National Panchayati Raj Day in Hindi

राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस ;  इतिहास, महत्त्व, चुनौतियाँ और संभावनाएँ : National Panchayati Raj Day in Hindi

Panchayti raj day


 हमारा देश दुनिया के सबसे बड़ा लोकतंत्र के तौर पर जाना जाता है। लोकतंत्र की मूल अवधारणा है- जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा शासन। हमारा देश बहुत बड़ा और विविधतापूर्ण देश है। यहां अलग-अलग समुदाय के लोग एक साथ रहते हैं, अनेकता में एकता ही इसकी पहचान है। यहां पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक भाषा और संस्कृति बदलती रहती है। इसलिए केंद्र स्तर पर एक सरकार के द्वारा पूरे देश में स्थानीय स्तर तक शासन चलाने में बहुत सारी प्रशासनिक अव्यवस्था होती थी। इसे दूर करने और विकेंद्रीकरण की अवधारणा को आकार देने के लिए पंचायत का गठन किया गया। पंचायती राज व्यवस्था स्थानीय स्वशासन का ही एक मूर्त रूप है। इसे चिन्हित करने के लिए प्रतिवर्ष 24 अप्रैल को देशभर में राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के तौर पर मनाया जाता है। 


ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य 

पंचायती राज की अवधारणा बलवंत राय मेहता की थी। सामुदायिक विकास कार्यक्रम की जांच करने और उसको और बेहतर बनाने के लिए भारत सरकार द्वारा बलवंत राय मेहता समिति का गठन 16 जनवरी 1957 को किया गया था। समिति ने 24 नवंबर 1957 को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में पंचायती राज व्यवस्था से जुड़े प्रावधान थे। समिति का सुझाव यह था कि स्थानीय लोगों की समस्याओं को स्थानीय स्तर पर ही हल किया जाना चाहिए। इस समिति की सिफारिश पर 2 अक्टूबर 1959 को पहली बार पंचायती राज व्यवस्था का प्रारंभ किया गया। राजस्थान (नागौर) पंचायती राज व्यवस्था प्रारंभ करने वाला पहला राज्य बना। हालांकि इस समय तक संविधान में इसके बारे में कोई प्रावधान नहीं किया गया था। वर्तमान में राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस 24 अप्रैल को मनाने जाने के पीछे ऐतिहासिक कारण है। 24 अप्रैल ही वह दिन था जब 73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1993 में लागू किया गया था। पंचायती राज के उचित प्रशासन और प्रबंधन के लिए पंचायती राज मंत्रालय का गठन 2004 में किया गया। प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायत राज दिवस मनाने का प्रारंभ 2010 में हुआ। इसके बाद इसे प्रत्येक वर्ष देश भर में मनाया जाने लगा।


संवैधानिक प्रावधान 

पंचायती राज का उल्लेख भारतीय संविधान की अनुसूची 11 के भाग 9 में अनुच्छेद 243 में वर्णित है। इसमें कुल 29 विषय हैं। स्थानीय स्वशासन के रूप में पंचायत का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग 4 में नीति निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत भी है। अनुच्छेद 40 राज्य यानी सरकार को ग्राम पंचायतों को स्वशासन की इकाईयों के रूप में संगठित करने के लिये निर्देश देता है। जबकि अनुच्छेद 246 में राज्य विधानमंडल को स्थानीय स्वशासन/पंचायत से संबंधित विषयों पर क़ानून बनाने का अधिकार दिया गया है। ग़ौरतलब है कि भारत के संविधान में नीति निर्देशक सिद्धांतों की अवधारणा आयरलैंड से ली गई है। 


पंचायती राज व्यवस्था 

भारत में मूल रूप से त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का प्रावधान है, यह ग्राम, ब्लॉक और जिला के आधार पर विभाजित किया गया। 20 लाख से अधिक जनसंख्या वाले राज्य में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई है। इसमें सभी सीटों पर प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से निर्वाचन का उपबंध है। पंचायती राज में महिलाओं को 33% आरक्षण का प्रावधान है। इसके अलावा अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुसार रोटेशन प्रणाली निर्धारित की गई है, जिससे इनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है। पंचायत का सदस्य या अध्यक्ष बनने के लिए न्यूनतम उम्र 25 वर्ष है जबकि इसके लिए 18 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज़ कर मतदान कर सकते हैं। आमतौर पर पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष होता है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर इसे समय से पहले भी भंग किया जा सकता है। पंचायत के राजस्व का स्रोत राज्य के राजस्व से बजट आवंटन और कुछ अन्य स्थानीय कर हैं। पंचायती राज अधिनियम सामाजिक-सांस्कृतिक और प्रशासनिक कारणों से नागालैंड, मेघालय, मिज़ोरम और कुछ अन्य क्षेत्रों में लागू नहीं होता है। 


चुनौतियां

पंचायती राज सत्ता के विकेंद्रीकरण पर आधारित है जिसमें शासन में सभी वर्गों की भागीदारी हो। लेकिन इसकी राह में बहुत सारी चुनौतियां हैं। पंचायत स्तर पर सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाएं बनाने और उनके क्रियान्वयन में वित्तीय कमी एक बड़ी समस्या है। इसके अलावा सामूहिक निर्णय लिए जाने के लिए सहमति प्राप्त करना भी मुश्किल होता है। जातिवाद, भ्रष्टाचार और लैंगिक पूर्वाग्रहों की वज़ह से विकास कार्यों को लागू करने में असुविधा का सामना करना पड़ता है। 33% आरक्षण से महिलाओं को सरपंच बनने का मौका तो मिल जाता है लेकिन उन्हें खुलकर निर्णय लेने के लिए ज़रूरी माहौल नहीं मिल पाता। कई बार लैंगिक पूर्वाग्रह के चलते इन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है तो बहुत बार पति या अन्य पुरुष रिश्तेदारों का अनावश्यक दख़ल इन्हें ठीक से काम करने नहीं देता। इसके अलावा कोई न्यूनतम शैक्षिक योग्यता न होने से कई बार प्रशासनिक क्षमता और जागरुकता में कमी पाई जाती है जिसकी वजह से नियमों का पालन और कर्तव्यों का प्रभावी निर्वहन नहीं हो पाता।


संभावनाएं 

हालांकि पंचायती राज व्यवस्था पूरी तरह से अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में अभी तक सफल नहीं हो पाई लेकिन स्थानीय स्वशासन और सत्ता के विकेंद्रीकरण की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। संवैधानिक दर्जा देने से पंचायतों में महिलाओं एवं वंचित वर्गों की भागीदारी बढ़ी है। महिला प्रतिनिधियों में भी शिक्षा और जागरुकता बढ़ने से आत्म चेतना विकसित हो रही है। डाउन टू अर्थ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, महिला प्रमुख होने पर पंचायतों में विकास कार्यों में तेजी आई, साथ ही भ्रष्टाचार में भी कमी देखी गई। महिला सरपंच के तौर पर इन्होंने ईमानदारी और पारदर्शिता के लिए एक बेहतरीन पैमाना भी सेट किया और तुलनात्मक रूप से महिलाएं ज़्यादा बेहतर सरपंच साबित हुईं। इसी तरह अन्य वंचित वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने से इनकी राजनीतिक और सामाजिक प्रस्थिति में भी सुधार आया। आवश्यकता है स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव की, जिसमें धन बल और बाहुबल का न्यूनतम इस्तेमाल हो और सही प्रतिनिधि चुने जाएं। इससे ये स्थानीय स्तर पर प्रशासन में अपना योगदान सुनिश्चित कर सकेंगे जो कि अंततोगत्वा देश के विकास में सहायक सिद्ध होगा। इसके लिए पंचायती राज दिवस एक बेहतर अवसर साबित हो सकता है।



© प्रीति खरवार 

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