राष्ट्रीय पोषण सप्ताह : National nutrition week; theme; importance


राष्ट्रीय पोषण सप्ताह : National nutrition week

 रोटी, कपड़ा और मकान मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं हैं। इसमें भी रोटी का स्थान पहले नम्बर पर है। भोजन न सिर्फ़ मनुष्य बल्कि सभी जीवों के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। यह न सिर्फ़ सार्वभौमिक है, बल्कि सर्वकालिक भी है। पोषण का महत्त्व देश, स्थान, काल और परिस्थिति के अनुसार बदलता नहीं, सिर्फ़ इसका स्वरूप बदल जाता है। यहां पोषण से तात्पर्य महज़ पेट भरना नहीं है, बल्कि ऐसे संतुलित आहार से है, जो व्यक्ति को अपने कार्यों को समुचित तरीके से पूरा करने के लिए ऊर्जा तथा जीवन के लिए ज़रूरी पोषक तत्त्वों का बंदोबस्त करता है। पोषण भोजन को ग्रहण करने, उसे ऊर्जा और जीवन के लिए आवश्यक अन्य महत्त्वपूर्ण पोषक तत्वों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है। पोषण की महत्ता की वजह से प्रतिवर्ष सितंबर माह को पोषण माह एवं इसका प्रथम सप्ताह 1 से 7 सितंबर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के खाद्य एवं पोषण बोर्ड द्वारा देश भर में पोषण सप्ताह के नाम से मनाया जाता है।


ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य-

अमेरिकन डायटेटिक्स असोसिएशन (वर्तमान नाम एकेडमी ऑफ़ न्यूट्रिशन एंड डायटेटिक्स) ने मार्च 1975 में पोषण के बारे में जागरुकता फैलाने के मकसद से पोषण सप्ताह मनाया था। इसके बाद दुनिया के विभिन्न देशों ने इस विचार को अपनाया। भारत ने भी 1980 में पहली बार पोषण दिवस मनाया और 1982 में अभियान के रूप में राष्ट्रीय पोषण सप्ताह शुरू करने का फ़ैसला किया। इसमें लोगों को पोषण के बारे में जागरुकता और स्वस्थ जीवन शैली अपनाने के लिए जानकारी दी जाती है।


वर्तमान परिदृश्य-

भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के खाद्य एवं पोषण बोर्ड द्वारा देश भर में सितंबर माह पोषण माह के रूप में और सितंबर का पहला हफ्ता 1 से 7 सितंबर पोषण सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष 2023 में राष्ट्रीय पोषण सप्ताह की थीम है- “सुपोषित भारत, साक्षर भारत, सशक्त भारत”। यह बात सर्वविदित है, कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। इसलिए व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास हेतु संतुलित आहार एवं समुचित पोषण अत्यन्त आवश्यक है। इस बार के पोषण सप्ताह के अंतर्गत स्तनपान कराने वाली महिलाओं, गर्भवती महिलाओं, किशोरियों (14 से 18 वर्ष) एवं बच्चों (6 वर्ष तक) को लक्षित करते हुए तमाम पहलें की गई हैं। 


1995 से शुरू मध्यान्ह भोजन योजना (मिड डे मील), 2013 का राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, आंगनबाड़ी योजना (1985), राशन कार्ड योजना, प्रधानमंत्री पोषण योजना (2021) इत्यादि पोषण को सुनिश्चित करने के लिए सरकारी स्तर पर चलाई गई कुछ प्रमुख योजनाएं हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2021 में पोषण ट्रैकर ऐप भी विकसित किया गया है जो इस दिशा में एक उल्लेखनीय कदम है।


पोषक तत्व-

पोषक तत्व वह पदार्थ हैं जो हमें पोषण प्रदान करते हैं और हमारे शरीर का निर्माण करते हैं। यह शरीर की मरम्मत करते हैं और कार्यों के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं। ऊर्जा हमारी सभी क्रियाओं के संचालन के लिए आवश्यक होती है। हालांकि ऊर्जा की आवश्यकता व्यक्ति विशेष के उम्र, लिंग, शारीरिक गतिविधियों और वजन पर निर्भर करती है, लेकिन औसतन प्रत्येक व्यक्ति को हर दिन 2200 से 3000 कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता होती है। पोषक तत्वों को मुख्य रूप से 7 प्रमुख भागों में बांटा जा सकता है- कार्बोहाइड्रेट, वसा, फाइबर, खनिज, प्रोटीन, विटामिन्स और पानी। इन पोषक तत्त्वों की पूर्ति के लिए अनाज, फल, डेयरी प्रोडक्ट्स, सूखे मेवे, हरी सब्जियां, अंडे, मीट का आवश्यकता एवं उपलब्धता के अनुसार सेवन करना ज़रूरी होता है। खानपान के संबंध में व्यक्ति की आदतें उसके क्लाइमेट, शारीरिक गतिविधियों, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, परंपरा एवं संस्कृति पर निर्भर करती हैं।


पोषण का महत्त्व-

आज की भागमभाग भरी दुनिया में पोषण का महत्त्व और भी ज़्यादा बढ़ गया है, क्योंकि जीवनशैली से संबंधित बीमारियां नित नई-नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। भौतिकवादी और वस्तुवादी सोच ने हमें प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में शामिल कर दिया है, जहां हम सबसे ज्यादा अपने स्वास्थ्य को अनदेखा कर रहे हैं। रेडी टू ईट, पैक्ड, जंक फूड का प्रचलन बढ़ने से सेहत का स्तर दिनोंदिन गिरता जा रहा है। ऐसे में स्वास्थ्यवर्धक और पौष्टिक भोजन के बारे में जन-जागरुकता फैलाना और भी ज़रूरी हो जाता है। 


चुनौतियां-

हालांकि पोषण के महत्त्व से परिचित होने के बावजूद देश के आम नागरिकों के लिए पोषण पहुंच के बाहर की चीज है। बढ़ती महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी, लैंगिक भेदभाव पोषण की दिशा में सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। यूनाइटेड नेशन के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDG)- 2030 का एक बड़ा फैक्टर खाद्य सुरक्षा है। परंतु वस्तुस्थिति यह है कि, अभी भी दुनिया के अधिकांश देश खाद्य सुरक्षा देने में असमर्थ दिख रहे हैं। भारत की बात करें तो ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2022 की हालिया रिपोर्ट में भारत 121 देश में 107वें स्थान पर है, जो कि अत्यन्त निराशाजनक एवं चिंता का विषय है। 


लैंगिक भेदभाव की वजह से भी देश में स्त्रियों को बचपन से ही पोषण की कमी का शिकार होना पड़ता है। परिवार (ख़ासकर पुरुष सदस्यों) को प्राथमिकता देने की वजह से महिलाएँ अपने स्वास्थ्य और पोषण को सबसे आख़िर में रखने को कंडीशन्ड हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2019-21 के आंकड़ों के मुताबिक देश की 57% महिलाएं एनीमिया यानी खून की कमी से ग्रस्त हैं,जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 25% है। माहवारी, गर्भधारण, स्तनपान आदि अतिरिक्त स्वास्थ्य स्थितियों की वजह से महिलाओं के स्वास्थ्य को अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है। लेकिन विडंबना है कि पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था में अक्सर इसका उल्टा होता है।


संभावनाएं-

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह और पोषण माह लोगों में पोषण के प्रति जागरुकता बढ़ाने का एक अच्छा अवसर है। भोजन की स्वास्थ्यवर्धक आदतों को बढ़ावा देना, कुपोषण से मुक्ति के लिए लक्षित अभियान चलाना, कमज़ोर समूहों (बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों) को केंद्र में रखकर पोषण की उचित व्यवस्था करना खाद्य सुरक्षा और पोषण को सुनिश्चित करने की दिशा में बेहतरीन कदम साबित हो सकते हैं। स्वस्थ व्यक्ति से स्वस्थ एवं समृद्ध समाज का निर्माण होता है। इस प्रकार एक स्वस्थ समाज ही स्वयं के साथ-साथ देश की प्रगति में भी अपना योगदान सुनिश्चित कर सकता है।


© प्रीति खरवार 


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