Nelson Mandela in Hindi : नेल्सन मन्डेला का जीवन परिचय

 नेल्सन मंडेला: समानता और न्याय का एक वैश्विक प्रतीक


स्वतंत्रता, समानता, न्याय और प्रेम के लिए मनुष्य के अंदर नैसर्गिक इच्छा होती है। यह देश, काल, परिस्थिति और सीमाओं के परे होती है। भेदभावपूर्ण व्यवहार किसी के लिए भी असहनीय होता है। परंतु विडंबना यह है कि सदियों से सत्ता पर काबिज लोग अपने से कमजोर वर्गों के प्रति असंवेदनशील और भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाते रहे हैं। यह भेदभाव मुख्य रूप से नस्ल, रंग, जाति, धर्म, राष्ट्रीयता और जेंडर आदि पर आधारित होता है। शिक्षा और जागरूकता के अभाव में हाशिए पर पड़ा वर्ग अक्सर इसे अपनी नियति मानकर चुपचाप सहता है। लेकिन ऐसे ही परिस्थितियों में कुछ ऐसे लोग उभर कर सामने आते हैं जो सत्ता को खुलेआम चुनौती देते हैं। ये अपने साथ दोयम दर्जे का व्यवहार स्वीकार नहीं करते हैं और बदलाव के लिए उठ खड़े होते हैं। यह अपने समय में तो बागी और विद्रोही कहे जाते हैं परंतु समय जब इनका सटीक मूल्यांकन करता है तो यह युग प्रवर्तक के तौर पर इतिहास में अपना नाम दर्ज करा जाते हैं। दक्षिण अफ्रीका के ‘राष्ट्रपिता’ और ‘दूसरे गांधी’ कहे जाने वाले इसी कड़ी में Nelson Mandela एक महत्वपूर्ण शख़्सियत हैं। इनका जीवन किसी परिचय का मोहताज नहीं। साउथ अफ्रीका में लोकतंत्र के संस्थापक नेल्सन मंडेला ने देश को एक नए सिरे से गढ़ा जिसकी बुनियाद स्वतंत्रता, समानता और न्याय पर आधारित थी।

बचपन-

Nelson Mandela का जन्म 18 जुलाई 1918 में दक्षिण अफ्रीका के ट्रांसकेई स्थिति मवेजो गांव में हुआ था। इनकी माता नॉसकनी और पिता हेनरी थे। दुर्भाग्य से इनके 12 वर्ष का होने पर इनके पिता हेनरी का देहांत हो गया। इनके पिता टोंबो जनजाति के मुखिया थे। मंडेला के परदादा वहां के राजा हुआ करते थे। इस प्रकार मंडेला एक शाही खानदान से ताल्लुक रखते थे। उनके बचपन का नाम रोलीह्लाला (Rolihlahla) था। स्थानीय भाषा में जिसका अर्थ था- शरारती बच्चा। प्राथमिक शिक्षा के लिए जब यह स्कूल गए तब इनकी शिक्षक Miss Madigne ने इनका नाम स्कूल की ईसाई परंपरा के अनुसार नेल्सन रखा। 


शिक्षा-

Nelson Mandela की प्रारंभिक शिक्षा Qunu के स्कूल में हुई जहां उन्हें उनका Nelson नाम मिला जबकि Mandela का अर्थ- ‘मुखिया का बेटा’ था। जूनियर की डिग्री नेल्सन ने Clarkebury Boarding Institute से हासिल की। इसके बाद माध्यमिक शिक्षा के लिए वे Wesleyan secondary school गए। इन्होंने Wesleyan secondary school से मैट्रिक की पढ़ाई की। अपने कॉलेज की पढ़ाई नेल्सन ने University College of Fort Hare से की। हालांकि छात्र आंदोलन में सक्रिय होने की वजह से उनकी पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई। इसके बाद कानून की पढ़ाई के लिए इन्होंने University of the Witwatersrand में दाखिला लिया परंतु एक बार फिर नियमित पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए।  इसलिए बाद में  University of South Africa से एलएलबी की डिग्री ली। नेल्सन मंडेला ने University of London में भी दाखिला लिया था परंतु इसमें भी डिग्री हासिल करने तक नियमित पढ़ाई नहीं कर सके। नेल्सन मंडेला हमेशा कुछ नया सीखने के लिए तत्पर रहते थे। यहां तक कि जेल में रहते हुए भी इन्होंने अलग-अलग विषयों में पढ़ाई की और नई भाषाएं भी सीखी।

दक्षिण अफ्रीका और रंगभेद-

Nelson Mandela के समय में दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद चरम पर था। सत्ता पर हमेशा से गोरों का कब्जा था और इन्होंने सारे नियम-कानून भी अपनी सुविधा और विशेषाधिकार के लिए बनाए थे। उस समय अश्वेत लोगों को मतदान का अधिकार भी नहीं था तो ज़ाहिर सी बात है सत्ता में कभी हिस्सेदारी नहीं मिली। सार्वजनिक स्थानों पर इनके लिए अलग क्षेत्र निर्धारित किए गए थे। सार्वजनिक बसों में अश्वेत लोगों का प्रवेश प्रतिबंधित था। रेस्टोरेंट में यह श्वेत लोगों के साथ टेबल साझा नहीं कर सकते थे। इनके लिए आवास और स्कूल अलग से बनाए गए थे। परंतु उनके लिए विशेष रूप से बनाए गए स्कूल, बस और आवास निम्न दर्जे के होते थे। श्वेत लोग हमेशा अश्वेतों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते थे। 1948 में में दक्षिण अफ्रीका की सरकार द्वारा रंगभेद प्रणाली को संस्थानिक तौर पर लागू किया गया इसके बाद यह भेदभाव और ज़्यादा बढ़ गया। ऐसे में Nelson Mandela एक उभरते लीडर के तौर पर सामने आए। इन्होंने इस भेदभावपूर्ण प्रणाली का विरोध किया। 


Nelson Mandela अब्राहम लिंकन, मार्टिन लूथर किंग और महात्मा गांधी के विचारों से बहुत प्रभावित थे। विरोध प्रदर्शन के लिए इन्होने गांधी जी के प्रसिद्ध ‘सत्य और अहिंसा’ के मार्ग को अपनाया। 1944 में मंडेला अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (ANC) में शामिल हो गए थे। इन्होंने अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के अन्तर्गत ‘यूथ लीग’ (ANC youth league) की स्थापना की। मंडेला ने भेदभाव के ख़िलाफ़ अपने अभियान के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका के कई देशों की यात्रा की। तत्कालीन दक्षिण अफ़्रीकी सरकार ने इस आधार पर इनके ऊपर देशद्रोह का आरोप लगाया और गिरफ़्तार कर लिया। आरोप यह था कि इन्होंने बिना सरकार की अनुमति के यात्रा की। 1950 के दशक में सरकार ने अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और इसके जैसी रंगभेद विरोधी संस्थाओं पर बैन लगा दिया। परंतु इसके बाद भी नेल्सन और उनके साथी रुके नहीं बल्कि और भी ज्यादा समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ संघर्ष में जुटे रहे। 

नेल्सन मंडेला की जेल यात्रा-

तत्कालीन दक्षिण अफ्रीका सरकार की दमनपूर्ण नीतियों और तानाशाही भरी कार्रवाइयों की वजह से अब नेल्सन और उनके साथी ने छुपकर गतिविधियों का संचालन शुरू किया। इन्होंने ‘स्पीयर ऑफ़ द नेशन’ नमक गुप्त समूह का गठन किया जिसके माध्यम से देश भर में क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन किया। परंतु इसमें व्यवधान तब उत्पन्न हो गया जबरदस्त 1962 में अल्जीरिया से वापसी पर Nelson Mandela को गिरफ्तार कर लिया गया और इन्हें 5 वर्ष की सजा सुनाई गई। इसी के साथ क्रांतिकारी संस्थाओं पर छापेमारी तेज हो गई और 1963 में पुलिस छापेमारी के दौरान इनकी गुप्त सेना से संबंधित दस्तावेज और हथियार बरामद हुए। इसके साथ ही उनके 7 और साथी भी गिरफ्तार हो गए। इन सभी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इसके बाद नेल्सन मंडेला को साउथ अफ्रीका की राजधानी केप टाउन के रॉबिन द्वीप जेल में रखा गया जहां इसे कोयला खनन जैसा काम करवाया गया। कोर्ट में पेशी के लिए प्रिटोरिया की स्थानीय जेल ले जाया गया बाद में 10 वर्ष इन्हें द्वीप जेल में ही बिताना पड़ा। 1982 में इन्हें पोल्समूर जेल में स्थानांतरित किया गया।  1988 में पार्ल्स नामक शहर के पास विक्टर वर्स्टर जेल में रखा गया। जेल में रहने के दौरान इन्हें दो बार कुछ शर्तों पर रिहाई का अवसर दिया गया परंतु नेल्सन मंडेला ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और सशर्त रिहाई से इनकार कर दिया।


‘नेल्सन मंडेला मुक्त करो’ अभियान-

इसकी शुरुआत 1980 में उनके साथी ओलिवर टेंबो ने की थी। इस समय तक नेल्सन मंडेला पूरी दुनिया में समानता के अपने संघर्षों और सिद्धांतों के लिए लोकप्रिय हो चुके थे। रंगभेद और नस्लभेद विरोधी आंदोलन पूरी दुनिया में फैल गया। मानवाधिकार से संबंधित वैश्विक संस्थाओं ने भी इसमें सक्रिय सहभागिता और एकजुटता दिखाई। इस प्रकार वैश्विक दबाव के चलते 1990 में साउथ अफ्रीका के तत्कालीन राष्ट्रपति F.W. De Klerk ने Nelson Mandela से मुलाकात की और उन्हें रिहा कर दिया। 

राजनैतिक जीवन-

जेल से रिहा होने के बाद 1991 में Nelson Mandela अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस ANC के अध्यक्ष बने। इन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति क्लर्क के साथ मिलकर रंगभेद के ख़िलाफ़ और सभी के लिए समानता व न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में उल्लेखनीय काम किये। उनके प्रयासों के फलस्वरुप 1994 में दक्षिण अफ्रीका में पहली बार आम चुनाव हुआ। यह इस मामले में ऐतिहासिक था कि इसमें सभी नस्ल व रंग के लोगों को पहली बार मतदान करने का अधिकार मिला। नतीजा यह हुआ कि अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस ANC की जीत हुई और नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति चुने गए। समानता के प्रबल पैरों का नेल्सन मंडेला ने 1995 में ‘सत्य और सुलह आयोग’ की स्थापना की, जिसका काम रंगभेद के दौरान हुए मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की जांच कर रिपोर्ट तैयार करनी थी। दक्षिण अफ्रीका के इतिहास में 1996 वह साल था जब देश को एक नए लोकतांत्रिक संविधान को मंजूरी मिली। 1997 में मंडेला ने अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और थाबो मबेकी मंडेला को अपना उत्तराधिकारी बनाया। इस प्रकार नेल्सन इन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया।


व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन-

Nelson Mandela ने अपने जीवनकाल में तीन शादियां की जिसमें कुल छह बच्चे थे। उनकी पत्नियों के नाम क्रमशः Evelyn Mase, Winnie Madikizela और Graca Simbine Machel हैं। Graca Simbine Machel के साथ इनका विवाह 80 वर्ष की अवस्था में हुआ था। 5 दिसम्बर 2013 श्वसन संक्रमण की वजह से Nelson Mandela ने दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।


Nelson Mandela का पूरा जीवन सामाजिक समानता और न्याय के लिए समर्पित रहा। सकरी राजनीति से संन्यास लेने के बाद 1999 में इन्होंने ‘नेल्सन मंडेला फाउंडेशन’ के माध्यम से दुनिया भर में समानता, शांति और सामाजिक न्याय की वकालत की। इसके अलावा इन्होंने Nelson Mandela children’s fund, Mandela roads foundation और The Elders (2007) जैसे संस्थानों की स्थापना की। ये संस्थान अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समानता न्याय और संघर्ष समाधान के लिए सक्रिय रहे।

पुरस्कार व सम्मान-

Nelson Mandela के सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में योगदान को देखते हुए इन्हें 200 से भी अधिक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार व सम्मान से नवाजा गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 2009 में इनके जन्मदिन यानी 18 जुलाई को प्रतिवर्ष International Nelson Mandela Day मनाए जाने की घोषणा की गई। पुरस्कारों में सबसे प्रमुख रूप से उल्लेखनीय 1993 में ‘शांति का नोबेल’ पुरस्कार है, जो इन्हें दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति F.W. De Klerk के साथ संयुक्त रूप से प्राप्त हुआ। इसके साथ ही इन्हें President medal of freedom, Order of Lenin जैसे पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। 1990 में इन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ प्रदान किया गया Nelson Mandela यह पुरस्कार पाने वाले पहले विदेशी व्यक्ति थे। गांधीवादी दर्शन को विश्व स्तर पर अपनाने और प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए 2008 में इन्हें गांधी शांति पुरस्कार दिया गया। इसके साथ ही पाकिस्तान निन देश का सर्वोच्च पुरस्कार ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ से सम्मानित किया।


अपने जीवन काल में ही किंवदंती बन चुके नेल्सन मंडेला का जीवन कई मायनों में प्रेरणा का स्रोत है। इससे साबित होता है कि बड़ी से बड़ी चुनौतियां मजबूत हौसलों से हार जाती हैं। यह हमें सिखाता है कि हमें भेदभाव, अन्याय और ग़ैर बराबरी को नियति मानकर नहीं चलना चाहिए बस बल्कि इसके ख़िलाफ़ संघर्ष करना श्रेयष्कर है। दुनिया में जितनी भी क्रांतियां हुई हैं उन सबके मूल में असमानता और भेदभाव रहा है। दमनकारी शक्तियां कितनी भी ताकतवर हों आखिरकार जीत सत्य और न्याय की ही होती है। 


© प्रीति खरवार 

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