Rastriya Khel Divas : राष्ट्रीय खेल दिवस

 Rastriya Khel Divas : राष्ट्रीय खेल दिवस 


“पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब 

खेलोगे कूदोगे होगे खराब।”


एक समय में यह कहावत बहुत प्रचलित थी। यह कहावत जिस समय में बनी थी, उस समय की जीवनशैली इतनी शारीरिक श्रम से भरपूर थी, कि अलग से खेल-कूद या एक्सरसाइज की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी। कुएं से पानी निकलना, खेतों में काम करना और घरेलू कार्यों के लिए भी काफ़ी मेहनत की जरूरत पड़ती थी। अब वैज्ञानिक अविष्कारों और तकनीक ने मानव जीवन को सुविधाजनक बना दिया है और इंसान की शारीरिक गतिविधियां कम होती जा रही हैं। जिसकी वजह से जीवन शैली से संबंधित बीमारियां जैसे-ओबेसिटी, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, थायरॉइड बढ़ती जा रही हैं। अब पेरेंट्स और स्कूल बच्चों को शारीरिक गतिविधियों वाले खेलकूद में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। फिजिकल पैरामीटर को मेजर करने के लिए तमाम इक्विपमेंट्स जैसे- स्मार्ट वॉच स्मार्टफोन, स्मार्ट अप्लायंसेज ने बाजारों और हमारे घरों में जगह बना ली है, जो कि इस समय की ज़रूरत भी है। आज हम बात कर रहे हैं, ऐसे ही एक राष्ट्रीय दिवस के बारे में, जिसे खेलकूद को बढ़ावा देने के लिए जागरुकता फैलाने के मकसद से देश भर में मनाया जाता है।


परिचय-

राष्ट्रीय खेल दिवस 29 अगस्त 2012 से प्रतिवर्ष देशभर में हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन राष्ट्रपति भवन में विशेष रूप से सम्मान समारोह समेत तमाम कार्यक्रमों का आयोजन होता है। इसके माध्यम से खेल भावना, एकता, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता बढ़ाने का काम किया जाता है। साथ ही अपने महत्त्वपूर्ण योगदानों से देश का नाम ऊंचा करने के लिए खिलाड़ियों के प्रति सम्मान व आभार भी व्यक्त किया जाता है। राष्ट्रीय खेल दिवस पर प्रतिवर्ष राष्ट्रपति भवन में खिलाड़ियों को उनके योगदान के लिए मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार, अर्जुन पुरस्कार और संबंधित कोचेज को द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार की राशि पहले 5 लाख थी जो बाद में बढ़कर 10 लाख रुपए कर दी गई।


मेजर ध्यानचंद का जीवन परिचय-

राष्ट्रीय खेल दिवस हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के जन्मदिन के उपलक्ष्य में देश भर में मनाया जाता है। मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) में हुआ था। इनके पिता का नाम सूबेदार सोमेश्वर दत्त सिंह और माता का नाम शारदा सिंह था। इनके पिता ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सूबेदार के रूप में कार्यरत थे, जो हॉकी खेला करते थे। इनके दोनों भाई भी हॉकी के अच्छे खिलाड़ी थे। 1922 में मात्र 16 वर्ष की उम्र में ध्यानचंद सेना में भर्ती हो गए। ग़ौरतलब है, कि इनका प्रारंभिक नाम ध्यान सिंह था, लेकिन रात में चांद की रोशनी में हॉकी की प्रैक्टिस करने के कारण इनका नाम ध्यान चांद और फिर बाद में ध्यानचंद पड़ गया। ध्यानचंद को हॉकी के लिए प्रेरित करने वाले आर्मी के उनके साथी सूबेदार मेजर भोला तिवारी थे।


ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य-

मेजर ध्यानचंद ने 1925 में अपना पहला नेशनल हॉकी टूर्नामेंट खेला था। इसके बाद उनका सेलेक्शन अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए टीम में हो गया था। 1926 से लेकर 1948 तक इन्होंने अपने खेल से पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। हॉकी स्टिक पर मेजर का कंट्रोल इतना अच्छा था कि लोगों को शक होता कि हॉकी में चुंबक छुपा हुआ है। इसी के चलते नीदरलैंड ने एक बार इनके हॉकी स्टिक का परीक्षण करवाया और इस तरह लोगों का शक दूर हुआ। इन्होंने 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक, 1932 के लॉस एंजेल्स ओलंपिक, 1936 के बर्लिन ओलंपिक में लगातार तीन बार भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। 1928 के ओलंपिक में इन्होंने अकेले 14 गोल किए थे। हॉकी के क्षेत्र में इतना अभूतपूर्व कारनामा करने की वजह से ही इनको ‘हॉकी विजार्ड’ और ‘हॉकी का जादूगर’ कहा जाने लगा। इन्होंने अंतर्राष्ट्रीय हॉकी कॅरियर में 400 से अधिक गोल किए जबकि संपूर्ण कॅरियर में 1000 से भी अधिक गोल कर चुके हैं। 1926 से 1948 तक ओलंपिक समेत तमाम अंतर्राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिताओं में असाधारण योगदान दिया। जीवनभर हॉकी को समर्पित रहे मेजर ध्यानचंद 3 दिसंबर 1979 को लिवर कैंसर की वजह से इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गए ।


मेजर ध्यानचंद के योगदानों को देखते हुए भारत सरकार ने इन्हें 1956 में पद्मभूषण से सम्मानित किया, जो कि भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है। इसके अलावा सरकार ने दिल्ली के राष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम का नाम बदलकर ‘मेजर ध्यानचंद स्टेडियम’ कर दिया गया। 1979 में उनकी मृत्यु के बाद भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में स्टांप भी जारी किया था।


महत्त्व-

राष्ट्रीय खेल दिवस का आयोजन प्रतिवर्ष 29 अगस्त को देश के विभिन्न स्कूलों और कॉलेज में बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसमें देश की युवा पीढ़ी को खेल के महत्त्व के बारे में जागरुक करने का प्रयास किया जाता है। इसके साथ ही मेजर ध्यानचंद समेत तमाम महान खिलाड़ियों के बारे में जानकारी दी जाती है, जिससे वे इनसे प्रेरणा खेलों की ओर आकर्षित हो सकें। खेलों के प्रति उत्साह और प्रेरणा के लिए सरकारी स्तर पर विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं और नौकरियों में स्पोर्ट्स कोटा भी दिया जाता है। 


राष्ट्रीय खेल दिवस न सिर्फ युवाओं के लिए या प्रोफेशनल स्पोर्ट्स पर्सन के लिए ज़रूरी है, बल्कि यह देश के सभी नागरिकों के लिए मायने रखता है। क्योंकि खेल हर आयु, वर्ग और जेंडर के लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद है। खेलों तक सबकी पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है कि घरेलू कार्यों में सभी जेंडर की भूमिका तय हो, साथ ही सभी के लिए समान रूप से पोषण की उचित व्यवस्था हो। जिससे देश के नागरिक अपने व्यक्तित्व का समुचित विकास कर सकें और समाज तथा देश की प्रगति में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान सुनिश्चित कर सकें।


© प्रीति खरवार

Leave a Comment