“चीफ की दावत” कहानी की मूल संवेदना

 चीफ की दावत कहानी की मूल संवेदना/ सारांश

 

चीफ की दावत हिन्दी के प्रख्यात कथाकार “भीष्म साहनी” द्वारा रचित एक मर्मस्पर्शी कहानी हैं। भीष्म साहनी प्रेमचंद की परम्परा के कथाकार हैं।

चीफ की दावत पंजाबी परिवेश और एक स्वार्थपरक पारिवारिक ढाँचे के ऊपर आधारित  कहानी है। कहानी में तीन मुख्य पात्र हैं – शामनाथ,उनकी धर्मपत्नी और उनकी माँ। चौथे पात्र के रूप में आए है मिस्टर शामनाथ के बॉस। बॉस की पत्नी एवं मेहमान कहानी के गौण पात्र हैं।

मिस्टर शामनाथ के बॉस उनके घर आमंत्रित हैं और उनके साथ कुछ अन्य मेहमान भी बुलाए गए हैं। घर का समुचित रिनोवेशन करने में दोनों पति- पत्नी दिन-रात एक किए हुए हैं। पुरानी और टूटी-फूटी चीजों को बेड के नीचे और पर्दे के पीछे रखा जा रहा है कि अचानक एक “बड़ा भारी सवाल” उनके सामने खड़ा हो जाता है-“माँ का क्या करें?” दरअसल दोनों पति-पत्नी अपने बॉस के सामने ऐसा प्रभाव जमाना चाहते थे कि इस मुलाक़ात के बाद बॉस शामनाथ को तरक्की दिए बिना न रह सके।

इस हेतु घर में पुराना फर्नीचर हटाकर नया फर्नीचर लगा दिया जाता है। जगह-जगह गुलदस्ते और गमले सजा दिए जाते हैं। बैठक में “ड्रिंक” की व्यवस्था कर दी जाती है। अब सिर्फ एक ही कमी उनको दिखाई दे रही है और वो है- बूढ़ी माँ। माँ के साथ समस्या (?) ये है कि माँ बूढ़ी है, सिर के आधे बाल उड़ गए हैं। वो पाँव लटकाकर नहीं बैठ सकती और नींद आने के बाद खर्राटे लेने की ‘बुरी’ आदत है।

शामनाथ नहीं चाहते कि घर की इतनी सुंदर व्यवस्था के बाद बॉस का सामना उनकी बूढ़ी माँ से हो। वो भरपूर कोशिश करके अपनी माँ को समझाते हैं कि वो आज जल्दी अपना काम निपटाकर कमरे में बैठ जाए। बच्चों की तरह माँ को हिदायत देता है  कि वह कुर्सी पर “सभ्यता” से बैठे और या तो जगी रहे या नींद आने पर खर्राटे न लें।

इस बीच में माँ को अपनी विधवा सहेली के यहाँ भेजने का अपनी पत्नी का प्रस्ताव शाम नाथ इस तर्क के साथ ठुकरा देते हैं कि बड़ी मुश्किल से तो उस बुढिया से मां का मेलमिलाप खत्म करवाया तो कहीं एक दिन के चक्कर में  ये फिर से शुरू न हो जाए! 

बॉस और मेहमान आते हैं। बॉस का सामना माँ से हो ही जाता है। स्तब्ध करने वाला पल है! माँ कुर्सी पर पाँव चढाए बैठी है और नींद में उसका सिर झूल रहा है.गहरे खर्राटों की आवाजें आ रही है। यहाँ पर बॉस को उसके बेटे शामनाथ से अधिक समझदार दिखाया हैं। । तमाम हिदायतों के बाद भी माँ को इस हालत में देखकर शामनाथ जहाँ गुस्से से काँप रहा था,वहीं बॉस के चेहरे पर मुस्कुराहट थी।

चीफ की दावत कहानी के इस हिस्से में जिस तरह से शामनाथ अपनी माँ से बॉस की बातचीत करवाता है, गाना सुनवाता है, वह न सिर्फ़ अपमानजनक है बल्कि अमानवीय है। बॉस को फुलकारी लाकर  दिखलाना और नई बनाने के लिए माँ पर दबाव बनाना एक निष्ठुर और स्वार्थी बेटे की तस्वीर दिखाता है।

कहानी के अन्त में बूढी,नि:शक्त और असमर्थ माँ से बॉस के लिए फुलकारी बना देने का शामनाथ का कर्म निहायत ही अश्लीलता भरा लगता है।

चीफ की दावत कहानी की में रिश्तों के दरकने और स्वार्थ को ही सब कुछ समझने को दिखाया गया है। घर के बुजुर्गों को घर के अनुपयोगी सामान की तरह समझना और मौका पड़ने पर पूरी तरह से अपना स्वार्थ साधना इस कहानी के माध्यम से बहुत अच्छी तरह दर्शाया गया है। माँ की बेबसी कहीं से भी भव्य संस्कृति का ममतामयी चेहरा नहीं लगती, बल्कि एक अनाम पीड़ा का बोध कराती है। 

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© डॉक्टर संजू सदानीरा

Priti Kharwar

प्रीति खरवार एक Freelance Writer हैं, जो शोध-आधारित हिंदी-लेखन में विशेषज्ञता रखती हैं। Banaras Hindu University से Psychology में Masters प्रीति को हिन्दी भाषा में लेखन के लिए भाषा सारथी सम्मान और United Nations Population Fund की तरफ से Laadli Media Fellowship भी मिल चुका है। प्रीति का लक्ष्य हिंदी भाषी पाठकों को Mental health और सामाजिक मुद्दों पर आसान और बोलचाल की भाषा में कंटेंट उपलब्ध कराना है, जिससे लोग अपने जीवन में positive change ला सकें।

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