मारू थाँकइ देसड़उ, एक न भाजइ रिड्ड पद की व्याख्या
मारू थाँकइ देसड़उ, एक न भाजइ रिड्ड ।
ऊचाळउ क अवरसणउ, कइ फाकउ,कइ तिड्ड ।।
प्रसंग –
प्रस्तुत पद पाठ्य पुस्तकों में संकलित राजस्थान के प्रसिद्ध लोक काव्य ढोला मारू रा दूहा से लिया गया है। इसके रचनाकार कवि कल्लोल माने जाते हैं। मूल रचना में बाद में कुशल लाभ ने और दोहे-चौपाई जोड़ कर इसे व्यवस्थित किया।
संदर्भ –
इस पद में भी पूर्व पदों की भांति ढोला की दूसरी पत्नी मालवणी ढोला की पहली पत्नी मारवणी को उसके मायके मारवाड़ की कठिनाइयां बताते हुए उस प्रदेश को रहने के लिए दुष्कर बताती है।
व्याख्या –
मालवणी इस पद में अपने पिता के बजाय सपत्नी मारवणी को संबोधित करते हुए कहती है कि उसके (मारू/ मरवण के) प्रदेश में रहना बहुत ही कष्टकारी है। प्राकृतिक कष्ट तो कोई भी वहां दूर नहीं हो पाता। या तो कृषि की जमीन समतल नहीं होती या वहां बारिश नहीं होती।रोजी-रोटी के लिए देश से प्रयाण करते समय भी या तो तो फाका पड़ जाता है अथवा टिड्डियों की मार आ पड़ती है। कहने का आशय है कि एक न एक कष्ट सदा बना ही रहता है।
विशेष –
1. पद को पढ़ कर ज्ञात होता है कि मालवणी सुखमय और सुविधाजनक जीवन को बहुत महत्त्व देती है। यह उस समय के हिसाब से बहुत नयी बात है।
2. मारवणी को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। गौरतलब है कि औरतों को नीचा दिखाने के लिए उनके मायके की आलोचधा आम बात है।
3. राजस्थान की भौगोलिक परिस्थितियों का यथासंभव यथार्थ चित्रण किया गया है।
4. भाषा ठेठ राजस्थानी है।
5. वार्तालाप शैली का सहज सौंदर्य दर्शनीय है।
© डॉ. संजू सदानीरा




