आनंदीबाई जोशी का जीवन परिचय (Anandibai Joshi biography in Hindi)

भारत की पहली महिला डॉक्टर: आनंदीबाई जोशी का जीवन परिचय (Anandibai Joshi biography in Hindi)

 

एक ऐसा दौर जब देश में महिलाओं की भूमिका घर परिवार तक सीमित थी और स्त्री शिक्षा को तिरस्कार के रूप में देखा जाता था। ऐसे में एक छोटी सी लड़की ने समाज के भेदभावपूर्ण रीति रिवाज़ों को चुनौती दी और इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज़ कर दिया। भारत की पहली महिला डॉक्टर आनंदीबाई जोशी (Anandibai Joshi) ने अपनी दृढ़ता, साहस और इच्छा शक्ति से ऐसा मुकाम हासिल कर लिया जिसने आने वाले क्रांतिकारी बदलाव की नींव रखी।

19वीं सदी का वह दौर जब स्त्रियों का घर की चारदीवारी से बाहर निकलना भी ग़लत समझा जाता था तब आनंदीबाई ने न केवल घर की दहलीज पार की बल्कि देश की सीमाओं को पार करते हुए अमेरिका जाकर मेडिकल की डिग्री हासिल की। महज 19 साल की उम्र में अमेरिका जाकर डॉक्टरी की पढ़ाई करना न सिर्फ़ आनंदीबाई की व्यक्तिगत सफलता है बल्कि यह भारत में स्त्री शिक्षा और मेडिकल के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव लाने वाला ऐतिहासिक कदम साबित हुआ। भारत की पहली महिला डॉक्टर आनंदीबाई जोशी की जीवन गाथा सदियों से स्त्री शिक्षा और अधिकारों के लिए प्रेरणा का काम कर रही है।

डॉक्टर आनंदीबाई जोशी का प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

आनंदीबाई जोशी का जन्म 31 मार्च 1865 को महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण नामक जगह पर हुआ था। उनके बचपन का नाम यमुना था। उस समय की परंपरा के अनुसार महज़ 9 साल की अवस्था में इनकी शादी इनसे लगभग 20 साल बड़े गोपाल राव जोशी से कर दी गई थी। गोपाल राव एक डाक अधिकारी थे जो उस समय के हिसाब से काफ़ी प्रगतिशील विचारों के थे। उन्होंने आनंदीबाई की रुचि को देखते हुए ख़ुद ही उन्हें अंग्रेजी, मराठी, भूगोल और गणित जैसे विषयों की शिक्षा दी। इसके कुछ ही समय बाद आनंदीबाई जोशी के जीवन में एक भयानक दुर्घटना हुई जिसने इनकी ज़िंदगी को निर्णायक मोड़ देने का काम किया।

सिर्फ़ 14 साल की उम्र में आनंदीबाई ने बच्चे को जन्म दिया। सही इलाज़ और देखभाल न मिल पाने की वजह से जन्म के महज 10 दिनों के बाद ही उस बच्चे की अचानक मौत हो गई। इसकी सबसे बड़ी वजह थी उस समय ख़ासतौर पर महिला डॉक्टर की अनुपलब्धता। सीमित संख्या में पुरुष डॉक्टर उस समय भी देश में मौजूद थे लेकिन सामाजिक रूढ़ियों और शर्म-संकोच की वजह से महिलाएं उनसे अपना इलाज़ नहीं करवा पाती थीं।

इस घटना ने आनंदीबाई जोशी के मन मस्तिष्क पर गहरा असर डाला। जिससे इन्होंने यह संकल्प लिया कि वह ख़ुद मेडिकल की पढ़ाई करेंगी और डॉक्टर बनेंगी। जिससे आने वाले समय में ख़ासकर महिलाओं और शिशुओं को इस तरह की त्रासदी से बचा सकें। इसके साथ ही इन्होंने देश में महिलाओं के लिए मेडिकल कॉलेज खोलने की योजना भी बनाई।

आनंदीबाई जोशी अमेरिका की यात्रा और डॉक्टर बनने का सफ़र

1813 के चार्टर एक्ट के बाद भारत में ईसाई मिशनरियों का आगमन शुरू हो गया था और अंग्रेज़ी शिक्षा की शुरुआत हो चुकी थी। इसके बावजूद उस समय भारत के ऊंची माने जाने वाली जातियों के पुरुषों तक ही शिक्षा की पहुंच थी। सावित्रीबाई फुले, ज्योतिबा फुले और फ़ातिमा शेख जैसे समाज सुधारकों के अथक प्रयासों के बावजूद महिलाओं और कमज़ोर वर्गों के लिए पढ़ाई बेहद मुश्किल थी। ऐसे समय में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए आनंदीबाई जोशी की दृढ़ता और प्रतिबद्धता को देखते हुए उनके जीवन साथी गोपाल राव ने उनका हर क़दम पर साथ दिया।

गोपाल राव जोशी ने आनंदीबाई की पढ़ाई के लिए 1880 में अमेरिकी मिशनरी रॉयल वाइल्डर से संपर्क किया। हालांकि वाइल्डर आनंदीबाई जोशी को अमेरिकी मेडिकल कॉलेज में दाखिला दिलाने में मदद नहीं कर सके लेकिन उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की एक पत्रिका मिशनरी रिव्यू में उनके पत्राचार को प्रकाशित करवाया। जिसे पढ़कर अमेरिका की थियोडिसिया कारपेंटर ने आनंदी को पत्र लिखकर मेडिकल की पढ़ाई में उनकी मदद करने की पेशकश की। इस तरह 1883 में आनंदीबाई जोशी का दाखिला अमेरिका के वूमेंस मेडिकल कॉलेज ऑफ़ पेंसिलवानिया (Women’s Medical College of Pennsylvania) में हो गया।

अमेरिका जाने से पहले पश्चिम बंगाल के सेरामपुर कॉलेज में इन्होंने ऐतिहासिक भाषण दिया जिसमें आनंदी ने अमेरिका में जाकर डॉक्टरी की पढ़ाई और भारत वापस आकर महिलाओं के स्वास्थ्य को सुधारने का अपना संकल्प दोहराया। उस समय के रूढ़िवादी भारतीय समाज ने तमाम तरीके से अपना विरोध ज़ाहिर किया। यहां तक कि उनके घर पर पत्थर और गोबर तक फेंके गए, लेकिन आनंदी ने हार नहीं मानी। अमेरिका जाने के समय आनंदीबाई जोशी की उब सिर्फ़ 19 साल थी।

दृढ़ निश्चय और कठिन परिश्रम की बदौलत आनंदी ने 1886 में डॉक्टर ऑफ़ मेडिसिन (M.D.) की डिग्री हासिल की और इस तरह विदेश से मेडिकल की पढ़ाई करने वाली पहली भारतीय महिला डॉक्टर बनने का गौरव हासिल किया। इनके थीसिस का विषय था- “Obstetrics among the Aryan Hindus”. इन्होंने भारतीय और पश्चिम चिकित्सा पद्धतियों का तुलनात्मक अध्ययन किया और अपना निष्कर्ष शोध पत्र में प्रकाशित करवाया। 11 मार्च 1886 वह ऐतिहासिक दिन था जब डॉक्टर आनंदीबाई जोशी भारत की पहली महिला डॉक्टर बनीं।

आनंदीबाई जोशी की भारत वापसी और संघर्ष

अमेरिका से डॉक्टर ऑफ़ मेडिसिन (M.D.) की डिग्री हासिल कर 1886 में जब आनंदीबाई जोशी भारत लौटीं तो कोल्हापुर में उनके स्वागत के लिए भव्य समारोह आयोजित किया गया। कोल्हापुर के महाराजा ने उन्हें अल्बर्ट एडवर्ड हॉस्पिटल के महिला वार्ड में डॉक्टर के तौर पर नियुक्त किया। यह डॉक्टर आनंदीबाई जोशी के लिए एक अच्छी शुरुआत थी। इनका सपना था कि भारत में महिलाओं के लिए मेडिकल कॉलेज खोला जाए जिसमें पढ़कर देश में भारी संख्या में महिलाएं डॉक्टर बनें। जिससे आने वाले समय में महिलाओं को महिला डॉक्टर से इलाज करने का मौका मिले और उनके स्वास्थ्य में सुधार हो।

दुखद है कि तपेदिक (टीबी) हो जाने की वजह से उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका। 26 फरवरी 1887 को महज 22 साल की उम्र में आनंदीबाई जोशी का निधन हो गया। इससे से देश में जो अपूरणीय क्षति हुई उसकी भरपाई नहीं हो सकी। अपने छोटे से जीवनकाल में आनंदीबाई जोशी ने देश में ऐसा क्रांतिकारी बदलाव ला दिया जिससे देश की करोड़ों महिलाएं डॉक्टर बनने का सपना देखने लगीं।

आनंदीबाई जोशी की मृत्यु के बाद भी उनके जीवन की कहानी में भारतीय महिलाओं के लिए नए रास्ते खोले। इनके जीवन पर कई किताबें लिखी गईं। इसमें 1888 में कैरोलिन वेल्स हेली, डाल द्वारा लिखी ‘द लाइफ ऑफ़ डॉक्टर आनंदीबाई जोशी’ बेहद लोकप्रिय है। साथ ही मराठी लेखिका काशीबाई कानितकर ने भी आनंदीबाई जोशी चरित्र नाम से इन पर एक किताब लिखी।

इसके अलावा मीरा कोसांबी की किताब अ फ्रेगमेंटेड फेमिनिज्म में भी आनंदीबाई जोशी के बारे में विस्तार से लिखा गया है। 1997 में भारत सरकार ने इनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया था। दूरदर्शन पर उनकी जीवन यात्रा से जुड़ी सीरीज चलाई गई। साथ ही इन पर मराठी में “आनंदी गोपाळ” नाम से फ़िल्म भी बनाई गई। आज भी इनके नाम से मेडिकल के क्षेत्र में असाधारण उपलब्धि के लिए आनंदीबाई जोशी अवॉर्ड फॉर मेडिसिन (IRDS) दिया जाता है।

आनंदीबाई जोशी की कहानी साहस, दृढ़ता और प्रतिबद्धता की मिसाल है। एक ऐसे समय में जहां महिलाओं को बोलने तक की आज़ादी नहीं थी और उन्हें चारदीवारी में सीमित रखा जाता था इन्होंने क्रांति की ऐसी मशाल जलाई जो आज भी महिलाओं और मानव अधिकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज के दौर में जब लैंगिक भेदभाव लगातार बना हुआ है, महिलाओं और दूसरे जेन्डर्स को दोयम दर्ज़ा दिया जाता है। ऐसे में डॉ आनंदीबाई जोशी की कहानी हमें सिखाती है कि समानता, स्वतंत्रता और न्याय पर सभी का हक़ है और सबको बराबरी से अवसर मिलना चाहिए।

© प्रीति खरवार

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Priti Kharwar

प्रीति खरवार एक स्वतंत्र लेखिका हैं, जो शोध-आधारित हिंदी-लेखन में विशेषज्ञता रखती हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में परास्नातक प्रीति सामान्य ज्ञान और समसामयिक विषयों में विशेष रुचि रखती हैं। निरंतर सीखने और सुधार के प्रति समर्पित प्रीति का लक्ष्य हिंदी भाषी पाठकों को उनकी अपनी भाषा में जटिल विषयों और मुद्दों से सम्बंधित उच्च गुणवत्ता वाली अद्यतन मानक सामग्री उपलब्ध कराना है।

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