आवाज का नीलाम एकांकी की व्याख्या/मूल संवेदना
आधुनिक हिंदी एकांकी के क्षेत्र में धर्मवीर भारती का स्थान महत्त्वपूर्ण है। आवाज का नीलाम एकांकी धर्मवीर भारती द्वारा लिखित एक महत्त्वपूर्ण, समसामयिक और प्रासंगिक एकांकी है। वे न केवल एकांकीकार हैं बल्कि एक सफल उपन्यासकार, निबंधकार और यात्रा वृत्तांत लेखक भी हैं। इन सबसे ऊपर वे नयी कविता के एक महत्त्वपूर्ण कवि हैं।
“नदी प्यासी थी” उनका एकमात्र एकांकी संकलन है। शीर्षक एकांकी के अलावा नीली झील, संगमरमर पर एक रात, सृष्टि का आखिरी आदमी इत्यादि धर्मवीर भारती के उल्लेखनीय एकांकी हैं । उनके एकांकियों में मनोवैज्ञानिकता, प्रतीकात्मकता और प्रगतिशील दृष्टिकोण का समन्वय है।
हिंदी एकांकी के क्षेत्र में धर्मवीर भारती ने शिल्प की दृष्टि से कुछ नवीन प्रयोग किए हैं। “नदी प्यासी थी” एकांकी संकलन में उन्होंने कुल पांच एकांकी रखे हैं। “आवाज का नीलाम” “नदी प्यासी थी संकलन” से ही लिया गया है। आवाज का नीलम एकांकी में आज की महाजनी सभ्यता में स्वाधीन पत्रकारिता पर पूंजी की बढ़ती हुई जकड़ का मर्मस्पर्शी चित्रण है।
आवाज का नीलाम एकांकी में मुख्य रूप से दिवाकर और बाजोरिया ये दो पात्र हैं।”आवाज” इस एकांकी में एक अखबार का नाम है, जिसका मालिक और संपादक दिवाकर है। दिवाकर एक बेहद ईमानदार अखबारनवीस है।बाजोरिया इस एकांकी में एक ऐसा मौकापरस्त व्यवसायी है जो इस अखबार को खरीद कर अपने मन माफिक इसका इस्तेमाल करना चाहता है।
चूंकि एकांकी दृश्य काव्य है इसलिए इसका मंचन किए जाने के लिए दिशा निर्देश एकांकी के प्रारंभ में दे दिए गए हैं जो कि सुस्पष्ट हैं।पर्दा उठाते ही दिवाकर को फोन पर किसी से बात करते दिखाया गया है। फोन पर दिवाकर की पत्नी के बारे में बात हो रही होती है ।उसकी पत्नी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही है। उसके इलाज के लिए दिवाकर को मोटे पैसों की जरूरत है। वह आदमी बाजोरिया है, जो उसके अखबार को खरीद कर उसे एक मोटी रकम उसकी पत्नी के इलाज के लिए देना चाहता है।
दिवाकर की बदहवासी और एक साथ ही उसकी मजबूरी दोनों का चित्र इस समय पूरी मार्मिकता के साथ एकांकीकार धर्मवीर भारती कर पाने में सफल रहे हैं। दिवाकर ने इस अखबार को चलाने में कभी किसी सत्ताधारी या व्यापारी से समझौता नहीं किया था। दिवाकर ने बीस साल तक इस अखबार को अपनी एक-एक हड्डी गलाकर निकाला था अर्थात हर तरफ की कठिनाई के उसकी ज़िन्दगी में आई और वह उनके आगे नहीं झुका।
वह अपने अखबार में सच लिखने के लिए सरकार से लड़ा, पूंजीपतियों से लड़ा, एफआईआर झेली, जमानतें दी, उसका घर बिक गया, उसकी पत्नी सूखकर कंकाल हो गई लेकिन उसने सच्चाई के लिए समझौता नहीं किया। न ही किसी ने उस पर दया दिखाई, न कभी उसने किसी के सामने सर झुकाया।
आज जब पत्नी की बीमारी के कारण पैसों की जरूरत पड़ने पर अखबार बेचने की मजबूरी उसके सामने खड़ी है तो सेठ बाजोरिया तीन-तीन बार फोन करके टेलीफोन से उसका हाल पूछता है, उसकी पत्नी की तबीयत पूछता है।
दिवाकर के स्वगत कथनों के माध्यम से समाज की क्रूर सच्चाई को दिखाने में एकांकीकार सफल रहे हैं। एकांकी में दिवाकर के ऑफिस की सजावट (अथवा अस्त-व्यस्तता), वहां रखा छोटा सा पियानो, अधजली सिगरेट ,सर को कुर्सी से टिकाये बैठे नायक के माध्यम से नैराश्य में डूबे इंसान के आसपास के वातावरण का सजीव चित्रण किया गया है। अखबार को बाजोरिया को बेचने की मजबूरी, दिवाकर के स्वगत कथन और निराशा में उसके कुर्सी पर धम्म से बैठ जाने अथवा गिर जाने की-सी स्थिति के माध्यम से दिखाई गई है। “आवाज” नाम के अखबार को बेचने की स्थिति आ जाना ही आवाज का नीलाम एकांकी के शीर्षक के रूप में में लिया गया है।
इस बदहवास भरी स्थिति के बीच अस्पताल से फोन आना, पत्नी की स्थिति ठीक बताना, फि ज़रुरी पंरतु मंहगी दवा मंगवाना यह सब आम आदमी को आसानी से अपने आसपास घटित होते दिख सकता है।
दिवाकर के दफ्तर में बाजोरिया और उसकी बातचीत से वर्तमान में अखबारों की स्थिति का पता चलता है। बाजोरिया के रूप में एक बहुत व्यवहार कुशल व्यापारी को दिखाया गया है। वह अपने स्वार्थ को दबाकर दिवाकर की पत्नी का समाचार पूछता है और उसकी हालत को भी जानना चाहता है।
दिवाकर अपनी भड़ास और मजबूरी सेठ के सामने बयान करता चला जाता है।वह बोलता है कि वह क्या बताएं अपना हाल! अखबार की दुनिया में रोज खबरें छपती है, हड़तालों के नारे, लड़ाइयां का शेर, सेना की परेड, जंगी जहाज़ों का घर्राट।इन सबके बीच अपना काम ईमानदारी से करते हुए सार्थक समाचार जनता तक पहुंचाना चाहता है।वह जनता की आवाज बनना चाहता है। लेकिन उसे दुख है कि आजकल जनता फरेब में फंस जाती है और रंगीन अखबारों की चटक पटक वाली खबरों पर भरोसा कर लेती है।
बाजोरिया और दिवाकर में बाजोरिया के ऑफिस के कर्मचारी चैटर्जी को लेकर होने वाली डिस्कशन बताती है कि अनुभवी कर्मचारी को भी पैसे वाले अज्ञानी मालिक की डांट खानी पड़ती है। अखबार ज्ञान और अनुभव से नहीं बल्कि पैसों के दम पर निकाले और बेचे जाते हैं।
आवाज का नीलाम एकांकी में गृहमंत्री वाले प्रकरण से यह भी इंगित किया गया है कि मौकापरस्त और सत्ता के नज़दीक रहने वाले लोग मौका देखते ही अपने फायदे के लिए पलट जाते हैं,उनका अपना कोई फिक्स स्टैंड अथवा सिद्धांत नहीं होता है।
अंततः दिवाकर की पत्नी की तबीयत बहुत बिगड़ जाने का फोन सुनकर वह अपने अखबार का मालिकाना हक सेठ बाजोरिया को सुपुर्द कर देता है। कागज़ों पर साजन करने के बाद अस्पताल से एक और फोन उसकी पत्नी के न रहने का आता है। इस खबर से दिवाकर की मानसिक स्थिति अचानक अस्थिर हो जाती है। वह सेठ से बोलता है कि उसकी तमाम मजबूरियों का अंत हो जाने के कारण अब उसे अपना अखबार नहीं बेचना है।सेठ और याद दिलाता है कि अखबार का मालिकाना हक वह पहले ही बेच चुका है। दिवाकर के चिल्ला कर उसकी तरफ झपटने और सेठ के कारण में बैठ कर भागने के साथ ही एकांकी समाप्त हो जाता है।
एकांकी का यह अंत अपने साथ बहुत सारे सवाल पाठकों अथवा दर्शकों के लिए छोड़ जाता है। एकांकी एक तरह जहां यह बताने में सफल रहा है कि ईमानदारी की कीमत किसी भी पेशे को कितना दुश्वार बना देती है तो दूसरी तरफ यह एकांकी स्पष्ट रूप से यह भी दर्शाती है कि ईमानदार व्यक्ति अपनी ईमानदारी के नशे में इस हद तक डूब जाता है कि उसके साथ-साथ उसकी कीमत उसकी पत्नी और बच्चों को भी चुकानी पड़ती है।
कुल मिलाकर ये एकांकी देश और दुनिया में पेड न्यूज़ और प्रायोजित खबरों की असलियत तो सामने रखता है ही सच के पर्दे के भीतर छुपे रह जाने को भी दिखाता है। सत्ता और समाचार-पत्र के मालिकों की मिली भगत पर यह एक महत्त्वपूर्ण एकांकी है।
© डॉ संजू सदानीरा




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