पहिरण ओढण कंबळा, साठे पुरिसे नीर पद की व्याख्या
पहिरण ओढण कंबळा, साठे पुरिसे नीर ।
आपण लोक उभाँखरा, गाडर छाळी खीर।।
प्रसंग –
प्रस्तुत पद राजस्थान के लोकप्रिय लोक काव्य ढोला मारू रा दूहा में संकलित है। इसके रचनाकार कवि कल्लोल माने जाते हैं।
संदर्भ –
पूर्व पद की भांति इस पद में भी ढोला की पहली पत्नी मारवणी को ढोला की दूसरी पत्नी मालवणी उसके ( मारवणी के) पितृ प्रदेश अर्थात पीहर की भूमि की कठोरता के बारे में बताकर एक प्रकार से उसे नीचा दिखा रही है।
व्याख्या –
मालवणी राजस्थान के रेगिस्तानी परिवेश को निशाना बनाते हुए बोलती है कि राजस्थान/मारवाड़ वह जगह है जहां पहनने ओढ़ने के लिए कंबल ही मिलते हैं और जहां पानी 60 पुरुषों के की लंबाई के बराबर गहराई में मिलता है, जहां के लोग भ्रमणशील( घुमंतू ) हैं और जहां पशुपालन के नाम पर भेड़-बकरी पाली जाती है और भेड़ बकरी का दूध ही पीने के लिए उपलब्ध होता है।
विशेष –
1.मालवणी लगातार मारवाड़ के कठोर जीवन को निशाना बनाती है।
2.पहनने – ओढ़ने के लिए कंबल एक प्रकार का अतिशयोक्तिपूर्ण कथन है। संभवतः ये भी आशय हो सकता है कि रेगिस्तान में रातें अक्सर ठंडी होती है तो कंबल आमतौर पर हर मौसम में खुला रहता है।
3.जैसे अंगुली से अंगुल,हथेली से बित्ता, हाथ से माप (एक हाथ, दो हाथ) जैसे नापने की लोक स्वीकृत इकाइयां हैं, वैसे ही इस पद में “पुरिसे” शब्द आया है, जहां एक औसत इंसान की लंबाई (लगभग पांच -छह फुट) को जमीन में पानी की गहराई बताने के लिए लेखक ने काम में लिया है।
4.भाषा ठेठ राजस्थानी है।
5.शैली व्यंग्यात्मक है।
© डॉ. संजू सदानीरा



