फुलवा कहानी का सारांश अथवा भावार्थ/मूल संवेदना
फुलवा रत्नकुमार सांभरिया द्वारा रचित एक अत्यंत मार्मिक और सामाजिक कहानी है। रत्नकुमार सांभरिया राजस्थान के एक प्रतिबद्ध और प्रसिद्ध कथाकार हैं। सांभरिया जी ने अपनी कहानियों के माध्यम से भारतीय समाज में व्याप्त एक अत्यंत क्रूर व अमानवीय कुप्रथा छुआछूत की सच्चाइयों को बयान किया है। जाति कुप्रथा जनित समस्त बुराइयों को उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से पूरी बेबाकी और ईमानदारी के साथ दर्शाया है। एक दलित इंसान होने के नाते दबंग जातियों द्वारा की जाने वाली समस्त शोषण आधारित घटनाओं का जिक्र उन्होंने अपनी रचनाओं में किया है। साथ ही उनकी कहानियां शोषण की दास्तान ही नहीं सुनाती वरन दलितों के आत्मोत्थान एवं आत्मविश्वास की आशापूर्ण झलक भी दिखाती हैं।
इनकी प्रकाशित कृतियां निम्नलिखित हैं- हुकुम की दुग्गी, एयर गन का घोड़ा, काल एवं अन्य कहानियां, खेत तथा अन्य कहानियां, दलित समाज की कहानियां, समाज की नाक (एकांकी संग्रह), वीमा,उजास (नाटक), बांग और अन्य लघु कथाएं इत्यादि । इन्होंने आलोचना, संपादन और अनुवाद कार्य भी अत्यंत कुशलता के साथ किया। देश-विदेश की अनेक भाषाओं में उनकी कृतियों का अनुवाद हुआ।
पुरस्कार और सम्मान –नवज्योति कथा सम्मान, “चपड़ासन” कहानी के लिए तत्कालीन उपराष्ट्रपति द्वारा सम्मान, कथा देश अखिल भारतीय हिंदी कहानी प्रतियोगिता प्रथम पुरस्कार, राजस्थान पत्रिका सृजनात्मक पुरस्कार, 2015 में हरियाणा अकादमी की ओर से हरियाणा गौरव सम्मान सहित इन्हें अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए। संप्रति राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के उपनिदेशक के पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन में रत हैं।
इनके द्वारा रचित फुलवा कहानी सामंतवादी ढांचे में जड़े ग्रामीण परिवेश और बदलते मूल्यों के बीच के समय और परिवेश को दर्शाती है। एक तरफ जहां गांव में आज भी छुआछूत और जात-पात उसी तरह कायम हैं वहीं दूसरी तरफ पढ़ लिखकर वहां से निकलकर शहरों में अपना गरिमा पूर्ण नया जीवन जीने वाले प्रतिभाशाली दलित लोग हैं।
अपने जीते जी जिन लोगों को जमीन से कुर्सी पर नहीं बैठने दिया, उन्हीं के सामने अपनी नगण्य हैसियत देखना शोषक जातियों को शर्मसार करता है। फुलवा कहानी झूठे दंभ, झूठे जातीय गौरव पर कुठाराघात करती है।
फुलवा कहानी शुरू होती है गांव के रामेश्वर द्वारा शहर में जाकर उसके गांव के पंडित का पता ढूंढने से। रामेश्वर गांव के जमींदार बलकार सिंह का अधेड़ उम्र का बेटा है। पंडित को गांव में जहां सभी जानते पहचानते थे, यहां शहर में कोई नहीं जानता- इस बात से रामेश्वर को बहुत हैरानी है। फिर याद आती है उसे गांव की फुलवा जो वहां से निकाल कर अब शहर में रहती है ।उसका पता भी रामेश्वर के पास है और किसी की सहायता से वह पहुंच जाता है फुलवा के घर!
कहानीकार ने एक साथ दो चलचित्र दिखाएं हैं । एक- गांव में फुलवा की जिंदगी का, जो शोषण और तकलीफ से भरी थी और दूसरा, जिसमें फुलवा के जीवन के सुखद बदलाव को देखकर रामेश्वर की कुढ़न का। फुलवा के संघर्षों के साथ-साथ उसकी मेहनत और जिजीविषा को नाटकीय तरीके से दिखाया गया है । नाटकीय इसलिए क्योंकि फुलवा उन बहुत कम वंचितों में गिनी जाएगी, जिनकी संतान एक दिन एसपी जैसी सामर्थ्यवान पोस्ट तक पहुंचती है।
फुलवा के घर को कहानीकार ने आलीशान दिखाया है। घर की एक-एक चीज का बारीकी से चित्रण किया गया है । सामानों की भव्यता सिर्फ वस्तुगत नहीं बल्कि भावगत रूप से महसूस की जा सकती है। दूसरी तरफ पंडित की मृत्यु और उसके घर की स्थिति का खाका खींचा गया है।”नीची” कही जाने वाली जाति के ठाठ और ऊंची कही जाने वाली जाति की ग़रीबी को दिखाने में गहरा निहितार्थ है।
पंडिताइन और फुलवा की दोस्ती एक सकारात्मक संदेश देती है। दोनों की आत्मीयता गर्मी में ठंडी हवा का एहसास कराने में सफल होती है।
रामेश्वर, जो कि पूर्व में गांव में फुलवा की मदद करते रहने के बाद भी अपने जातिगत अहंकार से आकंठ भरा है,उसकी कुंठा का मनोवैज्ञानिक चित्रण करने में कहानीकार सफल रहे हैं तो फुलवा के आत्म सम्मान और स्वाभिमान को दिखाने में भी वह पूरी तरह सफल सिद्ध हुए हैं।
स्थापित सांचों को धता बताने वाली यह कहानी दलित विमर्श को सामने रख कर लिखी गई है। इस प्रकार की कहानियां सामाजिक बदलाव के लिए बहुत ज़रूरी हैं।
©डॉ. संजू सदानीरा



