बाळउँ बाबा देसड़ऊ पद की व्याख्या
बाळउँ बाबा देसड़ऊ पाँणी संदी ताति ।
पाणी केरइ कारणइ, प्री छंडइ अधराति ॥
प्रसंग
प्रस्तुत पद लोकप्रिय राजस्थानी प्रबंध काव्य ढोला मारू रा दूहा से लिया गया है। इसके रचयिता कवि कल्लोल माने जाते हैं।
संदर्भ
मालवणी मारवणी (मरवण/मारू) के गृह राज्य राजस्थान (मारवाड़) में बहुचर्चित पानी की किल्लत को लेकर जो कुछ भी कह रही है उसी का इस पद में चित्रण किया गया है।
व्याख्या
ढोला की दूसरी पत्नी मालवणी ढोला की एक ससुराल (ग़ौरतलब है कि ढोला की दो शादियां होने के कारण उसकी दो जगह ससुराल है) के बारे में पिता को संबोधित कर कहती है कि वह ऐसे देस/देश (स्थान) को आग के हवाले कर देगी, जहां हमेशा पानी का टंटा लगा रहता है। जिस देश में पानी लाने के चक्कर में प्रियतम को आधी रात को घर छोड़कर निकल जाना पड़ता है, वह देश जलाने के योग्य है। यहां जलाना “भाड़ में भेजना “ मुहावरे के तौर पर लिया जा सकता है, अभिधा में नहीं!
विशेष
1. मालवणी का अपने पिता के समक्ष ससुराल के संबंध में राय बताना आधुनिक सोच को दर्शाता है। हालांकि मूल कथा में वह ये बातें मरवण और ढोला को परिहास में कह रही है।
2. मालवणी के कथन के माध्यम से राजस्थान के भीषण जल संकट और उससे जूझते लोगों की पीड़ा को समझा जा सकता है।
3. इस पद से यह भी पता चलता है कि जल की इतनी कमी है कि लोग उसके प्रबंध के लिए अपनी नींद छोड़ अर्धरात्रि में ही जुट जाते हैं।
4. राजस्थान की ग्रामीण भाषा का सहज सौंदर्य द्रष्टव्य है।
5. शैली वार्तालाप से युक्त है।
© डॉ. संजू सदानीरा



