भारतीय संस्कृति में स्त्री सम्मान के दावे और हक़ीक़त
कुछ सालों पहले की फेसबुक पोस्ट है लेकिन सामाजिक दुर्भाग्य से यह आज भी प्रासंगिक है।
कल एक लड़के का कहना था (वैसे ज्यादातर यही कहते हैं) कि “सबसे ज्यादा सम्मान लड़कियों को भारत में मिलता है! “सबसे पहली बात तो बंद कीजिए ये सम्मान देना। औरत को देवी नहीं, इंसान समझ लीजिए बस। मत बनाइए उसे पूजनीय, साधारण इंसान है वो, पुरूषों की तरह गुण-दोषों से युक्त। दूसरी बात -किस “सम्मान की बात करते हैं लोग, कहाँ है वो सम्मान?
चलो जन्म के पहले से बात शुरू करते हैं। गर्भ में बच्चा आने के पहले “दूधो नहाओ, पूतो फलो” (“पूत” का मतलब तो पता ही होगा सबको) का आशीर्वाद दिया जाता है, लिंग जाँच परीक्षण क्यों करवाया जाता है और फिर आगे क्या होता है, जानते हैं हम।
रात-दिन गर्भ से बेटियाँ नोच के फेंकी जा रही है इस दिव्य संस्कृति वाले विश्व गुरू देश में। जन्म हो भी गया तो रीति-रिवाजों में अंतर। बेटा हो गया तो थाली बजती, ,कुँआ-पूजन, दशोठन (पुत्र जन्मोत्सव पर दिया जाने वाला भोज) जगराता, माता के भजन यानी तमाम “”मांगलिक” सुखद कार्य।इसके उलट बेटी होने पर मुँह लटक जाएगा (अपवाद न गिनाएँ) या छोटा-मोटा फंक्शन! अकसर लोगों को बोलते सुना- “भार आ गया इतनी जल्दी छोरे पे।”
अब बड़े होने पर विवाह किसी एक का नही, लड़के-लड़की दोनों का होता है, लेकिन दान “कन्या” का होता है, वर का नहीं क्योंकि वो लड़का है, वस्तु नहीं। विवाह में लड़की का बाप “बेटी का बाप” बन जाता है, जिसकी निरीहता छुपी नहीं।
अब शादी के बाद आमूलचूल परिवर्तन आएगा तो लड़की की दिनचर्या में। पहनावा, टाइम टेबल, रिश्तेदार,आदतें रातों-रात सब बदल जाना है उसका। खाएँगे सब, पकाएगी औरत, कपड़े पहनेंगे सब, धोएगी औरत, घर में रहेंगे सब झाड़ू -पोंछा करेगी औरत, इसमें आगे से आगे जोड़ते चले जाइए। जो औरत घर के चार-पाँच लोगों का खाना अपने जीवन के अधिकांश भाग तक पकाती है, उसके लिए ये चार-पाँच मिल के एक दिन नहीं बना सकते (अपने कुछ शहरी दोस्तों की बात नहीं कर रही हूँ)। वो खेत में,सड़क पर,अस्पताल में, स्कूल में कहीं पर भी कमा के आकर घर का सब कर सकती है और वही कमजोर भी मानी जाती है।
इसके बाद अगर पति की मृत्यु हो गई तो बड़ी बेदर्दी से वो सब आभूषण, साज-श्रृंगार, रंग-रोगन छीन लिए जाते हैं जो विवाह के साथ उसको दे दिए गये थे। जिन अमानवीय कुरीतियों से उसे गुजरना पड़ता है, उसकी ज़लालत समझने के लिए पुरूषों को दूसरा जन्म लेना पड़ेगा, जो कि होता नहीं।
रही बात भारतीय संस्कृति की तो ये सब हो उसी महान संस्कृति के अनुसार रहा है। समाज में हम अपना हक कानून और संविधान से चाहते हैं लेकिन पारिवारिक जीवन वेद-पुराण और धार्मिक ग्रंथों से चलाते हैं ।कानून में लिंग-भेद नहीं है, शिक्षा, स्वास्थ्य, संपत्ति पर समान अधिकार है, लड़की पराया धन नहीं है, तो फिर दिक्कत कहाँ है? बताया न, संस्कृति में!
किसी पति, पिता, भाई, बेटे को क्रमशः पत्नी, बेटी, बहन की लंबी उम्र के लिए कभी करवा चौथ,कभी दूज तो कभी कोई तीज करने की सलाह इस संस्कृति ने नहीं दी जबकि औरतों के लिए ऐसे बीसियों विधान बना रखे हैं। हमारी संस्कृति (धर्म ग्रंथ) कहती है कि वंश बेटों से चलता है, इसलिये बेटियाँ मारी जा रही हैं गर्भ में ही, हमारी संस्कृति कहती है कि बेटियाँ पराया धन है और कन्या दान का इतना महत्त्व बता रखा है कि खुद की बेटी नहीं है तो किसी रिश्तेदार की बेटी का कन्यादान कर देंगे लेकिन करेंगे ज़रूर।
एक ही खून होने के बाद भी माँ-बाप की चिता को अग्नि बेटे के द्वारा दिए जाने से उनको गति-मुक्ति मिलती है। घूँघट, पर्दा,शर्म को गहना, आवाज नीची रखना,गुस्से को दबा लेना ये सब तथाकथित संस्कृति लड़की को सिखाती है।
शारीरिक संबंध बनते तो लड़के-लड़की दोनों के बीच है, लेकिन कौमार्य भंग सिर्फ लड़की का होता है।सुबह-शाम,रात-बेरात आती-जाती लड़कियों को जंगली जानवर का नहीं, आदमियों (मने पुरूषों) का डर रहता है। कमाल की बात देखिए कि हर घर की लड़कियों और औरतों को दूसरे घर के मर्दों से खतरा है (खतरा तो हर वक्त उन्हें अपने घर के मर्दों भी है)!
कितने लड़के भेंट चढ़ गये भ्रुण हत्या,दहेज हत्या या दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म के? एक ने कहा कि लड़कों का भी यौन शोषण होता है। सही है, कौन करता है, अपवादों को छोड़ दो तो लड़कों का भी लड़के ही, परिवार,पड़ोस के पुरुष ही तो शोषण कर रहे होते हैं न?
बहुत गहरी तकलीफ है ये, सामूहिक तकलीफ है ये महिलाओं की, बात अभी तो सिर्फ शुरू हुई है, दासताँ बहुत लंबी है। सुनते रहना और कुछ न कर सको तो। सुनना भी नहीं चाहते पितृसत्तात्मक व्यवस्था से ग्रसित दिमाग वाले लोग। सुनना सीखना ही नहीं आया है। उसके लिए जिस अनलर्निंग की ज़रूरत है,उस पर किसी पाठ्यक्रम में ज़ोर नहीं है, ज़ोर है बस संस्कृति के नाम की ध्वजा उठाए रखने पर। इसीलिए आज 2026 ई में भी दस लड़कियों के बाद एक उनचालिस साल की महिला ग्यारहवें बच्चे के रुप में बेटे को जन्म देने को बाध्य है।
हरियाणा के जींद जिले से ख़बरों में आई यह विडंबनापूर्ण “खुशखबरी”। दम्पति निस्संतान नहीं था। दस बेटियां पैदा करवा दी गयी थी पत्नी से और ग्यारहवें बच्चे के रुप में बेटे के आने पर पूरे हॉस्पिटल को सजाया गया पति की तरफ से। मीडिया वाले बाकायदा उसका इंटरव्यू ले रहे थे। हालांकि मां यहां भी सीन से गायब थी।
सोचने वाली बात है कि पांच ग्राम एचबी और महज़ उनचालिस साल की उम्र में ग्यारह बार प्रसव पीड़ा झेलने वाली लड़की ने खुद अपना जीवन कितना जिया होगा!
सच बात तो यह है कि संस्कृति और कुछ नहीं, मर्दों को सहूलियत देने की जमी जमाई परिपाटी है।जो संवेदनशील पुरुष हैं,वे खुद नहीं चाहेंगे कि देश की एक पूरी आबादी इस तरह बोझ से दब कर मर जाए।बस दुख इस बात का है कि ऐसे संवेदनशील पुरुषों की संख्या अंगुली में गिनने लायक है। जिस दिन ऐसे पुरुषों की संख्या बढ़ेगी, रूढ़ियों की असलियत समझने की समझ विकसित होगी, तब कुछ उम्मीद भरा देखने को मिलेगा। तब तक बंद दिमाग और असंवेदनशील लोग ऐसी असंवैधानिक रूढ़ियों को गले से लगा कर संस्कृति का ढोल पीटते रहेंगे।
© डॉ. संजू सदानीरा



