जिण भुइ पन्नग पीयणा, कयर-कँटाळा रूंख पद की व्याख्या
जिण भुइ पन्नग पीयणा, कयर-कँटाळा रूंख ।
आके फोगे छाँहड़ी, हूँछाँ भाँजइ भूख।।
प्रसंग
प्रस्तुत पद राजस्थान के लोकप्रिय प्रबंध काव्य ढोला मारू रा दूहा से लिया गया है। इसके रचनाकार कवि कल्लोल माने जाते हैं।
संदर्भ
पूर्व पद की भांति ही इस पद में भी साल्ह कुमार अर्थात ढोला की दूसरी पत्नी मालवणी ढोला के बचपन में हुए विवाह के कारण बनी पहली पत्नी मारवणी के देस (मातृभूमि) राजस्थान की विषम भौगोलिक परिस्थितियों पर कटाक्ष कर रही है।
व्याख्या
मालवणी मारवणी से कहती है कि उसका देस अर्थात जन्म स्थान ऐसी भूमि में है, जहां जहरीले सांप मिलते हैं, जहां करील और ऊंटकटारा नमक कंटीली झाड़ियों को ही पेड़ों के रूप में गिना जाता है, जहां आक और फोग जैसे झाड़ीनुमा छोटे पेड़ों को छायादार पेड़ माना जाता है और जहां भुरूंट नामक कांटेदार घास के बीजों से पशुओं को अपनी भूख मिटानी पड़ती है। कहने का मतलब है कि मालवणी के अनुसार मारवाड़ में हरियाली और बड़े पेड़ों का अभाव है।
विशेष
1. मालवणी राजस्थान के रेतीले इलाकों की तस्वीर पेश कर रही है। राजस्थान का एक बहुत बड़ा क्षेत्र आज भी बारिश और वनस्पतियों के अभाव से युक्त है।
2. मारवणी के प्रति उसकी सपत्नी ईर्ष्या उसकी ऐसी बातों से साफ झलकती है।
3. ठेठ राजस्थानी भाषा का सौंदर्य विराजमान है।
4. वार्तालाप शैली का प्रयोग किया गया है।
© डॉ. संजू सदानीरा



