डिजिटल बर्नआउट (Digital burnout) क्या है? ज़्यादा स्क्रीन टाइम से होने वाले नुकसान
क्या आप भी बिना वजह अजीब सी थकान महसूस करते हैं जबकि आपने ज़्यादा कुछ काम नहीं किया होता है? शरीर में एनर्जी नहीं महसूस होती कुछ काम करने में मन नहीं लगता इस वजह से चिड़चिड़ापन और तनाव महसूस होता है? सारे ज़रूरी काम पेंडिंग रह जाते हैं और दिन कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता? तो आप अकेले नहीं हैं आज पूरी दुनिया डिजिटल बर्नआउट से जूझ रही है। आज के समय में ज़्यादातर लोगों के दिन की शुरुआत फ़ोन के स्क्रीन के साथ होती है और सोने के पहले तक फ़ोन उनके हाथ में होता है। ज़रूरत से लेकर आदत का सफ़र कब लत में बदल जाता है पता ही नहीं चलता।
मोबाइल फ़ोन आज हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्सा बन गया है। कैब बुक करना हो, शॉपिंग हो या फूड ऑर्डर या फिर घर में कोई मरम्मत करवानी हो मोबाइल फोन इन सब का ज़रूरी समाधान बन जाता है। यही नहीं मोबाइल बहुत सारे लोगों की आमदनी का भी ज़रिया बन चुका है। यही वजह है कि इसे पूरी तरह से छोड़ पाना मुमकिन नहीं है। सोशल मीडिया हो या ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स हमेशा ऑनलाइन रहने और अपडेट रहने के चक्कर में हम खुद को कहीं पीछे छोड़ देते हैं। जो तकनीक हमारी ज़िंदगी आसान करने के लिए बनी थी वही हमारी ज़िंदगी को मुश्किल बना रही है।
डिजिटल बर्नआउट (Digital burnout) क्या है?
डिजिटल बर्नआउट एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति लंबे समय तक स्क्रीन से जुड़े रहने की वजह से शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से थक जाता है। यह कोई अचानक होने वाली प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह धीरे-धीरे हमारी आदतों के साथ जुड़ता चला जाता है। एक रिसर्च के अनुसार लगातार मोबाइल और लैपटॉप जैसी डिजिटल डिवाइस के संपर्क में रहने से मानसिक और भावनात्मक थकान विकसित हो जाती है इस डिजिटल बर्नआउट कहा जा सकता है।
जब हमारा दिमाग लगातार बिना रुके नोटिफिकेशन्स, मैसेजेस और इनफॉर्मेशन को प्रॉसेस करता है तो वह लगातार ऐक्टिव मोड में रहता है जिससे आराम करने का समय नहीं मिल पाता है और यही धीरे-धीरे थकान में बदल जाता है। यह थकान शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तीनों रूपों में असर डालती है जो हमारी सेहत के लिए ख़तरनाक हो जाता है।
डिजिटल बर्नआउट के संकेत: क्या आप भी इसका सामना कर रहे हैं?
डिजिटल बर्नआउट धीरे-धीरे इस तरह से हमारे रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं कि इसे पहचान पाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। फिर भी कुछ ऐसी बातें हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए जिससे आप इसे आसानी से पहचान सकते हैं। डिजिटल बर्नआउट के शारीरिक लक्षणों में से सबसे पहला लक्षण थकान को माना जा सकता है। लगातार स्क्रीन टाइम के संपर्क में रहने से आंखों में तनाव, धुंधलापन, सर दर्द, गर्दन और कंधों का दर्द सबसे आम समस्याएं है। इसके साथ ही नींद की समस्या भी शुरू हो जाती है क्योंकि स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट मेलाटोनिन पर असर डालती है जो की नींद के लिए एक ज़रूरी हार्मोन है।
इसके मानसिक लक्षणों में ब्रेन फॉग यानी किसी भी चीज पर फ़ोकस करने में कमी ऐसा संकेत है जिसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। इस सारी वजह से दिनचर्या पर असर पड़ता है और जो चिड़चिड़ापन को बढ़ाता है। ज़रूरी के काम पेंडिंग रह जाते हैं क्योंकि व्यक्ति के अंदर एनर्जी की कमी महसूस होती है और वह किसी काम में मोटिवेशन महसूस नहीं करता। इस वजह से काम टालने की आदत हो जाती है जो कि तनाव को और बढ़ाती है।
इन सब का असर व्यक्ति की मानसिक सेहत पर पड़ता है। वह ख़ुद को सबसे अलग थलग और अकेला महसूस करने लगता है। रोज़मर्रा के काम प्रभावित होते हैं तो चिंता और उदासी बढ़ जाती है। दिमाग शांत नहीं रह पाता और इसमें मूड स्विंग्स भी हो सकते हैं। डिजिटल बर्नआउट में लोगों से मिलने जुलने और सामाजिक गतिविधियों में रुचि कम हो जाती है। साइकोलॉजी टुडे के अनुसार यह लक्षण आमतौर पर सामान्य बर्नआउट से मिलते जुलते हैं, लेकिन यह डिजिटल ओवरलोड से ट्रिगर होते हैं। अगर यह चीज आपकी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल हो रही है तो यह सामान्य थकान नहीं बल्कि डिजिटल बर्नआउट का संकेत हो सकता है।
आख़िर क्यों होता है डिजिटल बर्नआउट?
डिजिटल बर्नआउट की सबसे बड़ी वजह है- लगातार स्क्रीन एक्स्पोज़र। लगातार नोटिफिकेशन्स और डिजिटल कनेक्टिविटी की वजह से कॉग्निटिव ओवरलोड बढ़ जाता है जिससे दिमाग जल्दी थक जाता है। इनफ़ॉर्मेशन ओवरलोड, ईमेल, सोशल मीडिया और ऐप्स के बीच लगातार स्विचिंग से दिमाग बँटता है और इससे स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल एक्टिव हो जाता है। इस तरह बार-बार स्विच करने से किसी एक काम में कंसंट्रेट करने में भी कमी आती है।
साइकोलॉजी टुडे के एक रिसर्च के अनुसार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसे जूम मीटिंग में ज़्यादा आंखों का संपर्क, ख़ुद को लगातार स्क्रीन पर देखना और नॉन-वर्बल सिग्नल्स को समझने का दबाव कॉग्निटिव लोड बढ़ाता है जिससे दिमाग जल्दी थक जाता है। इसी रिसर्च के अनुसार 60 से 80 फ़ीसद कर्मचारी डिजिटल ओवरलोड से प्रभावित पाए गए हैं। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ सोशल इंपैक्ट की रिसर्च भी बताती है कि ज़्यादा स्क्रीन टाइम एंज़ायटी और स्ट्रेस से जुड़ा हो सकता है ।
आज एआई और तकनीक के युग में पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ के बीच की सीमा रेखा धुंधली हो गई है। वर्किंग ऑवर के अलावा भी इम्प्लॉइज पर ऑनलाइन रहने का एक प्रेशर बना रहता है। जो डिजिटल बर्नआउट की एक बड़ी वजह है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर तुलना करने की आदत, FOMO (fear of missing out) आज के समय में एक और बड़ा दबाव बनाता है।
हर समय उपलब्ध रहने, हर मैसेज या नोटिफिकेशन पर रिएक्ट करने और हर अपडेट पर नज़र रखने का दबाव हमें स्क्रीन से चिपके रहने को मजबूर कर देता है। यह सब मिलकर हमारे दिमाग को हमेशा ऐक्टिव और अलर्ट मोड में रखते हैं जिससे आराम नहीं मिल पाता है जो आगे चलकर डिजिटल बर्नआउट की वजह बनता है।
डिजिटल बर्नआउट से राहत के असरदार तरीके
सबसे पहले तो यह समझना जरूरी है कि डिजिटल बर्नआउट सिर्फ़ आपकी ग़लती नहीं है। अक्सर हमें लगता है कि हम अपनी आदतों को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं लेकिन यह बात पूरी तरह सच नहींहै। दरअसल डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स कुछ इस तरह से डिजाइन किए जाते हैं कि हम ज़्यादा से ज़्यादा समय वहां बिताएं। एंडलेस स्क्रोलिंग, नोटिफिकेशन्स और अपडेट्स हमें इंगेज रखने के लिए ही डिजाइन किया गया है। लेकिन यह हमें ही ध्यान रखना होगा कि हमारे लिए क्या ज़रूरी है। इस पर ख़ास नज़र रखनी होगी कि कितना स्क्रीन टाइम ज़रूरी है और कहां यह लत बन जाती है।
डिजिटल बर्नआउट को ख़त्म करना कोई एक दिन का काम नहीं है लेकिन आदतों में छोटे-छोटे बदलाव थोड़े समय बाद बड़ी राहत दे सकते हैं। सुबह जागने के बाद का पहला घंटा और रात में सोने के पहले का आख़िरी घंटा हमारे लिए सबसे ज़रूरी होता है। इस समय हम जो कुछ करते हैं वह हमारी पूरी दिनचर्या पर असर डालता है। तो सबसे पहले इस समय में हमें स्क्रीन टाइम से बचना होगा। इससे दिमाग को आराम मिलेगा और वह कुछ क्रिएटिव सोच पाएगा। फ़ोन की सारी नोटिफिकेशंस हर समय ऑन रखना ज़रूरी नहीं है।
इसके अलावा स्क्रीन पर काम करते समय भी आप 20-20-20 रूल अपना सकते हैं, यानी हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड्स के लिए स्क्रीन से 20 फीट दूर देखें। डिजिटल वेलबींइग फीचर का इस्तेमाल कर हर दिन अपने स्क्रीन टाइम को मॉनिटर करें और यह देखें कि कितना समय ज़रूरी कामों में गया और कितना ग़ैर ज़रूरी कामों में। इससे आप अपने स्क्रीन टाइम को ट्रैक कर पाएंगे, इससे सेल्फ डिसिप्लिन आसान होगा। इसके साथ ही अपनी हॉबीज जैसे किताबें पढ़ना, घूमना, कुकिंग, ट्रैकिंग, पेट्स के साथ टाइम बिताना, वॉक और एक्सरसाइज से भी स्क्रीन टाइम कम करने में मदद मिलेगी।
आज डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूर जाना मुमकिन नहीं है लेकिन इसका इस्तेमाल सही तरीके से करना ज़रूरी है। अचानक से अपनी आदतों को पूरी तरह बदलना मुश्किल है लेकिन धीरे-धीरे करके एक-एक कदम आगे बढ़ना मुमकिन है। डिजिटल बर्नआउट एक तरह का वॉर्निंग सिग्नल है जो हमें रुक कर अपनी आदतों को देखने और उसे पर सोचने का मौका देता है। हमें याद रखना होगा कि डिजिटल दुनिया हमारी ज़िंदगी का हिस्सा है लेकिन यह हमारी पूरी ज़िंदगी नहीं है।
© प्रीति खरवार
Sources:
Digital Fatigue and Adolescent Mental Health: The Role of Screen Time and Social Validation

