इनसोम्निया (Insomnia) कैसे ठीक करें? नींद न आने की समस्या के 6 आसान और असरदार उपाय

इनसोम्निया (Insomnia) कैसे ठीक करें? नींद न आने की समस्या के 6 आसान और असरदार उपाय

 

आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि बिस्तर पर लेटे हैं, आंखें बंद हैं लेकिन दिमाग में लगातार विचार चल रहे हैं? यहां तक कि घड़ी की टिक टिक भी सुनाई देती रहती है और नींद जैसे कोसों दूर महसूस होती है। ऐसे ही घंटों बीत जाते हैं और सो नहीं पाते। फिर आप बेचैन होकर मोबाइल उठा लेते हैं और फिर एंडलेस स्क्रोलिंग या बिंज वॉचिंग का सिलसिला शुरू हो जाता है।

अगली सुबह शरीर पूरी तरह से थका हुआ होता है और कोई एनर्जी महसूस नहीं होती। किसी काम में मन नहीं लगता और दिन की शुरुआत खराब होने से पूरा रूटीन डिस्टर्ब हो जाता है और यही सिलसिला लम्बे समय तक चलता रहता है। इसी समस्या को मनोवैज्ञानिक भाषा में इनसोम्निया (Insomnia) कहते हैं।

इनसोम्निया नींद न आने की समस्या है जो आपकी डेली रूटीन को डिस्टर्ब कर आपकी सेहत और पूरी ज़िंदगी पर असर डालती है। आज की तेज रफ़्तार वाली ज़िंदगी, बढ़ता स्क्रीन टाइम, स्ट्रेस और इरेगुलर रूटीन ने इनसोम्निया को बढ़ावा देने का काम किया है जिससे आज दुनिया की एक बड़ी आबादी जूझ रही है।

 

इनसोम्निया (Insomnia) क्या है?

इनसोम्निया (Insomnia) नींद ना आने की एक आम समस्या है जिसमें व्यक्ति को नींद आने में मुश्किल होती है और अगर आ भी जाए तो बीच-बीच में टूटती रहती है या फिर सुबह जल्दी आंख खुल जाती है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन के इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ़ स्लीप डिसऑर्डर्स (ICSD-3) के अनुसार, इनसोम्निया में नींद आने में कठिनाई, नींद को लगातार बनाए रखने में कठिनाई या नींद की खराब गुणवत्ता शामिल होती है।

नींद के लिए सही माहौल मिलने के बावजूद अगर हफ़्ते में 3 या उससे ज़्यादा दिन साथ ही 3 महीने से ज़्यादा समय तक यह समस्या बनी रहती है तो इसे क्रॉनिक इनसोम्निया कहा जाता है। आमतौर पर बिस्तर पर लेटने के 30 मिनट के अंदर नींद का आना सामान्य माना जाता है। इससे ज़्यादा समय तक नींद न आए तो यह इनसोम्निया की शुरुआत हो सकती है। हालांकि कभी-कभार ऐसा होना नॉर्मल बात है लेकिन अगर यह एक पैटर्न हो जाए, तब इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।

साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार, दुनिया भर में 20 साल से ज़्यादा उम्र के 16 फीसद से ज्यादा वयस्क इनसोम्निया के शिकार हैं, जिसमें से लगभग 50 फीसद में में क्रॉनिक इनसोम्निया पाई गई। इसमें भी महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज़्यादा है। दुनिया भर में 10 से 30 फीसद वयस्कों को क्रॉनिक इनसोम्निया की शिकायत होती है।

https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S1087079225000747

 

इनसोम्निया  (Insomnia) के मनोवैज्ञानिक कारण (Spielman का 3P मॉडल)

इनसोम्निया के पीछे के मनोविज्ञान को समझने के लिए Spielman का 3P मॉडल बेहद कारगर माना जाता है। इसमें मुख्य रूप से तीन फैक्टर शामिल होते हैं..

1.Predisposing Factors (पूर्ववर्ती कारण)

यह व्यक्ति के व्यक्तित्व से जुड़े हुए होते हैं जो कि जन्मजात होते हैं। जैसे कि किसी का स्वभाव ही होता है बार-बार सोचना या फिर ज़्यादा सोचना। या फिर जैसे कोई परफेक्शनिस्ट है तो वह हर चीज में परफेक्शन चाहता है। ऐसे में ओवर थिंकिंग की आदत विकसित हो जाती है, जो आख़िरकार इनसोम्निया की वजह बनती है। इसके अलावा इसमें जेनेटिक फैक्टर्स भी शामिल होते हैं जैसे परिवार में किसी को इनसोम्निया है तो उस व्यक्ति में इसकी आशंका बढ़ जाती है। इस तरह से देखा जाए तो कुछ पर्सनैलिटी और जेनेटिक फैक्टर व्यक्ति को इनसोम्निया के प्रति ज़्यादा सेंसिटिव बनाते हैं।

2.Precipitating Factors (ट्रिगर करने वाले कारण)

कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जो समस्या को ट्रिगर करती हैं। जैसे निजी रिश्तों में विवाद या अलगाव, नौकरी में समस्या या नौकरी छूट जाना, बिजनेस में घाटा हो जाना, प्राकृतिक आपदाएं और महामारी का आ जाना। इसी तरह अचानक से ख़ुद का या किसी करीबी का बीमार होना यह अचानक से रूटीन में बदलाव जैसे फैक्टर इनसोम्निया को ट्रिगर करते हैं। ज़्यादा स्क्रीन टाइम या किसी तरह का एडिक्शन होने पर भी नींद न आने की समस्या बढ़ सकती है। कुल मिलाकर कुछ ऐसी घटनाएं जो स्ट्रेस को बढ़ाती हैं, उनसे भी इनसोम्निया का ज़ोखिम बढ़ता है।

3.Perpetuating Factors (समस्या को बनाए रखने वाले कारण)

इसमें वे ग़लत आदतें और सोच शामिल है जो इनसोम्निया को बनाए रखने आपके लिए ज़िम्मेदार हैं। नींद को लेकर ग़लत धारणाएं (negative sleep beliefs) जैसे कि “मुझे नींद नहीं आएगी”, “मुझे ठीक से नींद नहीं आती” या “सोना अच्छी बात नहीं” नींद की समस्या को दूर करने में बाधा पैदा करती हैं। क्योंकि इस तरह की सोच से सब कॉन्शियस माइंड में यह इंस्ट्रक्शन जाता है कि “नहीं सोना है” ।

इसी तरह जागते वक़्त दूसरे कामों के लिए बिस्तर पर समय बिताने से दिमाग बिस्तर के साथ नींद को एसोसिएट नहीं कर पाता है और सोने के लिए बिस्तर पर जाने पर भी अलर्ट मोड में रहता है। इसी तरह दिन में ज़्यादा सो लेने से भी स्लीप साइकिल डिस्टर्ब होती है और रात में नींद आने में समस्या पैदा करती है। इसके अलावा सोते वक़्त मोबाइल फोन के इस्तेमाल करने से नींद लाने वाले हार्मोन मेलाटोनिन पर असर पड़ता है जिससे इनसोम्निया की समस्या और बढ़ती है।

https://insomnia.sleep-disorders.net/clinical/three-factors-model

 

इनसोम्निया और स्वास्थ्य के बीच संबंध

इनसोम्निया सिर्फ नींद की समस्या नहीं है बल्कि यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है। इनसोम्निया वाले लोगों में ओवरथिंकिंग की आदत विकसित होती है। इससे लंबे समय में चलकर स्ट्रेस, एंग्ज़ायटी और डिप्रेशन का ख़तरा बढ़ता है। दरअसल देखा जाए तो इनसोम्निया और मेंटल इलनेस के बीच दोतरफा संबंध होता है यानी दोनों एक दूसरे को बढ़ावा देते हैं। नींद की कमी चिड़चिड़ापन बढ़ती है काम में फ़ोकस करने में समस्या पैदा करती है जिस वजह से पूरा रूटीन डिस्टर्ब होता है। इससे व्यक्ति के रिश्तों पर भी असर पड़ता है।

नींद की कमी शरीर के हर सिस्टम पर असर डालती है जैसे कि हार्मोन बैलेंस, मेटाबॉलिज्म और इम्यून सिस्टम। नींद की कमी से हाई और लो ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, ओबेसिटी जैसी तमाम बीमारियों का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है। महिलाओं में होने वाले कुछ आम हॉर्मोनल डिजीज जैसे पीसीओडी (PCOD) का कनेक्शन भी नींद की कमी और स्ट्रेस से सीधे तौर पर देखा गया है।

इसके अलावा नींद की कमी इम्यूनिटी को कम कर देती है जिससे व्यक्ति बार-बार बीमार पड़ता है और बीमार होने पर ठीक होने में भी समय लेता है। इस तरह से देखा जाए तो अच्छी नींद केवल आराम के लिए नहीं बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए भी बेहद ज़रूरी है।

डेली रूटीन से इनसोम्निया कैसे ठीक करें? 6 आसान और असरदार उपाय

डेली रूटीन और स्लिप हाइजीन की आदतों में छोटे-छोटे बदलाव करके इनसोम्निया को काफ़ी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। रिसर्च में यह साबित हो चुका है कि इन छोटे-छोटे बदलाव से शरीर की आंतरिक घड़ी (circadian rhythm) को मजबूत किया जा सकता है जो अच्छी नींद के लिए बेहद ज़रूरी है। लगातार सही आदतें अपनाने से नींद की क्वालिटी बेहतर होती है और लंबे समय तक बनाए रखने से इनसोम्निया को कंट्रोल किया जा सकता है।

  1. इसमें सबसे ज़रूरी है- नींद का समय तय करना यानी स्लिप शेड्यूल बनाना। एक निश्चित समय पर सोने और जागने से बॉडी क्लॉक उसी हिसाब से एडजस्ट हो जाती है, जो सबकॉन्शियस माइंड को सिग्नल देता है कि कब सोना है और कब जगना है। कभी-कभार रात में देर भी हो जाए तो भी रोज की तरह सुबह निश्चित समय पर उठें और दिन में ज़्यादा सोने से बचें। अगर ज़्यादा नींद आ रही हो तो दोपहर की 20-30 मिनट की पॉवर नैप ले सकते हैं।
  2. इसके अलावा सुबह और शाम की आदतों पर भी ध्यान देना ज़रूरी है। हर दिन आधे से 1 घंटे फिजिकल एक्टिविटी पर देना चाहिए। इसमें वॉक, रनिंग, योग, डांस, एक्सरसाइज या आउटडोर स्पोर्ट्स जो भी पसंद हो आप अपने हिसाब से चुन सकते हैं। इसके अलावा सुबह आधे घंटे धूप में रहने से मेलाटोनिन हार्मोन को रेगुलेट करने और बॉडी क्लॉक बैलेंस करने में मदद मिलती है जो नींद के लिए बेहद ज़रूरी है।
  3. इसके अलावा स्क्रीन टाइम को कंट्रोल करना भी ज़रूरी है। दिन भर के लिए अपने स्क्रीन टाइम को कंट्रोल करें इसके लिए आप फ़ोन में मौजूद ऐप का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। सोने से एक-दो घंटे पहले मोबाइल, टीवी, कंप्यूटर, लैपटॉप के स्क्रीन से दूरी बना लें। सोने के दो-तीन घंटे पहले रात का खाना खा लें और इस दौरान अल्कोहल या कैफ़ीन लेने से बचें।
  4. बिस्तर का इस्तेमाल फ़ोन चलाने के लिए बिल्कुल न करें। इस का इस्तेमाल सिर्फ़ सोने के लिए करें और कमरे को अंधेरा और शांत रखें। सोने से पहले का एक रूटीन भी बना सकते हैं इसमें कोई हल्की-फुल्की किताब करना स्ट्रेचिंग या गुनगुने पानी से नहाना शामिल हो सकता है। अगर 15-20 मिनट या आधे घंटे तक में नींद ना आए तो बिस्तर पर लेते ना रहे उठ जाएं और जर्नलिंग करें रिलैक्सेशन करें या कुछ पढ़ें।
  5. ध्यान रहे नींद न आने की स्थिति में घंटों बिस्तर पर लेटे न रहें नहीं तो यह एक पैटर्न बन सकता है। हालांकि शुरुआत में यह सारे बदलाव मुश्किल लग सकता है लेकिन धीरे-धीरे करके अपने से कुछ हफ़्तों में सुधार देखने शुरू हो जाता है।
  6. इसके अलावा आप एक डायरी रख सकते हैं जिसमें सोने-जागने का समय नींद की क्वालिटी नोट करें। याद रखें एक साथ बहुत सारे बदलाव न लाएं वरना अचानक से दिमाग पर प्रेशर बढ़ सकता है। एक दो हफ़्तों में धीरे-धीरे एक-एक चीज लागू करें। तनाव कम करने के लिए डीप ब्रीदिंग या माइंडफुलनेस एक्सरसाइज भी कर सकते हैं। इन सबसे दो से चार हफ़्तों में सुधार न दिखें तो डॉक्टर या काउंसलर से सलाह लें क्योंकि कई बार प्रोफेशनल हेल्प की ज़रूरत पड़ सकती है।

याद रखें किसी भी तरह की नींद की दवाई बिना डॉक्टर की सलाह के ख़ुद से न लें। कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी इन्सोम्निया में बहुत कारगर साबित हुई है। अच्छी नींद केवल इनसोम्निया को दूर करने में नहीं बल्कि आपके पूरे स्वास्थ्य और व्यक्तित्व के लिए बेहद ज़रूरी है इसलिए इसे नजरअंदाज न करें।

 

FAQs

Q1. इनसोम्निया क्या होता है?

इनसोम्निया एक नींद से जुड़ी समस्या है जिसमें व्यक्ति को सोने में कठिनाई होती है, नींद बार-बार टूटती है या जल्दी जाग जाता है।

 

Q2. नींद न आने का मुख्य कारण क्या है?

नींद न आने के मुख्य कारण stress, anxiety, overthinking, गलत sleep habits और irregular routine होते हैं।

 

Q3. इनसोम्निया को घर पर कैसे ठीक करें?

डेली रूटीन सुधारकर, फिक्स sleep schedule, स्क्रीन टाइम कम करके, exercise और relaxation techniques अपनाकर insomnia को काफी हद तक ठीक किया जा सकता है।

 

Q4. क्या मोबाइल चलाने से नींद खराब होती है?

हाँ, मोबाइल की blue light melatonin hormone को दबाती है, जिससे नींद आने में दिक्कत होती है।

 

Q5. इनसोम्निया और anxiety का क्या संबंध है?

इनसोम्निया और anxiety एक-दूसरे को बढ़ाते हैं, जिससे sleep cycle और mental health दोनों प्रभावित होते हैं।

 

 

© प्रीति खरवार

 

ओवरथिंकिंग कैसे रोकें..

https://www.duniyahindime.com/overthinking-kya-hai-kaise-roke/#more-3220

 

यहां जानें ज़्यादा स्क्रीन टाइम से होने वाले नुकसान..

https://www.duniyahindime.com/digital-burnout-kya-hai/

 

Priti Kharwar

प्रीति खरवार एक स्वतंत्र लेखिका हैं, जो शोध-आधारित हिंदी-लेखन में विशेषज्ञता रखती हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में परास्नातक प्रीति सामान्य ज्ञान और समसामयिक विषयों में विशेष रुचि रखती हैं। निरंतर सीखने और सुधार के प्रति समर्पित प्रीति का लक्ष्य हिंदी भाषी पाठकों को उनकी अपनी भाषा में जटिल विषयों और मुद्दों से सम्बंधित उच्च गुणवत्ता वाली अद्यतन मानक सामग्री उपलब्ध कराना है।

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