यहां रोना मना है एकांकी के आधार पर कालिंदी का चरित्र चित्रण
यहां रोना मना है एक सामाजिक एकांकी है, जिसमें पितृसत्तात्मक समाज में लड़कियों की स्थिति को वास्तविक रूप में दर्शाया गया है। ससुराल ही लड़कियों का असली घर है, यह बात उनके सामने बचपन से इतनी बार दोहराई जाती है कि इस बात की उनके मन पर एक अमिट छाप पड़ जाती है। फिर तो विवाह के बाद तमाम शोषण के बावजूद वे वहीं रहना अपनी किस्मत मानने लगती हैं।
यहां रोना मना है एकांकी ममता कालिया द्वारा रचित है। ममता कालिया ने हिंदी साहित्य लेखन में अपनी सहज और बेबाक लेखनी के दम पर एक अलग मुकाम हासिल किया है। एक स्त्री होने के नाते उन्होंने स्त्री मन की पीड़ा और बेबसी का चित्रण अपनी रचनाओं में पूरी ईमानदारी से किया है।
यहां रोना मना है भारतीय समाज में ससुराल में लड़की की व्यस्त और त्रासद दिनचर्या पर आधारित एकांकी है। कालिंदी इस एकांकी की नायिका है।
कालिंदी के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का चित्रण निम्नानुसार है-
1.एकांकी की नायिका-
कालिंदी समीक्ष्य एकांकी की नायिका है। एकांकी शुरू से आख़िर तक कालिंदी के बदलते हुए जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है।
परिवार में लाड प्यार से पली हुई लड़की- आमतौर पर परिवार में लड़के-लड़कियों के बीच भेदभाव किया जाता है। समीक्ष्य एकांकी में इसके विपरीत दृश्य दिखाई देता है। कालिंदी की मां कालिंदी के खेलने कूदने पर पाबंदी लगाने के बजाय उसकी शरारतों पर मुग्ध होती है। उसकी मां उसके और उसकी सहेलियों के लिए बड़े प्यार से नाश्ता बनाती है। एकांकी के प्रमुख दृश्य में कालिंदी के प्रति परिवार के भरपूर स्नेह के क्षण मन को रोमांचित करते हैं क्योंकि हक़ीक़त में हमारे समाज में लड़कियों के लिए परिवार का इतना प्रेम अपवादस्वरूप ही दिखाई देता है।
2.सहनशील-
एकांकी में कालिंदी का चरित्र सहनशील स्त्री के रूप में चित्रित किया गया है। वह ससुराल वालों द्वारा दी जाने वाली यातनाओं और वर्जनाओं को सहन करती है। कालिंदी मायके में जितने लाड प्यार से पलती है, जितनी स्वतंत्रता और सहयोग का जीवन जीती है, ससुराल में उतने ही विपरीत माहौल को झेलती है। बात-बात पर ताने देने वाली सास, अपमानित करने वाली जेठानी, व्यंग्य करने वाले जेठ-ससुर और पिटाई करने वाले पति के कटु स्वभाव को परिवार की शांति के नाम पर कालिंदी सहन करती जाती है। यह सहनशीलता प्रशंसनीय तो कतई नहीं है।
3.संबंधों को समझने वाली-
कालिंदी एक समझदार युवती है। वह पारिवारिक संबंधों की मर्यादा को समझती है। वह समय-समय पर अपनी व्यवहार कुशलता का परिचय देती है। कालिंदी ससुराल में सभी के कहे अनुसार आचरण करती है। मां की मृत्यु पर मोहन द्वारा उसे भेजे जाने से मना करने पर वह नहीं जाती क्योंकि वह अपने पति से संबंध बनाए रखना चाहती है। इसके पीछे पितृसत्तात्मक समाज की वह सोच है,जो हर हाल में लड़की को ससुराल में एडजस्ट होना घुट्टी में पिलाती है । लड़कियां अपने पिता को अपने दुख बता कर दुखी न करने के लिए गहरी कंडिशनिंग का शिकार होती हैं।
4.पीड़ा को झेलती युवती –
एकांकी में कालिंदी का चरित्र भावुकता से परिपूर्ण है। मोहन द्वारा मां की मृत्यु पर मायके जाने से मना करने पर वह अत्यंत भावुक हो जाती है। वह अपनी मां की यादों में खो जाती है। उसकी आंखों के आगे मां के विविध दृश्य चित्र आते जाते रहते हैं। जैसे तरकारी काटती मां, पराठे सेंकती मां, कालिंदी के माथे का पसीना पौंछती मां, हंसती- मुस्कुराती मां और इन सब यादों में उलझ कर उसका मन बुरी तरह बिरखने लगता है।
5.स्थितप्रज्ञ हो जाना-
आखिर थक-हार कर कालिंदी चुप रहना सीख जाती है लेकिन इस बार की चुप्पी में एक प्रतिकार का भाव है। ससुराल में देवर की शादी है, जिसके कारण उसे मायके जाने से भी रोक दिया जाता है। मां को याद करती कालिंदी महिला संगीत में अचानक नाचने लगती है, नाचती ही चली जाती है और नाचते-नाचते बेहोश हो जाती है। सास कहती हैं कि उसे देवर के ब्याह का इतना चाव है कि इतना नाची कि बेहोश हो गई, लेकिन असलियत यह है कि न रो पाने की अपनी कसक कालिंदी ने सबके सामने इतना नाच कर, चेतना गंवा कर निकाली।
यहां रोना मना है, शीर्षक पूरी तरह से उपयुक्त है। आज भी लड़कियां ससुराल में अपने मन की इच्छा और पीड़ा दोनों ही सही तरह से अभिव्यक्त नहीं कर पाती। मायके के सुख-दुख के ऊपर आज भी ससुराल के सुख-दुख को तरजीह दी जाती है। कालिंदी कन्यादान के बाद ससुराली उपेक्षा से निढाल हो जाने वाली हर बेबस लड़की का प्रतिनिधित्व करती है। बस बात यही है कि अब हमारे समाज की कालिंदियों को बदल जाना चाहिए और उससे पहले बदल जाना चाहिए, उस व्यवस्था को, जिसके कारण यह स्थिति आती है।
© डॉ. संजू सदानीरा
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