आधी आबादी का पूरा सच

आधी आबादी का पूरा सच

 

औरत रूपी आधी आबादी का सच कहाँ से बताना शुरू किया जाये, ये मैं तय नहीं कर पा रही, पर इतना तय है कि जहाँ से भी शुरू करो, वह एक अमानवीय पक्षपात की शिकार नज़र आती है। रघुवीर सहाय की एक छोटी-सी कविता शायद मेरी मदद करे-

 

1″ पढ़िए गीता, बनिए सीता

फिर इन सबको लगा पलीता

किसी मूर्ख की हो परिणीता

निज घर-बार बसाइए

हाय कंटीली, लकड़ी सीली,

आँखे गीली तबीयत ढ़ीली

घर की सबसे बड़ी पतीली भात पसाइए

 

अगर औरत के प्रांरभ यानी लड़की के जन्म से ही बात शुरू की जाये तो आसानी से एक विचार बन जाता है कि भारत में जन्म एक उत्सव तो है पर जब जन्म शिशु रूप में लड़के का हुआ हो! लड़की के जन्म पर उत्सव हमारे यहाँ यदा-कदा कोई “वीर” माँ-बाप ही मनाते हैं। इस सम्बन्ध के तसलीमा नसरीन की पंक्तियाँ उद्‌धृत- करना चाँहूगी- “मैं चाहती थी कि जैसे लोग बेटा पैदा होने पर अस्पताल में टोकरी भर-भर कर मिठाई बँटवाते है, ठीक उसी तरह बेटी पैदा होने पर भी बंटवाए… जो स्त्री सृष्टि करती है, जिसका आदर होना चाहिए उसके जन्म पर दुख प्रकट किया जाता ही तो है, यह स्त्री की पीड़ा ही तो है।”2

1. प्रतिनिधि कविता – रघुवीर सहाय, पृष्ठ 17

2. यहां ऐसा मत कहो, पाप लगेगा (आलेख)

तसलीमा नसरीन, अहा! जिंदगी-सिंतबर 2006।

आज 2012 के इस उन्नत युग में भी हमारे भीतर का अमानुष निरंतर जग रहा है। रोज समाचार पत्र में एक समाचार अजन्मे मादा भ्रूण और सद्य: प्रसवित अबोध बच्चियों के फेंके जाने की ख़बरें रहती हैं। इसी साल इसी गुलाबी नगरी की चलती ट्रेन के टायलेट में फेंके जाने पर नवजात बच्ची के मरने की दिल दहलाने वाली ख़बर ने अपना असर कम किया भी न था कि सीकर के कल्याण अस्पताल में कमोड में मादा शिशु की लाश पाये जाने की घटना ने हिला दिया।(दोनों खबरें साल 2012)।

अभी-अभी संपन्न नवरात्र में भी दुर्गा के उपासक इसी देश में पहले नवरात्र से लेकर आख़िर तक रोज कभी कंटीली झाड़ियों में, कभी जंगल में, तो कभी नाले में मरने के लिए छोड़ दी गई नवजात बच्चियों का पाया जाना दर्शाता है कि आज भी समाज में पुत्री के जन्म को मातम से ही जोड़ कर देखा जाता है। इनमें अगर कन्या भ्रूण हत्या को शामिल कर लिया जाए तो आँकड़े और भी भयावह हो जाएंगें।

अगर कोई माँ-बाप अपनी बच्ची को जन्म देने का सुखद निर्णय कर भी लें तो क्या गांरटी है कि वह घर के बाहर खेलते-कूदते कभी पशुता का शिकार नहीं होगी? उससे भी बच गई तो बड़ी होकर ससुराल जाने पर उसकी साड़ी में आग नहीं लगेगी? (2026 के मई महीने में भी यह डर सच साबित हो रहे हैं), कार्यस्थल पर उसके साथ छेड़‌छाड़ नहीं होगी? किसी भी बात की कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि घड़ी की सुइयों की तरह निरंतर ये सब उसके साथ घटित हो रहा है।

हाल में जारी आंकड़ों के मुताबिक हर दिन 16 लड़कियां दहेज हत्या का शिकार हो रही हैं। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो कन्या भ्रूण हत्या, जन्म के बाद मरने के लिए फेंक देना, बलात्कार, छेड़खानी, दहेज हत्या तो ऊपर से दिखाई देने वाले अमानवीय कृत्य उसके साथ चल ही रहे हैं। लेकिन इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ है, जो ग़लत हो रहा है। उनका पहनावा लोग तय करेंगें। वे कितना पढ़ेगी, क्या पढ़ेगी, कहाँ पढ़ेंगी ये तय करना भी उनके हाथ में नहीं है।

मेरे कस्बे में कितनी ही लड़कीयाँ हैं जो जीवन में एकबार जीन्स पहन लेना भी अपना सौभाग्य मानती हैं। कितनी ऐसी हैं जो दसवीं, बारहवीं के बाद हाथ पीले कर ससुराल भेज दी गईं, जबकि वे अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण हुई थीं और आगे पढना चाहती थीं। वाणिज्य और विज्ञान की पढ़ाई हमारे यहाँ सह-शिक्षा में और कला में स्नातक के लिए एक ही कॉलेज में लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग व्यवस्था होने के कारण रुचि के विपरित बहुत सी लड़कियाँ कक्षा संकाय में प्रवेश लेती हैं।

कुदरत ने लड़के-लड़की की शारीरिक संरचना अलग-अलग की है। यहाँ भी इन्हीं की मुसीबत! पीरिएड्स के दौरान लड़की को पूजाघर, रसोईघर और अन्य ज़रूरी चीजें यहाँ तक कि बिस्तर भी छूने की पाबंदी रहती है। बहुतों को तो मैंने जमीन पर बिस्तर लगाकर सोते देखा है। मनोवैज्ञानिक रूप से औरत को कमज़ोर माना जाता है जबकि सदियों से लड़की की दिनचर्या हम देख ही रहे हैं। जन्म के कुछ सालों बाद वे वातावरण से समायोजन बना लेती हैं। पिता का घर छोडकर वे एक दिन नितांत नवीन परिवेश, पराये परिवार/ परिवेश में जाती ही नहीं, उसे अपने समर्पण और परिश्रम से एक नया रूप देती हैं।

शारीरिक रूप से स्त्री को कमज़ोर माना जाता है जबकि एक औरत की दिनचर्या को ध्यान से देखा जाये तो यह बात ग़लत साबित हो जाएगी। मेरे आस-पास की औरतें सुबह-सुबह पति के साथ जब खेत में काम पर जाती हैं हैं तो सिर पर रोटी की टोकरी, गोद में बच्चा और पति के हाथ में पशु की रस्सी होती है। वापसी में औरतों के सर पर कभी सूखी लकड़ियां तो कभी घास का गट्ठर होता है।

घर आते ही जहाँ पुरूष आँगन में खाट डालकर बीड़ी-चिलम सुलगा लेते है, वहीं औरतें गाय-भैंसे को चारा-पानी देती है, दूध दूहती हैं। चूल्हा जलाती है। खाना पकातीं, खिलाती और बर्तन साफ करती हैं। उसका काम खेत जाने से पहले शुरू हुआ था और बिस्तर में जाने तक चलता है। इस संदर्भ में एक पत्रिका का एक कथन उल्लेखनीय है- “महिलाएं दिन में पुरुषों से 6 घंटे ज़्यादा कार्य करती है। वर्तमान दुनिया में काम के घंटो में 60 प्रतिशत भी ज़्यादा योगदान स्त्रियाँ करती हैं। वे सिर्फ 1 प्रतिशत संपति की मालिक हैं।”3..

धार्मिक दृष्टि से देखे तो दुनिया के सारे व्रत-त्योहार जैसे औरतों के लिए ही बने हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि सारे व्रत पति व बेटे के लिए। उसके और उसकी बेटी के लिए दुनिया ने एक अकेला व्रत भी नहीं बनाया । गांव-कस्बों में आज भी औरतें पति की लंबी आयु के लिए करवाचौथ करती हैं।अब तो दूरदर्शन ने इस अंधविश्वास को घर-घर तक पहुंचा दिया है।

दीवाली के आठ दिन पूर्व “बेटों की माँ” एक व्रत रखती है, तो होलिका दहन पर भी एक व्रत रखा जाता है, जो ‘बेटे की माँ ‘के लिए है। ‘बेटी की माँ के लिए नहीं। मुझे बेहद प्यार करने वाली अपनी माँ को मैंने सारे व्रत अत्यंत निष्ठा से रखते देखा है।

एक और महत्त्वपूर्ण सामाजिक पंरपरा है- विवाह, जिसके भी परिणाम (दुष्परिणाम) सिर्फ लड़कियों के लिए ही बने हैं। विवाह स्त्री-पुरुष या लड़के-लड़की दोनों का होता है, परन्तु उसके साथ ज़िन्दगी में आमूलचूल परिवर्तन होता है लड़की के। जो लड़की अपने घर में अपनी मर्ज़ी से सोती थी, उठती थी, काम करती थी, अब वही ससुराल वालों के अनुसार अपना ‘टाईम टेबल’ सेट करेगी। सुबह ज़्यादा देर से उठना शोभा नहीं देता तो रात में जल्दी सो जाना। रसोई घर अब उसका स्थायी निवास है। जहाँ दिन का ज़्यादातर वक़्त निकल जायेगा। कभी अपने कपड़े भी न धोने वाली लड़की को, कपड़े धोना, खाना बनाना, साफ सफाई करना, रिश्ते-नाते निभाना और भी जाने क्या-क्या करना होता है।

लड़के के लिए अब काम जहाँ आसान हो गया, वहीं लड़की के ऊपर अतिरिक्त ज़िम्मेदारियाँ आ गई हैं। यहाँ लड़के की आर्थिक ज़िम्मेदारी का जिक किया जा सकता है। परन्तु वह ज़िम्मेदारी तो वो पहले से ही उठा रहा है, कोई नयी नहीं जुड़ी है। शादी के बाद, खान-पान, पहनावा, साज-शृंगार सब बदलता है तो लड़की का, लड़के का तो सब यथावत रहता है, या वह कभी कभार उत्सव में चाव-चाव में स्वेच्छा से जो बदल ले। ठीक इसी प्रकार जीवन साथी में से एक की मृत्यु पर भी जो बदलाव स्त्री के जीवन में आते हैं, वे पुरूष के जीवन में नहीं आते। एक बार फिर खान-पान, पहनावा और साज-सज्जा शृंगार सब बदलता है तो अकेली स्त्री का।

विवाह में होने वाली कन्या दान की रस्म की बात तो यहाँ छूट ही गई थी। कन्या-दान तो भारतीय शास्त्रों में वर्णित है क्योंकि कन्या वस्तु समझी गई है, जिसका संकल्प युक्त दान निर्दिष्ट है। परन्तु वर का दान निषिद्ध क्या कल्पनानीत है। रसोई घर का औरत के साथ नाता तो ऐसा अटूट बंधन के रूप में स्थापित है कि पुरुष को सहयोग करते देखकर लोग सहानुभूति ही जताने लग जाते हैं।

शहर में दर्जी पुरुष, होटल में रसोइया पुरूष परन्तु घर में सब औरत करें क्योंकि बाहर प्रशिक्षित और पेशेवर हैं। वो उनका व्यवसाय है। जहाँ इन कामों से अर्निंग नहीं वहाँ सब के सब काम औरत के जिम्मे। इसमें बच्चों को जन्म देना, उनका पालन करना यह सब तो ऐसे काम है जिनकी गिनती ही नहीं। सच पूछा जाए तो विवाह के उपरांत अगर पति की पढ़ाई ज़ारी रहती है तो उसे अब कितनी सुविधा हो गई है! पत्नी को तो सब ज़िम्मेदारियों और असुविधाओं के बीच में पढ़ना है।

मातृविहीन परिवार में लड़की धीरे-धीरे छोटे भाई-बहनों को तो संभालना सीख ही जाती है, पिता का भी शिशुवत ध्यान रखने लगती है परन्तु वह अपने ध्यान के लिए किसी से अपेक्षा करती है या नहीं, पता नहीं, पर उसे फिर भी कमजोर माना जाता है। तीन-तीन बेटों की माँ से कोई सहानुभूति नहीं जताता पर बेटी पहली भी हो तो लोग दिलासा के से स्वर में बात करने लगते हैं, “कोई बात नहीं, पहली लड़की है, लक्ष्मी है। अगली बार ज़रूर लड़का होगा ।” जाने कौन सा गड़ा धन बेटे देंगे और बेटी छीन लेगी !

प्राकृतिक रूप से भी औरत को अनेक जटिलताएं सहनी पड़ती है। पहले मासिक धर्म से समायोजन, फिर विवाह के उपरान्त कभी मातृत्व तो कभी मिस कैरेज (गर्भस्थ भ्रूण का नष्ट हो जाना) तो कभी अन्य स्त्री शरीर संबंधी व्याधियां, जो सिर्फ़ उनके लिए बनी हैं। उसके बाद भी वह जीती है, जिलाती है, संवारती है, जिसका उसे भरपूर प्रतिदान नहीं मिलता । यहाँ अकसर तो उसके स्त्री होने पर मज़ाक बनता है।

स्त्री जननांगों पर भद्दी और अश्लील टिप्पणियां जाने कब से प्रचलित हैं! जिस मार्ग (योनि) से पुरुष व स्त्री संसार में आते हैं, जिन स्तनों का पान कर जीवन व पोषण पाते हैं उन्हीं पर शर्मनाक मज़ाक प्रचलित है। इस सम्बन्ध में कहा जाए तो हमारे शब्दकोष पक्षपाती है। स्त्री के पर्यायवाची शब्द आपको मिलेगें-रमणी, कामिनी, अंगना।4. क्या वह महज रमण करने, काम-कीड़ा करने और आंगन की शोभा बढ़ाने की चीज है, उससे ज़्यादा कुछ भी नहीं? सच तो यह है कि “अक्षत यौवन” और “कौमार्य” जैसे शब्दों को तो तत्काल शब्दकोश से बहिष्कृत किए जाने की ज़रूरत है।

प्रभा खेतान ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था। “औरत की आज़ादी उसके पर्स से शुरू होती है।” बिल्कुल सही बात है। पर क्या आज भी स्त्री को अपने वेतन पर सम्पूर्ण अधिकार है? नहीं। आज भी वह पूछकर खर्च करती है। किससे? अपने अभिभावक से। यूं अभिभावक वाला भी एक रोचक मामला है। पति-पत्नी दोनों कामकाजी, पढ़े-लिखे होंगे तो भी किसी कॉलम में भरना हो तो पत्नी का अभिभावक बिना शक़ पति हो सकता है परन्तु पत्नी कभी पति की अभिभावक नहीं हो सकती। क्यूं भला? क्या अभिभावक बनने की योग्यता पिता/पति में ही है, मां/ पत्नी में नहीं?

गांवों में पति द्वारा पत्नियों के उत्पीड़न पर आज भी एक बात कही जाती है -” दुधारू गाय की तो लात भी खानी पड़ती है।”5. तो आज क्या पत्नी रूपी दुधारू गाय की लात खाना पति पसंद करेगा क्योंकि बहुत सारे मामलों में तो पत्नी ज्यादा जब काम रही होती है पति से। यहां मेरी किसी भी प्रकार के हिंसा के प्रति पक्ष धरता नहीं है, बस एक सीधा सा सवाल है, जिसका जवाब अपेक्षित है। आज भी लड़की के जल्दी-जल्दी चलने, जोर-जोर से हंसने, लड़कों से बात करने से उसकी बातें बन जाती हैं।

इस देश में प्रधानमंत्री तक हंसती हुई महिला की तुलना हिडिंबा से कर देते हैं हालांकि हिडिंबा से तुलना भी समझ से परे है। कितनी बलशाली और सामर्थ्यवान है हिडिंबा! तस्लीमा नसरीन की सुनें तो-” यदि कोई स्त्री अपने दुख, दैन्य, दुर्दशा को दूर करना चाहती है, धर्म, समाज और राष्ट्र नियमों के खिलाफ उठकर खड़ी होना चाहती है, हेय ठहराने वाली प्रथाओं -व्यवस्थाओं का विरोध करके अपने अधिकारों के प्रति सजग होने लगती है तो समाज के ‘भद्र पुरुष’ उसे ‘नष्ट लड़की’ करार देते हैं।6..

ठीक भी है स्त्री के मुक्त होने की पहली शर्त ही है- नष्ट होना। नष्ट हुए बिना इस समाज के नागपाश से किसी स्त्री को मुक्ति नहीं मिल सकती। वही स्त्री सच में सुखी और प्रबुद्ध है जिसे लोग नष्ट अथवा बदनाम कहते हैं।

आधी आबादी का सच यही है कि आज भी वह जन्म के पहले मार दी जाती है, जन्म के बाद मरने के लिए फेंक दी जाती है, रास्ते चलते, स्कूल-कॉलेज आते-जाते अपने-पराए द्वारा छेड़खानी और बलात्कार का शिकार होती है। दहेज के बावजूद,बिना मर्जी और इच्छा के विवाह बंधन में बंधती है और दहेज हत्या का शिकार होती है।

एक बात और, पैतृक संपत्ति में कानून हक कहने भर को है। एक तो सामाजिक मर्यादाएं इतनी हैं कि लड़की कभी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगती ही नहीं है और अगर मांगती है तो मायके का छूट जाना तय है।फिर वहां संबंध कटु हो जाएंगे, मधुरता ढूंढे नहीं मिलेगी। ऐसे में मायका छूटने के दर से वह कभी अपना हिस्सा नहीं मांग पाती जबकि लड़कों को यह हिस्सा बिना मांगे एक प्रकार से प्राकृतिक कानून की तरह से मिल जाता है।

महिलाओं की स्थिति के संबंध में ध्यातव्य है कि महिलाओं पर अत्याचार एवं हिंसा संबंधी प्राप्त आंकड़ों के अनुसार प्रति 23 मिनट में अपहरण, प्रति 26 मिनट में उत्पीड़न, प्रति 42 मिनट में दहेज हत्या,प्रति 54 मिनट में बलात्कार की घटनाएं घटित हो रही हैं।7.

वर्ष 1991 की जनगणना के मुताबिक जहाँ प्रति 1000 लड़कों पर 945 लड़कियां थी, वहीं 2001 में यह संख्या घटकर 927 पर पहुँच गई। पंजाब और हरियाणा में कुछ जिलों में तो यह संख्या 800 तक पहुँच गई। जबकि 2011 की जनगणना के मुताबिक यह संख्या 943 थी।

सब बातों के ऊपर एक बात कि उम्मीद पर दुनिया कायम है। स्त्री पूरी तरह जगी भले न हो, उसकी नींद टूटी है वह उनींदी है। जागरण भी आएगा ।महादेवी वर्मा के शब्दों में कहूं तो “हमें न किसी पर जय चाहिए, न किसी से पराजय, न किसी पर प्रभुता चाहिए, न किसी पर प्रभुत्व । केवल अपना वह स्थान,वह स्वत्व चाहिए, जिनका पुरुष के निकट कोई उपयोग नहीं परंतु जिसके बिना हम समाज का उपयोगी अंग नहीं बन सकेंगी।”8.

एक और बहुत ख़ूबसुरत ख़याल बाँटना चाहूँगी “ईश्वर ने सृष्टि रचते वक्त स्त्री पुरूष में कोई भेदभाव नहीं किया। मनुष्य ने सहूलियत के लिए काम बाँट लिए। धीरे-धीरे साथ में अधिकार भी बँट गए। स्त्री जागी और उसने बन्द दरवाजे पर दस्तक देना शुरू किया। दरवाजे पूरी तरह खुले भले न हों, लेकिन ताज़ी हवा आने लायक झरोखा ज़रूर बन गया है।”9.

अंत में स्पष्ट करना चाहूंगी कि यह आलेख 2012 में राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में वाचन हेतु तैयार किया गया था। दुखद सच्चाई है कि इसमें लिखे तथ्य आज भी प्रासंगिक है बल्कि कहीं-कहीं तो स्त्रियों के खिलाफ अपराध बढ़े हुए दिखाई दे रहे हैं। “आधी आबादी” शब्द अब प्रयोग में लेने के पहले विचार किया जाना चाहिए क्योंकि यह दुनिया स्त्री और पुरुष के बाइनरी नहीं देखी जा सकती। हमारे आसपास नॉन बाइनरी समूह अपने अस्तित्व की पहचान के लिए क़ानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ रहे हैं। स्त्रियों के खिलाफ अपराधों की गंभीरता दिखाने के लिए “पूरे सच” के बरक्स “आधी आबादी” शब्द शीर्षक को वजनदार बनाने के लिए रखा गया था।

स्रोत:

1.प्रतिनिधि कविता- रघुवीर सहाय पृष्ठ संख्या 17

2.ऐसा मत कहो पाप लगेगा (आलेख)- तसलीमा नसरीन,अहा जिंदगी -सितंबर 2006

3.प्रति दर्पण, जुलाई 2006, पृष्ठ 2284

4.अमित हिन्दी शब्द कोष, पृष्ठ 11, 216

5.कविता में औरत- अनामिका, पृष्ठ 23

6.नष्ट लड़की नष्ट गद्य- तसलीमा नसरीन,दो शब्द (भूमिका)

7.प्रति दर्पण, जुलाई 2006, पृष्ठ 2284

8.दैनिक युगपक्ष, मंगलवार,21 अक्टूबर 2003

9. शृंखला की कड़ियां-महादेवी वर्मा पृष्ठ 23, 24

10.जियो पर दहशत से (आलेख)-मैत्रेयी

पुष्पा, वनिता नवंबर 2008

 

© डॉ. संजू सदानीरा

 

https://www.duniyahindime.com/%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/

Dr. Sanju Sadaneera

डॉ. संजू सदानीरा प्रतिष्ठित मोहता पीजी कॉलेज में प्रोफेसर और हिंदी साहित्य विभाग की प्रमुख हैं। इन्हें अकादमिक क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का समर्पित कार्यानुभव है। हिन्दी, दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान विषयों में परास्नातक डॉ. संजू सदानीरा ने हिंदी साहित्य में नेट, जेआरएफ सहित अमृता प्रीतम और कृष्णा सोबती के उपन्यासों पर शोध कार्य किया है। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के स्नातक के पाठ्यक्रम के लिए इनकी किताबें विशेष उपयोगी हैं। ये "Dr. Sanju Sadaneera" यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी शिक्षा के प्रसार एवं सकारात्मक सामाजिक बदलाव हेतु सक्रिय हैं।

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