ठाकुर का कुआं कहानी पर प्रश्नोत्तरी और मूल संवेदना/सारांश
प्रश्न 1. ठाकुर का कुआं कहानी किसके द्वारा रचित है?
उत्तर- ठाकुर का कुआं कहानी प्रेमचंद द्वारा रचित है।
प्रश्न 2. ठाकुर का कुआं किस विधा की रचना है?
उत्तर- कहानी विधा।
प्रश्न 3. ठाकुर का कुआं शीर्षक से और कौन सी प्रसिद्ध रचना है?
उत्तर- ठाकुर का कुआं शीर्षक से महान लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता है जो सामंतवादी, शोषणकारी व्यवस्था का मार्मिक चित्रण करती है।
प्रश्न 4. इस कहानी का केंद्रीय विषय क्या है?
उत्तर- इस कहानी का मुख्य विषय जाति आधारित छुआछूत और अमानवीय भेदभाव है।
प्रश्न 5. अन्य किन विषयों पर यह कहानी बात करती है?
उत्तर- कहने को ठाकुर का कुआं एक छोटी आकार की कहानी है परंतु इसकी इतनी सी कहानी बड़ी-बड़ी कहानियों के विमर्श को परे बिठाती है। गंगी और जोखू की ज़िंदगी की कठिनाइयां दिखाने के साथ-साथ ठाकुर जैसे बाहुबली आदमी की ताकत का बेजा इस्तेमाल, रिश्वत देने को कला की तरह दिखाते हुए छुटभैये नेताओं की व्यर्थ दिनचर्या के साथ-साथ भारतीय परिवारों में मर्दों की सुविधाओं और औरतों के कष्टों को भी लेखक ने कुएं पर पानी भरने आई औरतों के एक- दो संवादों के माध्यम से दिखाया है।
प्रश्न 5. ठाकुर का कुआं कहानी की मूल संवेदना अथवा भावार्थ स्पष्ट करें।
उत्तर- ठाकुर का कुआं प्रसिद्ध कथा शिल्पी प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध और प्रासंगिक कहानी है। ईदगाह, पूस की रात, बूढ़ी काकी, नशा और सद्गति इत्यादि प्रेमचंद की अन्य महत्त्वपूर्ण कहानियां हैं।
ठाकुर का कुआं कहानी भारतीय समाज में व्याप्त बेहद शर्मनाक को प्रथा जातिवाद पर आधारित है। जल, जंगल, ज़मीन सभी वर्चस्ववादियों ने कुछ इस प्रकार कब्ज़ा किया है मानो उन्होंने ही इनका निर्माण किया है।
कहानी में जोखू नमक दलित अधेड़ अस्वस्थ व्यक्ति जब प्यास से बेहाल होकर पानी के लोटे को मुंह लगाता है तो उसमें से आ रही भयंकर बदबू से परेशान होकर वह पानी को पी नहीं पाता। इधर प्यास है कि बढ़ ही रही है। उसकी पत्नी दूसरे कुएं से पानी लाने की बात कह कर घड़ा और रस्सी लेकर निकलती है। अब जिस प्रकार से ठाकुर के कुएं से पानी भरने का मिशन वह चुनती है वह रोमांचक तो है ही शर्मिंदा करने वाला भी है।
पानी जैसी निहायत ज़रूरी और प्राकृतिक रूप से उपलब्ध वस्तु के लिए वह चोरों की तरह कुएं की जगत पर चढ़ती है। ठाकुर के घर के दरवाजे पर जमा लोगों के निकलने की, भीड़ के जाने और दरवाजे बंद हो जाने का इंतज़ार करना उसका डर दिखाने के लिए पर्याप्त है। इसी छुपे रहने के दौरान पानी लेने के लिए सवर्ण महिलाओं का वहां आना और उनकी बातचीत दिखाई गई है।
पानी के कुएं पर चढ़ने का हक़ तो उनका है लेकिन अपने अपने घर के मर्दों की बांदियों से ज़्यादा वह स्वयं को नहीं मानतीं। एक महिला तो यहां तक कहती है कि बांदियां भी उनसे ठीक हैं, उन्हें कुछ पैसे, आज़ादी और सम्मान तो मिलता है, उनके काम की पूछ तो होती है।
इन सबके जाने के बाद बड़े ख़तरे को उठाकर गंगी कुएं में एकदम आहिस्ता से घड़ा डालती है पानी भर भी जाता है इसमें और जैसे ही वह घड़ा खींचने को होती है कि तभी ठाकुर के घर का दरवाजा अचानक खुल जाता है। लेखक ने कहानी में इस घटना के लिए लिखा है कि ‘शेर का मुंह इससे अधिक भयानक न होगा’ गंजी के हाथ से रस्सी छूट जाती है और एक आवाज़ के साथ घड़ा पानी में गिरता है. ठाकुर कौन-कौन करते कुएं की तरफ भागता है और गंगी कुएं की जगत से कूद कर बेतहाशा अपने घर की तरफ भागती है।
विडंबना की तरह लगती है कहानी की आख़िरी पंक्ति। घर पहुंच कर देखा कि जोखू लोटा मुंह से लगाए वही मैला गंदा पानी पी रहा था’ इन पंक्तियों को पढ़ना किसी भी ज़िंदा सवर्ण इंसान के लिए शर्म से डूब मरने जैसा है। दलितों के शोषण की अंतहीन घटनाएं बताती हैं कि आज भी यह छुआछूत ख़त्म नहीं हुआ है। संविधान के कारण कम हुआ होगा। नौकरियों में वंचित तबकों की भागीदारी से इस तरह के भेदभाव में कमी हुई है जो सामंती सोच वाले लोगों को चुभती भी है। वे आज भी इस भेदभाव को स्वर्ण युग की तरह मिस करते हैं।
कहानी की एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि प्रेमचंद ने जोखू और गंगी को इस भेदभाव से अनजान नहीं दिखाया है। संवादों में उनका जो आक्रोश व्यक्त हुआ है वह आशा जगाने वाला है।
इस प्रकार ठाकुर का कुआं कहानी भारतीय समाज की बहुत बड़ी समस्या जातिगत भेदभाव और छुआछूत को रेखांकित करती है। कहानी प्रेमचंद के सरोकार और प्रतिबद्ध दृष्टिकोण को भी दर्शाती है। दुखद है कि यह कहानी आज भी प्रासंगिक है। कितना अच्छा हो कि आगे ऐसी कहानी बस कहानी रह जाए अतीत के शर्मिंदा करते दस्तावेज परन्तु भविष्य में न दोहराने योग्य।
© डॉ. संजू सदानीरा
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