People Pleasing क्या है?

हर किसी को खुश रखने की आदत कहीं आपको ही तो नुकसान नहीं पहुँचा रही? जानिए People Pleasing क्या है?

 

मान लीजिए हफ़्ते भर काम करने के बाद छुट्टी के दिन आपको देर तक बिस्तर पर पड़े रहने का मन है और आपका कोई दोस्त उसी दिन आपसे मिलने को कहता है, तो आप क्या करेंगे? क्या इस तरह की परिस्थितियों में आप भी हर बार तुरन्त “हाँ” कह देते हैं? जब आप मन से तैयार नहीं होते हैं लेकिन दूसरों को बुरा न लगे इसलिए अपनी इच्छा को मार कर उन्हें खुश करने के लिए मजबूरी में कुछ करते हैं तो मन में एक अजीब सी नाराज़गी होती है। न सिर्फ़ सामने वाले से बल्कि ख़ुद से भी कि मैं अपने लिए स्टैंड क्यों नहीं ले पाई/पाया?

यह स्थिति केवल दोस्तों या परिवार के लोगों तक सीमित नहीं है। यह घर, ऑफिस या दूसरे पब्लिक प्लेस किसी भी जगह हो सकती है, जहां आप अपनी इच्छाओं को दबाकर दूसरों को प्राथमिकता देते हैं। बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो अपनी बात खुलकर नहीं रख पाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि दूसरों को बुरा न लग जाए या फिर रिश्ते खराब न हो जाएं। दूसरों को खुश करने की यह कोशिश पीपल प्लीजिंग (people pleasing) कहलाती है। संकोच से शुरू हुआ यह व्यवहार धीरे-धीरे कब आदत बन जाता है पता ही नहीं चलता है।

लोगों की मदद करना रिश्तो को निभाना बेशक एक अच्छा व्यवहार है लेकिन जब यह आदत आपकी मानसिक सुकून और आत्मसम्मान से समझौता करने पर मजबूर करने लगे तो आपको इस पर ठहर कर सोचने की ज़रूरत हो सकती है।

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People Pleasing क्या है?

व्यवहार का एक ऐसा पैटर्न जिसमें व्यक्ति दूसरों से रिश्ते बनाए रखने, उनको नाराज़ होने से बचाने और ख़ुद को अच्छा साबित करने के चक्कर में अपनी इच्छाओं जरूरत तो और भावनाओं को लगातार अनदेखा करता जाता है इसे ही पीपल प्लीजिंग (people pleasing) कहा जाता है। यह कोई मानसिक बीमारी नहीं है बल्कि एक ऐसा बिहेवियरल पैटर्न है जो हमारे डेली रूटीन पर नेगेटिव रूप से असर डालता है।

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ऐसे लोगों के मन में इस तरह के विचार अक्सर चलते रहते हैं जिस वजह से वह दूसरों को किसी भी चीज के लिए मना नहीं कर पाता..

“अगर मैंने मना कर दिया तो सामने वाला मेरे बारे में क्या सोचेगा?”

“कहीं वह मुझसे नाराज़ न हो जाए”

“कहीं वो मुझे स्वार्थी न समझ लें।”

“कहीं लोग मुझे आलसी न समझ लें”

इस तरह के विचारों की वजह से व्यक्ति ख़ुद के लिए स्टैंड नहीं ले पाता और दूसरों की सही ग़लत बातों को भी मान लेता है और उसके लिए “हां” कर देता है। हालांकि शुरू में ऐसा करने से वह उस समय “न” कहने से होने वाले स्ट्रेस से तो बच जाता है लेकिन इसके एवज में उसके मन में लंबे समय तक ख़ुद को लेकर गिल्ट चलता रहता है।

People Pleasing की आदत क्यों और कैसे बनती है?

पीपल प्लीजिंग बिहेवियर कुछ लोगों में ज़्यादा तो कुछ में कम दिखाई देता है इसके पीछे बहुत सारे फैक्टर्स होते हैं। अब क्योंकि हर व्यक्ति अलग होता है उसका व्यक्तित्व अलग होता है। सबकी परिस्थितियां और परवरिश तरीके से होती है। इस वजह से लोगों में पीपल प्लीजिंग के अलग-अलग व्यक्तिगत, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हो सकते हैं।

1. बचपन के अनुभव

किसी भी व्यक्ति की आदतें, स्वभाव यहां तक कि पर्सनैलिटी डिवेलप होने में उसके बचपन के अनुभवों का बहुत बड़ा योगदान होता है। अगर किसी बच्चे को बचपन में प्यार, अपनापन और स्वीकार्यता इस शर्त पर मिली हो जब उसने दूसरों की बातें मानी हूं ऐसे में उसके मन में यह धारणा बैठ जाती है कि मैं जब दूसरों को खुश रखेगा तभी मुझे एक्सेप्ट किया जाएगा। कई बार इस तरह की आदतों के लिए की गई तारीफ़ बच्चे के लिए अनजाने में ही पीपल प्लीजिंग के लिए रीनफोर्समेंट का काम करती है जो बड़े होने तक एक पैटर्न का रूप ले लेता है।

2. अस्वीकृति (Rejection) का डर

कई बार लोगों के मन में या डर बैठ जाता है कि अगर उन्होंने किसी को किसी चीज के लिए मना कर दिया तो लोग उनसे नाराज़ हो जाएंगे और उनसे रिश्ता ख़त्म कर लेंगे। इस तरह से रिजेक्शन और अकेले पड़ जाने के डर की वजह से बहुत सारे लोग अपनी इच्छाएं और भावनाएं ज़ाहिर नहीं कर पाते और लोगों को खुश करने में लगे रहते हैं। पीपल प्लीजिंग पैटर्न की यह भी एक बड़ी वजह है।

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3. लो सेल्फ एस्टीम और कॉन्फिडेंस

साइकोलॉजिकल रिसर्च में यह साबित हो चुका है कि जब व्यक्ति के अंदर आत्म सम्मान और आत्मविश्वास की कमी होती है तो वह हर समय लोगों के एक्सेप्टेंस की कोशिश करता रहता है। वह अपने विचारों व्यवहार यहां तक कि जीवन मूल्यों को भी दूसरों की राय से जोड़ देता है। यानी उसके सर्कल के लोगों ने अगर उसकी बात पर सहमति जताई है तो वह उसे सही मान लेता है और अगर उन्होंने मना कर दिया तो वह उसे छोड़ देता है। ऐसा तभी होता है जब व्यक्ति को ख़ुद पर विश्वास नहीं होता है। इनका जीवन “लोग क्या कहेंगे” से निर्धारित होता है।

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4. विवाद से बचना

कुछ लोग किसी तरह के विवाद या बहस में पढ़ना नहीं चाहते इसलिए वह अपनी अस्ति व्यक्त करने की बजाय चुप रहना या “हां” कह देना आसान समझते हैं। उन्हें लगता है कि अगर मैं मना करूं तो मुझे इसके लिए बहुत सारे तर्क देने होंगे और हो सकता है सामने वाला उन तर्कों की काट रखता हो, ऐसे में एक लंबी बहस हो सकती है। इस वजह से सीधे “हां” कह कर तनाव से बचने की कोशिश करते हैं। यह एक तरह का कोपिंग मेकैनिज्म है, जो हमारा दिमाग स्ट्रेस से बचने के लिए इस्तेमाल करता है।

People Pleasing को कैसे पहचानें?

ज़रूरत, परिस्थिति, समय और इच्छा के मुताबिक हमें किसी चीज के लिए कभी “हां” तो कभी “न” भी कहना पड़ता है। पीपल प्लीजिंग बिहेवियर को समझने के लिए कुछ बातों को जानना बेहद ज़रूरी है। अगर नीचे दिए गए व्यवहार आपके साथ लगातार होते हैं या ऐसी स्थिति आप लगातार महसूस करते हैं तो मुमकिन है कि आपमें पीपल प्लीजिंग की आदत हो..

1.हर किसी को हर बात पर “हाँ” कह देना।

2.”न” कहने पर गिल्ट महसूस होना।

3.अपनी प्राथमिकताओं, इच्छाओं और ज़रूरतों को हमेशा आख़िरी स्थान देना।

4.दूसरों की नाराज़गी से डरना।

5.अपनी राय खुलकर ज़ाहिर न कर पाना।

6.बार-बार लोगों से वैलिडेशन की उम्मीद करना।

7.हर किसी को खुश रखना अपनी ज़िम्मेदारी समझ लेना।

8.ख़ुद से ज़्यादा दूसरों की परवाह करना

इनमें से कुछ बातें कभी-कभी होना आम बात है। लेकिन अगर यह आपकी रोज़मर्रा की आदत बन जाए तो इस पर ध्यान देना ज़रूरी हो जाता है। कोई भी व्यक्ति हर बात पर “हां” कह कर खुश नहीं रह सकता इसी तरह हर बात पर “न” कहना भी व्यावहारिक नहीं है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए यह समाज आपसी रिश्तों और अंतर्वैयक्तिक संबंधों पर टिका हुआ है, जिसमें लोग एक दूसरे के लिए होते हैं। लेकिन हर समय सिर्फ़ दूसरों को खुश रखना ख़ुद को दुखी कर सकता है। रिश्ते बेशक ज़रूरी हैं लेकिन ख़ुद का खयाल भी उतनी ही ज़रूरी है। दूसरों को खुश करने के चक्कर मेंअपने मानसिक सेहत से समझौता नहीं किया जा सकता।

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

1. People Pleasing क्या है?

*People Pleasing एक ऐसा व्यवहारिक पैटर्न है जिसमें व्यक्ति दूसरों को खुश रखने, उनकी स्वीकृति पाने या उन्हें नाराज़ होने से बचाने के लिए अपनी इच्छाओं, ज़रूरतों और भावनाओं को बार-बार नज़रअंदाज़ करता है।

2. क्या People Pleasing एक मानसिक बीमारी है?

नहीं। People Pleasing कोई मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि एक व्यवहार है जो समय के साथ आदत बन सकता है। हालांकि यह लंबे समय तक बना रहे तो तनाव, चिंता, आत्मसम्मान में कमी और भावनात्मक थकान जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है।

3. People Pleasing की आदत क्यों विकसित होती है?

इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे बचपन के अनुभव, रिजेक्शन का डर, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास में कमी, लोगों की स्वीकृति पाने की इच्छा और विवाद या टकराव से बचने की प्रवृत्ति।

4. कैसे पता चले कि मैं People Pleaser हूँ?

यदि आप हर बात पर “हाँ” कह देते हैं, “न” कहने पर अपराधबोध (Guilt) महसूस करते हैं, अपनी ज़रूरतों को हमेशा पीछे रखते हैं, दूसरों की नाराज़गी से डरते हैं या बार-बार लोगों से वैलिडेशन चाहते हैं, तो यह People Pleasing के संकेत हो सकते हैं।

5. क्या दूसरों की मदद करना भी People Pleasing है?

ज़रूरी नहीं। दूसरों की मदद करना एक अच्छा मानवीय गुण है। लेकिन जब आप अपनी मानसिक शांति, समय, स्वास्थ्य या आत्मसम्मान की कीमत पर बार-बार दूसरों को खुश रखने लगते हैं, तब यह People Pleasing बन सकता है।

6. क्या People Pleasing से रिश्ते बेहतर बनते हैं?

शुरुआत में ऐसा लग सकता है, लेकिन लंबे समय में यह व्यवहार मन में नाराज़गी, थकान, तनाव और असंतुलित रिश्तों का कारण बन सकता है। स्वस्थ रिश्ते दोनों पक्षों की ज़रूरतों और सम्मान पर आधारित होते हैं।

7. क्या People Pleasing की आदत बदली जा सकती है?

हाँ। जागरूकता, सीमाएं तय करना, ज़रूरत पड़ने पर “न” कहना सीखना, आत्मसम्मान बढ़ाना और अपनी भावनाओं को महत्त्व देना इस आदत से बाहर निकलने में मदद कर सकता है।

© प्रीति खरवार

Priti Kharwar

प्रीति खरवार एक Freelance Writer हैं, जो शोध-आधारित हिंदी-लेखन में विशेषज्ञता रखती हैं। Banaras Hindu University से Psychology में Masters प्रीति को हिन्दी भाषा में लेखन के लिए भाषा सारथी सम्मान और United Nations Population Fund की तरफ से Laadli Media Fellowship भी मिल चुका है। प्रीति का लक्ष्य हिंदी भाषी पाठकों को Mental health और सामाजिक मुद्दों पर आसान और बोलचाल की भाषा में कंटेंट उपलब्ध कराना है, जिससे लोग अपने जीवन में positive change ला सकें।

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