Negative Thoughts को कैसे Control करें? जानिए 7 Psychological और Practical तरीके
क्या आपको भी लगता है कि आपके साथ हमेशा बुरा होता है या आपकी किस्मत ही खराब है? कुछ भी शुरू करने से पहले पॉजिटिव कम नेगेटिव थॉट्स ज़्यादा परेशान करते हैं? लाइफ में कुछ अच्छा भी हो रहा है तो इसका नेगेटिव पॉइंट आपको पहले नज़र आता है? क्या आप हर वक्त नेगेटिव थॉट (negative thoughts) से घिरे रहते हैं? अगर ऐसा है तो आप अकेले नहीं है।
आज की तेजी से भागती दुनिया में नेगेटिव थॉट्स आना आम बात हो चुकी है। कभी आने वाले कल की चिंता तो कभी फेल होने का डर यह सब धीरे-धीरे मानसिक शांति को बुरी तरह से प्रभावित करने लगते हैं। नेगेटिव थॉट्स से घिरा व्यक्ति अपने को दूसरों से कमतर समझने लगता है, जिससे उसका कॉन्फिडेंस कम होता है और उसका असर उसके परफॉर्मेंस पर भी पड़ता है।
अगर negative thoughts आपकी भी समस्या है। जिसकी वजह से आप परेशान रहते हैं तो घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है। साइकोलॉजी और न्यूरोसाइंस की रिसर्च बताती है कि नेगेटिव थॉट को सही तकनीक और हेल्दी हैबिट की मदद से काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। इस लेख में हम जानेंगे की नेगेटिव थॉट्स क्या होते हैं और ये क्यों आते हैं। ओवरथिंकिंग और नेगेटिव थिंकिंग का क्या कनेक्शन है। साथ ही नेगेटिव थॉट्स को कंट्रोल करने के साइंटिफिक और आसान तरीके जिससे पॉजिटिव माइंड सेट डेवलप किया जा सके।
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Negative Thoughts क्या होते हैं?
ऐसे विचार जो व्यक्ति के मन में डर, चिंता, असुरक्षा, असफलता, गिल्ट या फिर सेल्फ डाउट पैदा करते हैं, उन्हें नेगेटिव थॉट्स कहा जाता है। हालांकि आमतौर पर हर व्यक्ति कभी ना कभी नेगेटिव थॉट से गुजरता है। लेकिन जब इसकी फ्रीक्वेंसी बढ़ जाए और इतनी ज़्यादा हो जाए कि इससे मेंटल हेल्थ पर असर पड़ने लगे, तब इसे कंट्रोल करना बेहद ज़रूरी हो जाता है। क्योंकि इससे व्यक्ति अपनी पूरी क्षमता के साथ परफ़ॉर्म नहीं कर पाता, जिसका असर उसके आउटकम पर भी पड़ता है। नेगेटिव थॉट्स की वजह से व्यक्ति न सिर्फ़ खुद परेशान रहता है, बल्कि इसका असर उसके रिश्तों, कॅरियर और ओवरऑल लाइफ पर पड़ता है
Negative Thoughts के एग्जांपल्स
नेगेटिव थॉट्स को पहचानने के लिए कुछ एग्जांपल्स की मदद ले जा सकती है अगर आपके मन में भी बार-बार इस तरह की बातें चलती रहती हैं तो यह समझना आसान हो जाता है कि आप नेगेटिव थॉट्स से होकर गुज़र रहे हैं..
“मैं कभी सफल नहीं हो पाऊंगी/गा”
“सब लोग मुझे जज करते हैं”
“मेरे साथ हमेशा बुरा ही होता है”
“मेरी तो किस्मत ही खराब है”
“मैं कभी खुश नहीं रह पाऊंगी/गा”
“कोई भी काम शुरू करने के पहले उसमें बाधा जाती है”
“कोई मुझे प्यार नहीं करता” या “मुझे कभी प्यार नहीं मिलेगा”
अगर इस तरह के विचार बार-बार मन में आते हैं जिसका असर आपकी डिसीजन मेकिंग पर पड़ने लगता है तो आपको सतर्क हो जाना चाहिए। आपको इन्हें पहचान कर इस कंट्रोल करने के लिए कोशिश करनी चाहिए।
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क्यों आते हैं negative thoughts ?
नेगेटिव थॉट्स का मतलब सिर्फ़ मूड खराब होना नहीं है इसके पीछे बहुत सारे साइकोलॉजिकल फैक्टर्स काम करते हैं। psychiatry.org और दूसरी साइकोलॉजिकल स्टडीज में नेगेटिव थॉट को रिपिटेटिव नेगेटिव थिंकिंग या रूमिनेशन भी कहा जाता है। नेगेटिव थॉट्स के पीछे छुपी वजहों को कुछ इस तरह से समझा जा सकता है।
1. Stress और Anxiety
psychologytoday की रिपोर्ट के अनुसार, लगातार स्ट्रेस या एंजायटी होने पर हमारा दिमाग सर्वाइवल मोड में चला जाता है। इसका मतलब यह है कि पहले से ही ख़तरों को भांप कर उसके लिए ख़ुद को उसके लिए तैयार करता है। यह एक तरह का coping mechanism है जो स्ट्रेस और एंजायटी से बचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन लगातार ऐसी स्थिति बने रहने से इससे नेगेटिव थॉट्स एक पैटर्न बन जाता है।
इसके पीछे यह साइकोलॉजी है कि किसी भी काम में किसी भी बात के लिए ज़्यादा से ज़्यादा बुरा क्या हो सकता है, पहले से सोच लेने से हम उसके लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाते हैं। लेकिन यही हमारे अंदर स्ट्रेस हार्मोन cortisol का लेवल बढ़ा देता है। जिसका नतीजा यह होता है कि व्यक्ति छोटी-छोटी बातों पर भी नेगेटिव रूप से सोचने का आदी हो जाता है।
2. Overthinking और Rumination
ओवरथिंकिंग और रूमिनेशन negative thoughts के लिए फ्यूल का काम करते हैं। इसमें व्यक्ति अपने साथ हुई किसी घटना के बारे में लगातार और बार-बार सोचता रहता है। परफेक्शनिस्ट लोगों में यह आदत ख़ास तौर पर पर पाई जाती है। रिसर्च बताती है कि रूमिनेशन समस्या का समाधान करने की वजह सेल्फ़ ब्लेम को बढ़ावा देता है। इस तरह से ओवरथिंकिंग रूमिनेशन मिलकर नेगेटिव थॉट्स के पैटर्न को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं, जो आगे चलकर स्ट्रेस, एंजायटी या डिप्रेशन जैसी बीमारियों को बढ़ावा देता है।
3. Social Media Comparison और FOMO
सोशल मीडिया पर दूसरों की परफेक्ट और खुशहाल ज़िंदगी देखकर उससे अपनी तुलना करना नेगेटिव थॉट्स की एक बड़ी वजह है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और लिंक्ड इन पर क्यूरेटेड कंटेंट इस समस्या को और बढ़ाते हैं। FOMO (Fear of Missing Out) और साइबर बुलींग इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। कई सारे साइकोलॉजिकल रिसर्च में यह पाया गया है कि सोशल मीडिया का ज़्यादा इस्तेमाल नेगेटिव थॉट्स, ओवरथिंकिंग और दूसरे मेंटल हेल्थ इश्यूज को और भी बदतर बनाता है।
4. Poor Sleep और थकान (Fatigue)
सही फिजिकल और मेंटल हेल्थ के लिए अच्छी नींद बेहद ज़रूरी होती है। कम या खराब नींद इमोशनल रेगुलेशन को बिगाड़ देती है। थका हुआ शरीर और दिमाग व्यक्ति को पहले से ही इमोशनल सेंसिटिव बना देता है। नींद की कमी कॉग्निटिव डिस्टॉर्शन को भी बढ़ाती है। कॉग्निटिव डिस्टॉर्शन सोचने का ग़लत तरीका है जो हकीकत को नेगेटिव रूप से मोड़ देता है। इसके साथ-साथ ही शरीर को ठीक से आराम नहीं मिल पाने से व्यक्ति एनर्जी महसूस नहीं करता है और ऐसे में नेगेटिव थॉट्स ज्यादा आने लगते हैं। इस तरह पुअर स्लीप और थकान नेगेटिव थॉट्स को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
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5. Past Trauma और Childhood Experiences
बचपन में हुए traumatic events जैसे bullying, abuse या ट्रॉमा व्यक्ति के सेल्फ एस्टीम को बिगाड़ कर रख देते हैं। इससे सेल्फ ब्लेम की आशंका बढ़ जाती है, कॉन्फिडेंस कम हो जाता है। ऐसे में व्यक्ति का ख़ुद को लेकर सोचने का तरीका पूरी तरह से नेगेटिव हो जाता है। बचपन में जब सही पेरेंटिंग नहीं मिलती है तो व्यक्ति का ठीक तरीके से कॉग्निटिव और इमोशनल डेवलपमेंट नहीं हो पाता है। जो आगे चलकर नेगेटिव थॉट्स के लिए जगह बनाता है और इस तरह से नेगेटिव थॉट्स एक पैटर्न बन जाता है। इसीलिए कहते हैं कि “हर बच्चा पैरेंट डिज़र्व करता है लेकिन हर पैरेंट बच्चा डिज़र्व नहीं करते।”
6. Unhealthy Lifestyle
खानपान की आदतें और लाइफस्टाइल हमारे शरीर के हॉर्मोन्स को रेगुलेट करने में अहम भूमिका निभाते हैं। dopamine, serotonin, oxytocin और endorphins को happy hormones कहा जाता है क्योंकि इनके रिलीज से हमें खुशी मिलती है। रिसर्च में पाया गया है कि डार्क चॉकलेट, केला, फर्मेंटेड फूड, अंडे और दूसरी हरी सब्जियां और सलाद हैप्पी हार्मोन्स को बढ़ाने का काम करती हैं। इसके उलट जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड स्ट्रेस बढ़ाने वाले हार्मोन्स जैसे cortisol को बढ़ाते हैं। इसके अलावा फिजिकल एक्टिविटी (जिम, वॉक, रनिंग, एक्सरसाइज, डांस एरोबिक्स वगैरह) से भी हैप्पी हार्मोन्स को बढ़ाया जा सकता है।
7. Lack of Purpose
हमें हर दिन सुबह उठने के लिए अलार्म की नहीं बल्कि एक पर्पज की ज़रूरत है जो हमें बिस्तर से उठने के लिए मजबूर कर दे। परपज या मकसद नहीं होने से व्यक्ति में एक तरह का खालीपन आ जाता है जो नेगेटिव थॉट्स के लिए जगह बनाता है। इसीलिए कहा जाता है “खाली दिमाग शैतान का घर होता है” क्योंकि जब ज़िंदगी का कोई मकसद नहीं रहता है तो दिमाग में नेगेटिव थॉट्स ज़्यादा चलते रहते हैं। इस तरह से देखा जाए तो negative thoughts की कोई एक वजह नहीं होती है।
Negative thoughts को कंट्रोल करने के 7 असरदार तरीके
नेगेटिव थॉट को कंट्रोल करने के लिए सबसे पहले यह जानना ज़रूरी हो जाता है कि उसकी वजह क्या है। अलग-अलग व्यक्ति में इसकी अलग अनगिनत वज़हें हो सकती हैं। इसमें इंसान के पर्सनैलिटी ट्रेट्स से लेकर उसके चाइल्डहुड एक्सपीरियंसेस और ट्रॉमा तक की भूमिका रहती है। इसलिए इससे निबटने के लिए अलग-अलग व्यक्ति के लिए अलग उपाय कारगर हो सकते हैं। इसके बावजूद कुछ ऐसे तरीके हैं जो सभी के लिए फ़ायदेमंद साबित होते हैं।
1. नेगेटिव थॉट्स को पहचानें (Identify Negative Thoughts)
नेगेटिव थॉट्स को दूर करने का पहला कदम उन्हें पहचानना है। Dialectical Behavior Therapy (DBT) और Cognitive Behavioral Therapy (CBT) में ऑटोमैटिक नेगेटिव थॉट्स (ANTS) की तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। यानी दिन में कई बार अपने विचारों को चेक करना कि क्या वे नेगेटिव तो नहीं हैं। अगर है भी तो उनकी फ्रीक्वेंसी कितनी है और वह किस समय ज़्यादा सक्रिय होते हैं। क्या कोई ट्रिगर प्वाइंट होता है जिससे नेगेटिव थॉट्स को बढ़ावा मिलता है। नोटिस करने से जागरूकता बढ़ती है और फिर उसके वजह हो को जानना आसान होता है।
2. विचारों को चुनौती दें
नेगेटिव थॉट्स को पहचानने के बाद ज़रूरी होता है उसकी एनालिसिस करना। Cognitive behavioral therapy मैं इस्तेमाल की जाने वाली नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) की पॉपुलर CCC तकनीक यानी “Catch it, Check it, Change it” इन सब में बेहद कारगर साबित होती है। इस तकनीक में तीन बातों पर ध्यान दिया जाता है। सबसे पहले negative thoughts को पहचानना (Catch it) उसके बाद उसे जांचना (Check it) फिर उसमें बदलाव करना (Change it) होता है।
3. Positive reframing
नेगेटिव थॉट्स को पहचान और उसकी एनालिसिस करने के बाद सबसे जरूरी काम होता है थॉट्स को रीफ्रेम करना। यानी नेगेटिव थॉट्स को पॉजिटिव थॉट्स में बदलना। शुरुआत में यह इतना आसान नहीं होगा लेकिन रेगुलर प्रैक्टिस से इसे आसान बनाया जा सकता है। एक एग्जांपल के तौर पर, अगर मन में ख्याल आया कि “मैं फेल हो गई/गया” तो उसको “यह मेरे लिए सीखने का मौका है” जैसे विचारों में बदलें। एक नौकरी का जाना उससे कुछ बेहतर प्रोफेशन जैसे अपना ड्रीम बिजनेस स्टार्ट करने की गुंजाइश बनाता है।
4. माइंडफुलनेस और मेडिटेशन (Mindfulness and Meditation)
American Brain Foundation और Hofmann की रिसर्च में पाया गया है कि माइंडफुलनेस नेगेटिव थॉट्स/रूमिनेशन को कम करता है। माइंडफुलनेस का मतलब है अपने प्रेजेंट में बिना जजमेंट के पूरी जागरूकता के साथ रहना। यानी वह तरीका है जिसमें जिस समय जो काम कर रहे हैं या जिस स्थिति में है उसी पर फोकस रखा जाता है। माइंडफुलनेस के लिए मेडिटेशन और डीप ब्रीदिंग का भी सहारा लिया जा सकता है। इससे अपने विचारों को समझना और उस पर कंट्रोल करना आसान होता है।
5. ग्रेटिट्यूड जर्नलिंग (Gratitude Journaling)
हमारे साथ कुछ अच्छी तो कुछ खराब दोनों तरह की घटनाएं होती रहती हैं। जीवन में अच्छे बुरे हर तरह के लोग मिलते हैं। समय भी हमेशा एक जैसा नहीं रहता कभी यह बहुत अच्छा होता है की यादगार बन जाए और कभी ऐसा भी होता है जिसे कभी भूलकर भी याद करना न चाहें। लेकिन हमेशा अपने साथ भी नेगेटिव चीजों के बारे में सोचते रहने से समस्याएं बढ़ती हैं। इसलिए ग्रेटीट्यूड जर्नलिंग इसके लिए एक कारगर उपाय साबित होता है।
हर रोज 4 से 6 ऐसी चीजों के लिए आभार व्यक्त करें, जो आपके जीवन को बेहतर बनाती हैं या जिससे आपको खुशी मिलती हो। Psychology Today और दूसरी रिसर्च में यह पाया गया है कि ग्रेटीट्यूड जर्नलिंग पॉजिटिव इमोशंस को बढ़ाने और नेगेटिविटी बायस को कम करने में मददगार साबित होता है।
6. Positive affirmations
हम जो अपने बारे में बोलते हैं, सुनते हैं, कहते हैं, धीरे-धीरे हम वैसे ही बन जाते हैं। Power of subconscious mind में लेखक Dr. Joseph Murphy ने कहा है कि शब्दों का असर कहीं न कहीं हमारे सबकॉन्शियस माइंड पर पड़ता है। इस तरह से हमारा दिमाग हमारी कही हुई बात को हक़ीक़त बनाने में जुड़ जाता है। इसीलिए अपने बारे में हमेशा पॉजिटिव बातें करें, पॉजिटिव सोचें और पॉजिटिव लिखें, इसे ही पॉजिटिव एफर्मेशन कहा जाता है। जैसे कि “मेरी किस्मत खराब है” को “मैं जो चाहती हूं वह मुझे मिल जाता है” जैसी बातों को रिप्लेस करें।
7. व्यायाम और शारीरिक गतिविधि (Exercise and Physical Activity)
अनेक साइकोलॉजिकल रिसर्चेज में यह साबित हो चुका है कि Physical Activity करने पर हमारे शरीर में Endorphins जैसे हैप्पी हॉर्मोंस का रिलीज बढ़ता है, जो मूड को बेहतर बनाते हैं और नेगेटिव थॉट्स को कम करते हैं। इसलिए हर दिन काम से कम आधा घंटा कोई फिजिकल एक्टिविटी करें। यह वॉक, एक्सरसाइज, जिम, योगा, एरोबिक्स, डांस या कोई मार्शल आर्ट कुछ भी हो सकता है। शुरुआत में हल्की एक्सरसाइज करें और धीरे-धीरे उसको बढ़ाएं। हफ्ते में चार से पांच दिन भी फिजिकल एक्टिविटी करने से सेहत में सुधार होता है और नेगेटिव थॉट्स में कमी आने लगती है।
अगर इन सब से भी आपकी समस्या का समाधान न हो तो प्रोफेशनल हेल्प लेने में ना हिचकें। American psychological association और दूसरे मेंटल हेल्थ इंस्टिट्यूट्स cognitive behavioral therapy को इसमें कारगर मानते हैं। नेगेटिव थॉट्स का आना पूरी तरह से नॉर्मल है लेकिन उन्हें अपने ऊपर हावी होने देना ज़रूरी नहीं है। अगर आप negative thoughts से जूझ रहे हैं तो अपनों से बात करें। ख़ुद से कोशिश करें, उसके बावजूद अगर समस्या बरकरार है तो प्रोफेशनल हेल्प लेना बेहद ज़रूरी हो जाता है।
FAQs
Q.क्या negative thoughts आना सामान्य है?
A.हाँ, occasional negative thoughts सामान्य हैं। समस्या तब होती है जब वे लगातार आने लगें।
Q.क्या meditation से negative thoughts कम हो सकते हैं?
A.हाँ, research बताती है कि regular mindfulness meditation stress और overthinking कम करने में मदद कर सकती है।
Q.Overthinking रोकने का सबसे आसान तरीका क्या है?
A.Thought awareness, journaling और deep breathing काफी मददगार हो सकते हैं।
Q.क्या social media negative thinking बढ़ा सकता है?
A.हाँ, excessive comparison और unrealistic content anxiety और self doubt बढ़ा सकते हैं।
© प्रीति खरवार
सोर्स: https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC6554130/



