पच्चीस चौका डेढ़ सौ कहानी का सारांश/ मूल संवेदना/भावार्थ
ओमप्रकाश वाल्मीकि हिंदी साहित्य में दलित चिंतक, लेखक और आलोचक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। निम्न माने जाने वाली जातियों के ऊपर हुए शोषण और अत्याचार को इन्होंने बड़ी गहराई से अपनी कहानियों में उजागर किया है। शव यात्रा, खानाबदोश, घुसपैठिए और सलाम उनकी प्रमुख कहानियां हैं। ठाकुर का कुआं इनकी प्रसिद्ध कविता है,जो शोषण के सामंतवादी रूप का सजीव चित्रण करती है। जूठन नाम से उनकी आत्मकथा है, जिसे हर किसी को पढ़ना चाहिए ताकि वर्चस्ववादी मानसिकता की वीभत्स असलियत को महसूस किया जा सके। दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र उनका महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक ग्रंथ है। हाशिए के समाज के शोषण पर आपबीती भरा इनका लेखन हिन्दी साहित्य को इनकी अमूल्य देन है।
पच्चीस चौका डेढ़ सौ ओमप्रकाश वाल्मीकिजी की एक अत्यंत मार्मिक कहानी है जिसमें एक गांव के एक दलित व्यक्ति की पीड़ा को हृदय स्पर्शी रूप से चित्रित किया गया है।
कहानी में गरीब बच्चा सुदीप जैसे-तैसे पढ़ लिखकर एक मामूली नौकरी पाकर भी प्रसन्न है। अपनी पहली तनख़्वाह के रूपयों के साथ वह गांव जा रहा है अपने पिता से मिलने। बस की यात्रा के दौरान वह अपने अतीत की यात्रा भी यादों के माध्यम से कर जाता है। हिचकोले खाती गांव की तरफ बढ़ती बस के साथ वह बरसों पीछे पहुंच जाता है। उसे अपने बचपन से अब तक की यात्रा में बरबस ही उस मुकाम की याद आ जाती है जो उसके पिता से जुड़ी घटनाओं से पाठकों को जोड़ती है। सारी कथा यहां से फ्लैशबैक में चलती है।
उसके पिता एक दलित निर्धन किसान थे। सुदीप की मां की बीमारी के वक़्त उन्होंने गांव के धनी सवर्ण चौधरी से सौ रुपए उधार लिए थे जिसे उन्होंने ब्याज सहित लौटा दिया था। मूल कहानी इसी घटना के गिर्द घूमती है। चौधरी सुदीप के पिता को कहता है कि बुरे वक़्त में वह उसके काम आया अब वह चौधरी के पैसे लौटा दें। सौ रुपए पर हर महीने पच्चीस रुपए ब्याज के बनते हैं। चार महीने के पच्चीस चौका डेढ़ सौ होते हैं।
चौधरी का अपना आदमी होने से वह उसके पिता को बीस रूपए माफ़ करने की बात करता है। बचे एक सौ तीस रूपए! बहुत प्यार से ब्याज मांगने के साथ-साथ मूल जब हो तब देने की कह कर चौधरी उसके पिता की नज़र में महान बन जाता है। उस अनपढ़, गरीब आदमी को “पच्चीस चौका डेढ़ सौ” एक अमिट पाठ की तरह से याद हो चुका है।
दूसरी तरफ उसका बच्चा संदीप स्कूल मास्टर के दिए पच्चीस के पहाड़े को घर पर याद करता है। पिता “पच्चीस चौका सौ” सुनते ही नाराज़ हो जाते हैं कि गरीब का बच्चा जानकर मास्टर ढंग से पहाड़ा भी नहीं सिखाते! उन्होंने उसे पच्चीस चौका डेढ़ सौ सिखा कर एक प्रकार से ग़लती में सुधार किया। बच्चा बाप का सिखाया ग़लत पहाड़ा अगले दिन स्कूल में सुना कर मास्टर का चांटा और जातिसूचक गालियां खाता है।
इस घटना के द्वारा स्कूलों में दलित बच्चों के प्रति अध्यापकों के दुर्व्यवहार को कहानी में सच्चाई के साथ दिखाया गया है। उस दिन पच्चीस चौका सौ या डेढ़ सौ-इस सवाल में उस बच्चे का बचपन फंस जाता है। बाद में बड़े होने के साथ धीरे-धीरे उसे अपने पिता का भोलापन समझ में आ जाता है।
बस के ब्रेक लगने से एक झटके से वह वर्तमान में लौट आता है। आज नौकरी के बाद जब वह पहली तनख़्वाह लेकर घर जा रहा है तो शोषण और दमन से भरी वे तमाम यादें पीड़ा से उसकी नसों को तड़का रही हैं।
घर जाकर वह पिता के सामने खुले पैसों की ढेरी लगा देता है। पच्चीस-पच्चीस सिक्कों की चार ढेरी लगाकर वह उनसे गिनवाता है और सुदीप अच्छी तरह अपने पिता को समझा पता है की पच्चीस चौका डेढ़ सौ नहीं सौ होता है।
इस ज्ञान को पाकर जो उसके पिता के मन पर गुज़रती है- कहानी में उसका बड़ा मार्मिक चित्रण किया गया है। उन्हें दुख अपनी अल्पज्ञता का नहीं बल्कि अपने विश्वास के छले जाने का हुआ। जिस चौधरी की दया वह पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से सीने से लगा कर रखे हुए हैं और उसकी चर्चा लोगों से करते नहीं थकता उस चौधरी ने उस पर दया नहीं की थी वरन् उसे ठगा-यह विश्वासघात उनकी गहन पीड़ा का कारण था। उनकी सांसों में शूल-सी चुभन होने लगी, उनका गला भर्रा गया । बेबसी में चौधरी के लिए उनके मुंह से बद्दुआ निकल गई।
इस प्रकार यह कहानी ग्रामीण परिवेश में व्याप्त शोषण के दुष्चक्र और जाति प्रथा के नाम पर एक इंसान के द्वारा दूसरे इंसान के शोषण की मानवीय कुप्रथा पर कुठाराघात करती है। कहानी की मार्मिकता पाठकों पर व्यापक प्रभाव छोड़ने में सफल होती है।
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© डॉ. संजू सदानीरा
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