अमृता प्रीतम की रचनाएँ
हिंदी और पंजाबी साहित्य की ख्यातिलब्ध रचनाकार अमृता प्रीतम समकालीन साहित्य में किसी परिचय की मोहताज नहीं है। अमृता प्रीतम की रचनाएँ ऐसी हैं कि प्रशंसक तो प्रशंसक, इनके विरोधी भी इनका लिखा पढ़ते हैं। भाषा की नवीनता और भावों की गहनता के लिए अमृता प्रीतम का साहित्य जगत में वही स्थान है, जो रीतिकाल में घनानंद का।
उनके व्यक्तित्व और पारिवारिक जीवन को लेकर पूर्व में लिखा जा चुका है, इस भाग में उनके कृतित्व (कृतियों) पर विस्तार से बात की जा रही है।
अमृता जी की रचनात्मक यात्रा का प्रारम्भ उनके जीवन के 16वें वर्ष में लिखी गई कविता से होता है,जो कि जीवनपर्यन्त चलती रही। 1936 में अमृता जी का प्रथम काव्य संग्रह “अमृत लहरों” प्रकाशित हुआ। अमृता जी ने ऑल इण्डिया रेडियो लाहौर के लिए गीत और रूपक भी लिखे ।
साहित्य अपने समय के साथ सदा ही कदम- ताल मिलाकर चलता है और साहित्य में परिवर्तन आना युग चेतना का प्रतीक होता है। भारत की स्वतन्त्रता के बाद जिस भारतीय साहित्य की रचना हुई उसमें विभाजन-विभीषिका,वतन छूट जाने की असीम पीड़ा मौजूद नजर आती है। यथार्थ में इस समय का रचा गया साहित्य विभाजन की राजनीतिक त्रासदी का मानवीय और मनावैज्ञानिक दस्तावेज है,जो कि भारतीय कथा-साहित्य में अपनी अलग पहचान रखता है।
सभी भारतीय भाषाओं- उर्दू, हिन्दी, पंजाबी, सिन्धी इत्यादि में भारत-पाक विभाजन की विभीषिका को लेकर उपन्यासों,कहानियों और कविताओं की रचना हुई। अमृता प्रीतम भी इस प्रभाव से अछूती नहीं रही। उन्होनें इस त्रासदी को अपनी लेखनी के माध्यम से अपने उपन्यासों, कहानियों और कविताओं में यथार्थ रूप में और सफलतापूर्वक प्रकट किया। अमृता प्रीतम द्वारा रचित ‘हीर-रांझा” जो कि वारिसशाह को सम्बोधित करके लिखी गई थी, अत्यन्त मार्मिक कविता है,जिसमें इस मानवीय त्रासदी का वर्णन आंसू भरे अंदाज में कुछ इस प्रकार किया गया है कि हमारे अन्तर्मन को स्पर्श कर जाती है।
अमृता प्रीतम के अतिरिक्त अन्य समकालीन साहित्यकारों द्वारा यथा, उर्दू में सहादत हसन मंटो की टोबा टेक सिंह, खोल दो, राजेन्द्र सिंह बेदी की लाजवंती, हिन्दी में कृष्णा सोबती की सिक्का बदल गया, भीष्म साहनी की अमृतसर आ गया तथा तमस, कमलेश्वर की कितने पाकिस्तान और मोहन राकेश की मुर्दों का टीला, सिन्धी में शेष अयाज की पड़ौसी, पंजाबी में कुलवन्त सिंह विर्क की घास इत्यादि भारतीय साहित्य की ऐसी सशक्त रचनाएँ है,जो विभाजन की विभाषिका को बड़ी गहराई से उकेरती है।
पुरस्कार व सम्मान –
अमृता प्रीतम को 1956 में साहित्य आकादमी का पुरस्कार “सुनेहड़े” कविता-संग्रह के लिये दिया गया था। 1969 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया । 1973 में दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्हें डी.लिट्. की उपाधी प्रदान की गई। 1979 में अन्तर्राष्ट्रीय वाप्तसरोव बुल्गारीया पुरस्कार,1981 में “कागज ते कैनवास” कविता संग्रह के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार,1983 में जबलपुर विश्वविद्यालय व विश्व भारती शांतिनिकेतन द्वारा डी.लिट्. की उपाधि प्रदान की गई। 1986 में वे राज्यसभा की सांसद मनोनीत की गई थी तथा 1987 में फ्रांस सरकार की ओर से उन्हें उपाधि प्रदान की गई ।अमृताजी को वर्ष 2000 में पंजाबी भाषा का शताब्दी-कवि सम्मान तथा 2004 में पद्म विभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया।
अमृता प्रीतम की रचनाएँ –
अमृता प्रीतम का रचना-संसार अत्यन्त समृद्ध है। उनके द्वारा रचित कहानियाँ,कविताएँ उपन्यास, निबंध,आत्मकथा,संस्मरण, संपादन- कार्य,विभिन्न भाषायी ग्रंथों का अनुवाद ये सब उनके बहुमुखी आयाम को दर्शाते हैं। अमृता प्रीतम की रचनाएँ फ़िल्म एवं नाट्य संस्मरणों के लिये भी चुनी गई हैं। उनके उपन्यास पिंजर पर निर्देशक चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने फ़िल्म निर्माण किया था। उनके द्वारा रचित कृतियों को सामान्य परिचय की दृष्टि से बिन्दुवार ढंग से निम्नतः दर्शाया गया है :-
(1) कविताएँ (2) उपन्यास (3) कहानियाँ (4) विविध (निबन्ध) (आत्मकथा)
(1) कविताएँ –
प्रत्येक भाषा में कुछ ऐसे लेखक होते हैं जो अपने – जीवन काल में ही एक मिथ की भांति स्थापित हो जाते हैं। अमृता प्रीतम (1919 से 2005 ) के साथ भी ऐसा ही हुआ। जब उन्होंने लिखना शुरू किया,उस समय भारतीय साहित्य में प्रगतिवादी लहर अभी शुरू ही हो रही थी,हालांकि पंजाबी में रोमान्टिक कविता का दौर था। अमृता जी की पहली कविता 1935 में प्रकाशित हुई। उसके बाद काव्य-संग्रह अमृत लहरां (1936), जीऊंदां जीवन (1939), तरेल धोते फूल (1941), ओ गीता वालिया (1942), बदलां दे पल्ले विच (1943), सांझ दी लाली (1943) और निक्की जिही सुगात (1947) इसी रोमांटिक शैली में प्रकाशित हुए ।
उनकी कविता का दूसरा दौर लोकपीड़ (1944), और पाथर गीटे (1946) से आरंभ होता है। इस समय अमृता जी की कविता पर भी प्रगतिवादी लहर का प्रभाव पड़ना शुरू हुआ। वह बंगाल के अकाल के बारे में बोली,संघर्ष करते मानव के प्रति और उस नारी के बारे में विद्रोही स्वर में बोलीं,जो अभी भी जागीरदाराना कीमतों में घिरी हुई थी। इस दौर में लम्मीयां वाटां (1947), मैं तवारीख हाँ हिन्द दी (1950) सामने आये। विशेषकर मैं तवारीख हाँ हिन्द दी में उन्होनें 1947 की त्रासदी को बहुत करूणामयी शैली तथा प्रगतिशील दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। उनकी प्रख्यात कविता “अज आखाँ वारस शाह नूं” भी इसी समय सामने आई।
अमृता जी की कविता का तीसरा दौर आजादी के बाद सामने आता है, जिसमें उनका काव्य संग्रह सच्ची वेला (1951) और सुनेहड़े (1955) को लिया जा सकता है। सुनेहड़े के लिए उन्हें भारतीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला। ये अमृता की कविता का शिखर-दौर था। वे एक प्रगीतात्मक शायरा थी, रोमांस उनकी कविता के केन्द्र में था।नारी- चेतना और उसकी व्यथा भी इनके काव्य में अनुभूति की अछूती उपमाओं सहित व्यक्त हुई है।
“सुनेहड़े” के बाद पंजाबी तथा बाकी भारतीय कविता में आधुनिकता की चर्चा हो रही थी। इसके बाद का दौर उनकी उस कविता का रहा जिसका सम्बन्ध आधुनिकता के साथ था। इनमें अशोका चेती (1957), कस्तूरी (1959), नागमणि (1964) और कागज ते कैनवस (1970) सामने आये। इससे अगले दौर में अमृता जी की जो कविता सामने आई,उनमें काव्य-संग्रह खामोशी ते पहलां (2001) और मैं तैनूं फेर मिलांगी (2004) गिने जा सकते हैं। अमृता जी की कविता का यह दौर ऐसा था जिसमें वह पूर्ववाद (ओरिएन्टलिज्म) की एक नई तलाश में थी।
उपन्यास –
कविता के साथ-साथ अमृता जी ने उपन्यास-साहित्य का भी सृजन किया। 1946 में उनका पहला उपन्यास ‘जयश्री’ प्रकाशित हुआ। उन्होनें 50 के करीब उपन्यास लिखे परंतु अधिकांश उपन्यास न तो स्वयं अमृताजी के घर पर उपलब्ध है और न ही प्रकाशकों के पास।
उनके द्वारा लिखे गए प्रमुख उपन्यास, जो हिन्दी में उपलब्ध हैं–डॉ. देव,नीना (घोंसला), पिंजर,बंद दरवाजा,रंग का पत्ता,एक थी अनीता,नागमणि,धरती सागर और सीपियाँ, दिल्ली की गलियाँ,जलावतन,जेबकतरे,आक के पत्ते,आग की लकीर (नंदा), कच्ची सड़क,कोई नहीं जनता,उनकी कहानी, यह सच है,तेरहवां सूरज,उनचास दिन, कोरे कागज,न राधा न रूकमणि और एक थी सारा।
(3) कहानियाँ –
अमृताजी उपन्यास के साथ-साथ कहानियाँ भी लिखती रहीं। उनके द्वारा रचित कहानियों में अंतिम पत्र,लाल मिर्च,एक लड़की एक जाम, एक लड़की एक शाप, हीरे की कनी, जंगली बूटी,एक शहर की मौत, गुलियाना का खत,एक सिक्के की कहानी,कच्चे रेशम सी लड़की, मोनालिजा नम्बर दो, मैं सब जानता हूँ, फेरो का भाड़ा इत्यादि विशेष चर्चित हुई। मेरी प्रिय कहानियां,प्रतिनिधि कहानियाँ,कच्चे रेशम सी लड़की इत्यादि नामों से इनके कहानी-संग्रह भी प्रकाशित हुए।
विविध-
अमृताजी ने कविताओं, उपन्यासों और कहानियों के अतिरिक्त निबंध,जीवनी,साक्षात्कार,विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं का संपादन भी किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘नागमणि’ नामक अपनी स्वयं की पत्रिका का प्रकाशन (1966 में आरंभ) किया था।
निबंध-
अमृताजी द्वारा विभिन्न सम-सामयिक मुद्दों पर अनेक विचारोत्तेजक निबंध भी लिखे गये, उनके प्रमुख निबंधों में अतीत की परछाईयां, काला गुलाब जामुन, इक्कीस पत्तियों का गुलाब,औरत एक दृष्टिकोण, सफरनामा,अपने-अपने चार बरस, जंग जारी है, शौक सुराही, कौन-सी जिन्दगी, कौन सा साहित्य, कच्चे अक्षर, एक हाथ मेंहदी एक हाथ छाला,आज के काफिर, कड़ी धूप का सफर, अक्षर बोलते है, देख कबीरा, तीसरी आँख इत्यादि का नाम लिया जाता है।
आत्मकथा –
अमृता जी ने “रसीदी टिकट” और “लाल धागे का रिश्ता’ नाम से अपनी आत्मकथा लिखी। अमृता जी की आत्मकथा “रसीदी टिकट” 1976 में प्रकाशित हुई थी। रसीदी टिकट में अमृता जी ने अपने जीवन की घटनाओं,संघर्षों, वैवाहिक विच्छेद,अपने इश्क और साहित्य एवं साहित्यकारों और राजनीति के बारे में बहुत खुलकर बातें की हैं। रसीदी टिकट भारत की अन्य अनेक भाषाओं में अनूदित हुई और इस प्रकार इसकी चर्चा दूर-दूर तक व्याप्त हो गई। लाल धागे का रिश्ता’ में इन्होंने पराचेतना, आद्य शक्ति, और नफसी – रूहानी चेतना को अपने जीवन की घटनाओं से जोड़ते हुए रूपायित किया है। इनके जीवन के बारे में और अधिक जानने के लिए कृपया नीचे दिये लिंक पर क्लिक करें..
अन्य विविध साहित्यक ग्रंथ-
अमृता जी ने ज्योतिर्विद्या (ज्योतिष विज्ञान),स्वप्न विज्ञान और परा विद्या पर अक्षरों के साए में,कच्चे अक्षर, किरनों की भाषा, अक्षर कुण्डली, अक्षरों की अन्तर्ध्वनि, सातवीं किरण, संत कबीर को लेकर एक मुट्ठी अक्षर और ओशों को लेकर मन मिर्जा तन साहिबां (अन्त:अनुभव ) की रचना की।
अमृता प्रीतम की रचनाएँ उर्दू, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी, कन्नड़, मलयालम, उड़िया, असमी, बांग्ला, सिंधी, रूसी, बल्गारियन, पोलिश, अल्बेनियम, स्पेनिश और फ्रेंच समेत विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं।
इस प्रकार पंजाबी की वह एक ऐसी लेखिका हैं,जिनको सबसे अधिक भाषाओं के पाठक मिले तथा जिन्हें सबसे अधिक पुरस्कार मिले इसलिए वह अपने जीवन काल में ही न केवल इतिहास में स्थापित हुई बल्कि मिथ बनती गई।
इस प्रकार स्पष्ट है कि अपने लेखन क्षेत्र की विविधता,बहुसंख्या और भाषा शैली की नूतनता के लिए वे सदैव साहित्य प्रेमियों के बीच याद की जाती रहेंगी।
© डॉ. संजू सदानीरा
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