‘अकेली’ कहानी का सारांश/मूल संवेदना

” एक स्त्री के अकेलेपन को व्यक्त करने वाली ” अकेली’ एक मार्मिक कहानी है,कैसे?

अथवा, अकेली कहानी के कथ्य को स्पष्ट करें । 

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मन्नू भंडारी आधुनिक काल की प्रमुख रचनाकार हैं। जिन साहित्यकारों ने नयी कहानी को एक आकार दिया,उनमें मन्नू भंडारी का नाम आदर से लिया जाएगा। “अकेली” इनके द्वारा रचित एक लोकप्रिय और स्मरणीय कहानी है। सोमा बुआ इस कहानी की मुख्य पात्र हैं। उनके जवान बेटे की मृत्यु हो गई और इस दुःख से हारकर उनके पति संन्यासी हो जाते हैं। अब वह साल में एक बार एक महीने को छोड़कर बाकी समय हरिद्वार रहते हैं। सोमा बुआ बेटे की मृत्यु के बाद से निस्संतान और पति के होते हुए भी अकेली हैं। कहानी के प्रारंभ में उनके लिए ‘परित्यक्ता’ शब्द आया है। सोमा बुआ अपने अकेलेपन को गाँव के लोगों के यहाँ काम करके काटती हैं। किसी के यहाँ शादी हो,मुण्डन हो अथवा गमी (दु:ख) हो,सोमा बुआ छाती फाड़कर काम करती हैं। यानि कि काम करने में न तो दिन देखती हैं और न रात और न ही अपनी हारी-बीमारी। उनकी इस दिनचर्या में व्यवधान आता है,एक महीने के लिए उनके पति के आने पर। उनके पति का स्वभाव कर्कश दिखाया दिखाया गया है। वह न तो वो ख़ुद उनसे प्यार से बात करते हैं और न ही उनका बाहर जाना पसंद करते हैं।



 कहानी में उनके मृत देवर के रिश्तेदार की बेटी का विवाह उनके गांव में तय होता है। सोमा बुआ येनकेनप्रकारेण पता लगा लेती हैं कि उनको उस विवाह में जाने का न्योता मिल रहा है। अब उनके सामने दो समस्याएँ आती हैं- पहली ये कि शादी में वो खाली हाथ नहीं जाएंगी तो तोहफा क्या दें और दूसरी वो पहनके क्या जाएं? एक ज़माना बीत गया सोमा बुआ को ढंग का कपड़ा पहने। मृत पुत्र की अन्तिम निशानी अंगूठी को बेचकर वह शादी में देने के लिए सौगात तैयार करती हैं। अपने पहनकर जाने के लिए साड़ी को रंगती हैं। कमी नज़र आने पर उसमें कलफ लगाती हैं और अबरक से चमकाती हैं। पुरानी घिसी हुई चूड़ियों को उतारकर नई चूड़ियाँ पहनती हैं। अपने शादी में जाने का इंतज़ाम वो इतने उत्साह से करती हैं कि आपको उनके अन्दर एक ज़िंदादिल बच्चा नज़र आएगा। शादी वाले दिन सुबह नौ बजे ही घर का काम निपटाकर बुआ दरवाजे की तरफ टकटकी लगाकर बुलावे का इंतजार करने लगती हैं। सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम हो जाती है। पाँच बजे का विवाह का मुहूर्त भी बीत जाता है। गली में अँधेरा उतर आता है। राधा ने जब छत पर दीवार से सटी गली की ओर मुंह किए एक छाया मूर्ति सोमा बुआ को देखा और पूछा कि सर्दी में सात बजे वो छत पर क्या कर रही हैं, तो सहसा बुआ को यक़ीन नहीं हुआ कि सात बज गए! उनके अनुसार मुहूर्त पाँच बजे का था और वह अभी अपने घर में ही हैं तो भला सात कैसे बज सकते हैं! यानि एक निर्मम भोलापन यहाँ पर सोमा बुआ में दिखाई देता है। जब राधा पूछती है कि अभी तक खाना नहीं बनाया,तो बुआ उसको अपनी गहरी निराशा से बिल्कुल अनजान रखना चाहती हैं और बड़ी सावधानी से लापरवाह होने का अभिनय करके कहती हैं कि, “खाने का क्या है, अभी बना लूंगी!”



बुआ जिस तरह से शादी में दिए जाने वाली सौगात को अपने एकमात्र संदूक में रखती हैं, शादी में पहनने के लिए तैयार की गई साड़ी को तह करती हैं और अपने हाथों की नई चूड़ियों को उतारती हैं वह बहुत ही हृदय विदारक है। 

अन्तिम पंक्ति जिसमें “बुझे” दिल से चूल्हा जलाने की बात लिखी गई है, वह कहानी के कथ्य को स्पष्ट करता है। दिल कितना भी मुरझाया हो ,स्त्री को रोने की फुसर्त नहीं है। चौका-चूल्हा उसके हर दु:ख पर हावी है। भारतीय समाज में किस प्रकार पति और पुत्र को स्त्री के सुखी होने के लिए अनिवार्य कर दिया गया है,इस कहानी में उसका सजीव चित्रण है गोया, उन दो के बिना औरत के वजूद का कोई मतलब नहीं!

कहानी काल्पनिक हो सकती है,सोमा बुआ नहीं। न जाने कितनी सोमा बुआ हमारे आस अपने अकेलेपन से लड़ रही हैं और दूसरो की खुशी में अपने को खुश रखने का भ्रम पालकर पास जी रही हैं।



-डॉक्टर संजू सदानीरा


विभागाध्यक्ष हिंदी साहित्य


मोहता पीजी कॉलेज


सादुलपुर, चूरू, राजस्थान

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