‘अब उठूंगी राख से’ कहानी की मूल संवेदना

 अब उठूंगी राख से कहानी की मूल संवेदना

“अब उठूंगी राख से ” कहानीकार जया जादवानी की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कहानी है. जया जादवानी आधुनिक कथाकारों में एक जाना पहचाना नाम है. इन्होंने कविता, कहानी और उपन्यास लगभग सभी विधाओं में लिखा है. मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में 1 मई 1959 को इनका जन्म हुआ था.

   कहानी “अब उठूंगी राख से” एक महिला के त्रासद वैवाहिक जीवन और उससे उपजे सवालों पर आधारित है.

कहानी आत्मकथात्मक शैली में रचित है और फ्लैशबैक के साथ वर्तमान में आगे बढते हुए पूरी होती है.

नायिका के पति की लंबे इलाज के दरमियान अस्पताल में मृत्यु के दृश्य से कथारंभ होती है, जहाँ वह अपने पति के कठोर स्वभाव और अपने ऊपर जीवन के प्रतिबंधों को लेकर सोचती है. अस्पताल में परिचितों के आने और उनके सवालों पर कहानी में बिलकुल यथार्थ लगते अनुभव दिखाये गये हैं.मरीज के साथ साथ अटेंडेंट भी जहाँ बौखलाए हुए होते हैं. 

नायिका को शिकायत है कि जो पिता उसे जीवन उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की सलाह देते थे,उन्होंने उसे एक निरूद्देश्य विवाह में झोंक दिया.उसके पति को उसके साथ न लगाव था, न उसकी औपचारिक चिंता ही थी.उस व्यक्ति को कहानी में निहायत ही स्वार्थी और आत्मकेंद्रित दिखाया गया है.एक महत्वाकांक्षी युवती को पूरी तरह गृहस्थी के हवाले कर वह उसे अपनी मनो -शारीरिक ज़रूरतें पूरी करने का साधन मात्र समझता रहा.न उसे कहीं आने-जाने की इज़ाज़त ही थी,न अपने शौक पूरे करने की. यहाँ तक कि उसके दोस्तों के आने पर भी उनसे बात करने वही बैठ जाता था.नायिका एक अदद एकांत के लिए भी तरसती दिखाई गयी है. ऐसे में विवाह के पैंतीस वर्ष,जिसे नायिका “उम्र कैद से कुछ अधिक साल” का नाम देती है,के बाद उसके गुजर जाने पर वह एक ऐसे दोराहे पर अपने को खड़ा पाती है,जहाँ से उसके सामने दो विकल्प खुलते हैं. एक वह,जिस पर भारतीय परिवार अमल करते हैं कि अधेड़ उम्र की विधवा का जीवन समाप्तप्राय है और दूसरा वह कि जिस पर चलकर अपने जीवन की नयी शुरुआत की जाए. 

पति की डेड बॉडी अस्पताल से शव गाड़ी में लेकर वह अपने दो बेटों के साथ घर पहुंचती है. वहाँ पहले से रिश्तेदार आ चुके होते हैं.दो बेटियां भी उनमें हैं. रास्ते से रिश्तेदारों को मृत्यु की सूचना देना,पहुंचने पर सबका गाड़ी के पास लपकते हुए आना,बेटियों का रोकर गले मिलना,शव को नहलाना,अंतिम यात्रा और घर में रुके रिश्तेदारों के लिए शेष व्यवस्था देखना इत्यादि सारा ब्यौरा एक चलचित्र की भांति चलता है और पूरी तरह विश्वसनीयता लिए हुए है. इन सबके साथ नायिका की अन्तर्यात्रा बड़ी बारीकी से दिखाई गयी है,जहाँ वह यह सब अपने ऊपर से गुजार देने और एकांत में पहुंच जाने की चाह रखती है. एकांत पाते ही वह अपनी सारी चीजों को बिखरा कर सवाल करती है कि अब????अब उसके सामने क्या है? एक वैधव्य जीवन या एक नयी यात्रा?पुरानी तो कोई यात्रा क्या रास्ता तक नहीं है उसके पास क्योंकि उसको कभी कहीं ले जाया ही नहीं गया.वह अपने सपनों को किवाड़ के पीछे खड़ा देखती है और दरवाजा भीतर से बंद कर लेती है. कहानी का यह अंश न सिर्फ मार्मिक है, बल्कि प्रेरक भी है, जहाँ वह अपनी अंगुली थाम कर किवाड़ के पीछे चुपचाप खडे़ अपने सपनों के साथ सफर पर निकलना चाहती है.अपनी उम्र गंवा कर,”दूसरों की कमाई पर ऐश करना चाहने के लिए हर मूर्ख औरत को विवाह कर लेना चाहिए” जैसा सोचकर वह एक नये विमर्श की नींव रखती है. 

कहानी पितृसत्तात्मक समाज की तस्वीर खींचने के साथ उसके परिणाम भी दिखाती है. शीर्षक को आशा और निर्णायक द्वंद्वहीनता के रूप में देखा जा सकता है. कहानी अपना असर छोड़ने में अत्यंत प्रभावी है.

डॉ. संजू सदानीरा

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