आदिकाल की प्रमुख विशेषताएं अथवा प्रवृत्तियां : Adikal ki pramukh visheshtayen/ pravrittiyan

  आदिकाल की प्रमुख विशेषताएं अथवा प्रवृत्तियां

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार विक्रम संवत 1050 (993 ई) से आदिकाल का प्रारंभ माना जाता है। इस युग में एक तरफ तो जैन काव्य और रासो काव्य जैसी विपरीत काव्य धाराएं प्रवाहमान थीं, दूसरी तरफ अस्थिरता के बावजूद काव्य रचना में आदिकाल नाम के विपरीत एक प्रौढ़ता दिखाई दे रही थी। सर्वप्रथम इस युग की विशेषताओं पर बात करते हैं। 

 आदिकाल के साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियां निम्नलिखित हैं..

1. विभिन्न काव्य रूपों का सृजन-

आदिकालीन साहित्य के नाम पर हम सिर्फ कुछ सीमित प्रवृत्तियों का उल्लेख नहीं कर सकते क्योंकि एक ही काल खंड के भीतर जैन साहित्य,रासो साहित्य,नाथ साहित्य और सिद्ध साहित्य जैसी अलग-अलग काव्य धाराएं धड़ल्ले से न सिर्फ प्रचलित थी, वरन् साहित्य की अजश्र धारा में अनेकानेक प्रकार से योगदान भी कर रही थीं।पुष्यवंत,धनपाल,चंदबरदाई, शालिभद्र सूरि,नरपति नाल्ह जैसे प्रतिभाशाली कवि जैन काव्य,वीर काव्य एवं प्रेम काव्य भी लिखकर साहित्य की श्रीवृद्धि कर रहे थे तो नाथ और सिद्ध साहित्य के उपासक विपरीत उपासना विधियों का सृजन- लेखन कर रहे थे।

2. संदिग्ध ऐतिहासिकता-

आदिकाल के काव्य,विशेषकर रासो काव्य की ऐतिहासिकता पूरी तरह संदिग्ध है।कवियों ने उन राजाओं के बीच भी युद्ध दिखा दिए हैं,जो अलग-अलग समय में पैदा हुए यानी जिनका होना एक साथ संभव नहीं था। इसी तरह राजाओं-राजकुमारों का विवाह उन राजाओं की बेटियों से भी दिखाया गया है, जो इतिहास वर्णन के अनुसार 100-200 साल आगे-पीछे पैदा हुए। अतः इस काल की ऐतिहासिक दृष्टि से विश्वसनीयता संदिग्ध है।

3. युद्धों का सजीव चित्रण-

इस युग के कवियों ने युद्ध वर्णन में अत्यंत सजीवता का परिचय दिया है। इसका मुख्य कारण यह है कि अधिकांश कवि किसी न किसी राजा के सभासद या दरबारी कवि थे। आम दिनों में ये कवि अपने आश्रयदाता शासक की प्रशंसा में काव्य रचना करते थे और राज्याश्रय के कारण शस्त्र विद्या में निपुण भी होते थे। युद्ध का अवसर आने पर ये कई बार घोड़े पर बैठकर तलवार पकड़ कर शत्रु सेना का सामना भी करते थे। स्वयं युद्ध करने एवं अपनी आंखों से सामने युद्ध होता देखने के कारण उनके काव्य में युद्धों से संबंधित चित्रण में एक अनूठी जीवंतता दिखाई देती है।

4. शूरवीरों का महिमा मंडन-

आदिकाल के काव्य में युद्धवीरों एवं शूरवीरों की अत्यंत प्रशंसा की गई है। युद्ध में पीठ दिखाकर भाग जाने वाले लोगों की इन कवियों ने अपने काव्य में निंदा भी की है

उदाहरण: बारह बरस ले कुकुर जिए 

                तेरह ले जिए सियार । 

                बरस अठारह क्षत्री जिए

                बाकी जीवन को धिक्कार।। 

5. संकुचित राष्ट्रीयता-

आदिकाल में एक वृहद् राष्ट्र अथवा अखंड भारत की सोच राजाओं में नहीं थी।अपनी-अपनी रियासत को वे अपना राष्ट्र मानते थे और उन्हीं को बचाने एवं दूसरे की रियासत को हड़पने के लिए युद्ध में तत्पर रहते थे। इस प्रकार उनमें राष्ट्रीयता की भावना अत्यंत संकुचित थी।

6. वीर एवं शृंगार रसों की प्रधानता-

आदिकालीन वीर काव्य में एक तरफ तो युद्धों का जीवन्त चित्रण किया जाता था, वहीं दूसरी तरफ नायिका जो कि राजकुमारी या अद्वितीय सौंदर्य की स्वामिनी के रूप में दिखाई जाती थी,का नख-शिख वर्णन करते थे। इस प्रकार से इस काव्य में वीर रस एवं शृंगार रस का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है।

7. राज प्रशस्ति की प्रधानता-

आदिकाल के रासो काव्यों के अधिकांश कवियों ने अपने आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा अतिशयोक्तिपूर्ण शैली में की है। अपने राजाओं को देवताओं के समकक्ष अथवा उनसे भी श्रेष्ठ मानते हुए उनकी युद्धवीरता एवं दानवीरता का बखान किया है।

8. जनता की उपेक्षा-

आदिकालीन काव्य में जनता की उपेक्षा पूरी तरह से की गई थी। तत्कालीन सामाजिक,आर्थिक एवं धार्मिक परिस्थितियों के मध्य प्रजा या जनता का जो हाल था,कवियों ने इसका ज़रा भी खयाल अपने काव्य में नहीं रखा।

9. प्रकृति का आलंबनगत चित्रण-

ऐसा नहीं है कि आदिकालीन काव्य में प्रकृति का उद्दीपनगत चित्रण नहीं हुआ,लेकिन प्रकृति का आलंबनगत चित्रण इस युग की उल्लेखनीय बात है। हम उल्लेख कर चुके हैं कि जो कवि दरबार में बैठकर काव्य-सृजन करते थे,वही कवि युद्ध की स्थिति में शस्त्र कौशल भी दिखाते थे। युद्ध भूमि में जाने के लिए उन्हें पहाड़ों,मैदानों और नदियों को पार करना पड़ता था। रास्ते में पड़ने वाली इन सारी प्राकृतिक स्थितियां को भी वे बड़े ग़ौर से देखते थे, इसलिए युद्ध से निश्चिंत होने के बाद की गई अपनी काव्य रचनाओं में वे प्रकृति का चित्रण किसी नायिका की तरह अर्थात आलंबनगत रूप में करते थे।

10. छंदों का कुशल प्रयोग-

आदिकाल के कवि नौसिखिए नहीं थे जैसा कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हमें आगाह भी किया था। इन कवियों ने अपने काव्य में छंदों का अद्भुत प्रयोग किया है। यूं तो दोहा और छप्पय उनके मनपसंद छंद थे,लेकिन इन्होंने त्रोटक,तोमर, दूहा और ढाल इत्यादि छंदों का भी बहुत सुंदर प्रयोग अपने काव्य में किया था।

11. रासो काव्यों की परंपरा-

यूं तो आदिकाल में कई प्रकार की काव्य धाराएं देखी गई, लेकिन उनमें से रासो काव्य परंपरा को बहुत अधिक प्रसिद्ध एवं मान-सम्मान मिला। राजा-महाराजा के युद्ध एवं विवाहों के अतिरंजनापूर्ण चित्रण का उस समय माहौल भी था और कवियों को अवकाश भी था।


12. डिंगल और पिंगल शैलियों का प्रयोग-

आदिकाल काव्य में मुख्यतः डिंगल एवं पिंगल दो शैलियां का प्रयोग हुआ। डिंगल का प्रयोग जहां वीर रसात्मक काव्य में हुआ वही प्रेम काव्य में पिंगल शैली प्रधान रही। 

13. अलंकारों का चमत्कारिक प्रयोग-

आदिकाल के काव्य में सभी प्रकार के अलंकारों का प्रयोग देखने में आता है, लेकिन इस काल के कवियों ने शब्दालंकारों का प्रयोग अधिक किया।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि आदिकाल हिंदी साहित्य के इतिहास का प्रथम परंतु पूर्ण विकसित, सौष्ठवयुक्त एवं पारंपरिक युग है, जिसने बाद के भक्ति साहित्य एवं रीतिकाल को एक नई दिशा दी। डिंगल पिंगल शैली से रचित इस काव्य के साहित्य के साथ जैन साहित्य,नाथ साहित्य एवं सिद्ध साहित्य संयुक्त हैं और जिनका वीर रस एवं शृंगार रस का चित्रण आगामी साहित्य लेखन में अत्यंत योगदान रहा।


© डॉ. संजू सदानीरा 

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