” एक तोले अफ़ीम की कीमत” एकांकी की मूल संवेदना

 ” एक तोले अफ़ीम की कीमत” एकांकी की मूल

संवेदना पर प्रकाश डालें।

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https://youtu.be/mhQ0cY6y9Ls

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रामकुमार वर्मा द्वारा रचित “एक तोले अफ़ीम की कीमत” एकांकी में भारतीय मध्यवर्गीय परिवारों की रुग्ण (बीमार) परिपाटियों,दहेज की कुप्रथा,बेमेल विवाह,पीढ़ीगत अन्तराल ( जनरेशन गैप)और युवाओं मे निराशा के फलस्वरूप आत्महत्या को मुख्य विषय बनाया गया। एकांकी की मुख्य बातों को निम्न बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-


1- दहेज की कुप्रथा – इस एकांकी का प्रारंभ और समापन दहेज रूपी सामाजिक बुराइयों के साथ ही होता है।


2- बीमार सामाजिक परम्पराएँ- भारतीय परिवारों में विवाह एक सामाजिक उत्सव होने के बावजूद विवाह के बाद पति-पत्नी पूरी तरह अनजान लोगों के समान जीवन बिता देते हैं।एक ही घर में रह कर भी अकसर उनमें न तो बातचीत होती है, और न ही आपस में दोस्ती बन पाती हैं।वो बस परिवार के ढांचे में ढल कर रह जाते हैं।


3- पीढ़ीगत अन्तराल-  माता-पिता बच्चों की विचारधारा और इच्छाओं से पूरी तरह अनजान उन पर अपनी इच्छाएँ थोपते हैं तो दूसरी तरफ बच्चे अपने अभिभावकों की इच्छाओं से इत्तेफाक़ नहीं रखते हैं। ऐसे में नयी और पुरानी दोनों पीढ़ियों के बीच एक दूरी आ जाती है,जिसको भरना मुश्किल हो जाता है।इस एकांकी मे भी लाला सीताराम और मुरारीमोहन के बीच ये दूरी देखी जा सकती है।


 4- युवाओं मे बढ़ती निराशा की प्रवृत्ति- पीढ़ीगत अन्तराल के बाद और व्यक्तिगत इच्छाएँ पूरी न होने से युवा निराश हो जाते हैं। संघर्ष करने के बजाय वो हार मान लेते हैं,ऐसा इस एकांकी मे भी दिखाया गया है।


5- आत्महत्या की प्रवृत्ति- अपनी इच्छा पूरी न होती देख इंसान अपना जीवन समाप्त करने की बात सोच लेता है।एकांकी में नायक और नायिका (मुरारीमोहन और विश्व मोहनी) भी अपने जीवन संघर्षों से हारकर आत्महत्या की और अग्रसर होते दिखते हैं।


6- समस्याओं का समाधान सम्भव है- एकांकी पढ़कर विश्वास हो जाता है कि जीवन एक पहेली की तरह अथवा शतरंज की बाजी की तरह है,जिसमें कब पहेली का हल मिल जाये या शतरंज की बाज़ी पलट जाये,कुछ कहा नहीं जा सकता। 

न मुरारीमोहन को आत्महत्या करनी पड़ती है और न ही विश्व मोहनी को और एक सुखद मोड़ पर दोनो एक दूसरे को मित्रवत मिल जाते हैं। एकांकी का अंत कामदी है।


 निष्कर्ष:-इस प्रकार, निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि इस एकांकी में हास्य व्यंग्य के साथ जीवन के गंभीर मसलों को उठाया गया है और एक आशा के साथ में एकांकी में सुखद अन्त होता है।


-डॉक्टर संजू सदानीरा

विभागाध्यक्ष हिंदी साहित्य

मोहता पीजी कॉलेज

सादुलपुर, चूरू, राजस्थान

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