कामायनी : श्रद्धा सर्ग विशेष

 कामायनी : श्रद्धा सर्ग विशेष

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1.कामायनी किस विधा की रचना है ?

*महाकाव्य


2.कामायनी किस युग में रचित महाकाव्य है?

*छायावादी युग में


3.कामायनी महाकाव्य के रचनाकार कौन है?

* कामायनी के महाकाव्यकार छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद है । 


4.कामायनी” शीर्षक किसके नाम पर रखा गया ?

*श्रद्धा के नाम पर


5.कामायनी के प्रमुख पात्रों के नाम व प्रतीक स्पष्ट करें। *कामायनी में श्रद्धा,मनु व इड़ा मुख्य पात्र हैं, जो क्रमश: हृदय. मन व बुद्धि का प्रतीक हैं।

6.कामायनी के मुख्य बिन्दुओं पर प्रकाश डालें।

उत्तर–“कामायनी” छायावाद के सुप्रसिद्ध कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य है। यह एक नायिका प्रधान काव्य है, जिसकी नायिका श्रद्धा है। कामगोत्रजा होने के कारण श्रद्धा का नाम कामायनी रखा गया और उसी के नाम पर महाकाव्य का नाम है। कामायनी में कुल 15 सर्ग है। ‘चिंता’ प्रथम सर्ग व ‘आनंद’ अंतिम सर्ग है। कामायनी अपनी दार्शनिक स्थापनाओं के कारण अत्यंत चर्चित हुआ। कामायनी में प्रत्यभिज्ञा या शैव दर्शन को महत्व देते हुए धर्म, नैतिकता सामंजस्य व करुणा आदि मूल्यों पर विचार व्यक्त किए गए है।

7.जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘ ‘कामायनी’ महाकाव्य के ‘श्रद्धा’ सर्ग की विशेषताएँ बताइए ।


*प्रसाद हिन्दी साहित्य के सर्वाधिक प्रतिभाशाली एवं लोकप्रिय कवियों में गिने जाते हैं। कामायनी उनके द्वारा रचित अत्यंत लोकप्रिय महाकाव्य है। इस महाकाव्य में कुल 15 सर्ग हैं। जिनमें ‘श्रद्धा’ सर्ग अलग स्थान रखता है। 

इस सर्ग में प्रलय की विभीषिका देखकर उपजे दुःख से क्लान्त और असहाय मनु के साथ-साथ श्रद्धा द्वारा निराश मनु के मन में आशा का संचार किये जाने के उल्लेखनीय प्रयास को दिखाया गया है।

 लेखक ने ‘कामायनी’ में मनु को एक साधारण मनुष्य, जो विपरीत परिस्थितियों से विचलित हो जाता है, के रूप में दिखाया है। इससे विपरीत उन्होंने श्रद्धा को कठिन परिस्थितियों में भी साहस, संयम तथा स्नेहयुक्त दिखाया है।

मनु प्रलय के उपरान्त निराश एवं क्लान्त,माथे पर हाथ रखे बैठे हैं। वह पूर्णतः आशारहित है। उन्हें अपना जीवन दुर्भाग्यपूर्ण लगता है। वह किसी भी नवीन सृजन के बारे में सोचने हेतु स्वयं को असमर्थ पातें हैं। ऐसे में कामगोत्रजा कामायनी (श्रद्धा) गन्धर्व देश से भ्रमण करते हुए मनु के निकट आती है।मनु की निराशा देखकर रुककर उनसे संवाद करती है। वह विभिन्न उदाहरणों से मनु के मन की निराशा को समाप्त कर उनके मन में आशा का संचार करना चाहती है। इस सर्ग में कवि ने श्रद्धा के नैसर्गिक सौंदर्य का भी मनोहारी चित्रण किया है। कवि, जो स्वयं पुरुष है,मनु के मन की दुर्बलता का चित्रण मनोवैज्ञानिक रूप से करने के साथ श्रद्धा के रूप में स्त्री के उदार मन और विवेकयुक्त चरित्र का सुन्दर चित्रण करने में सफल हुए हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण श्रद्धा सर्ग एक तरफ तो प्रथम ‘चिंता’ सर्ग के अवशेष दिखाता है,मनु पर प्रलय की छाया को मनोवैज्ञानिक रूप में दर्शाता है, तो दूसरी ओर श्रद्धा के प्रेरणास्पद व्यक्तित्व के द्वारा यह स्थापित करने का सकारात्मक प्रयास करता है कि दुःखों से उबरने के लिए मित्रों का होना कितना आवश्यक है।

इस सर्ग से यह भी समझ आता है कि प्रकृति नित नवीन है। पुरातनता को वह अपने में समाहित कर सतत् नवीन सृजन करती है। निराशा जीवन का एक अंग है, न कि सम्पूर्ण जीवन ।कामायनी महाकाव्य आधुनिक काल का अत्यंत महत्वपूर्ण महाकाव्य है और श्रद्धा सर्ग उसका महत्वपूर्ण सर्ग है।


© डॉक्टर संजू सदानीरा

विभागाध्यक्ष हिंदी साहित्य

मोहता पीजी कॉलेज

सादुलपुर, चूरू, राजस्थान

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