ग़लत होता पंचतंत्र” कहानी की मूल संवेदना

 “ग़लत होता पंचतंत्र” कहानी की मूल संवेदना पर प्रकाश डालें ?

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 ” ग़लत होता पंचतंत्र” हिन्दी की आधुनिक कथाकार राज़ी सेठ द्वारा रचित एक मर्मस्पर्शी कहानी है। तत्सम, दूसरे कथाकार एवं निष्कवच इनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। इनकी कहानियों में मानव मन की अन्तर्दशा का मनोवैज्ञानिक एवं मर्मस्पर्शी चित्रण मिलता है। 


” गलत होता पंचतंत्र” रिश्तों की गहरी परतों को पैनी नज़रों से देखने वाली कहानी है।एक संघर्षमयी स्त्री(कह सकते हैं कि संघर्ष जिसे थमा दिए गये),जिसका अपने व्यक्तिगत जीवन को सँवारने का सपना है और इसके लिए वह दिन-रात अपने आप से जूझती रहती है,का अन्तर्द्वन्द्व बहुत ही मार्मिकता के साथ इस कहानी के माध्यम से रेखांकित किया गया है।


 समाज की व्यवस्था और पुरुष होने के जन्मजात फ़ायदे इस कहानी में अच्छी तरह अंकित किए गए हैं। माँ होना अपने आप को और अपने सपनों को भूलना है,समाज की इस सच्चाई को इस कहानी में बखूबी दिखाया गया है। कहानी आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई है।लेखिका ने एक युवा माँ और उसके छोटे बच्चे के ज़रिए व्यक्तिगत सपनों और मां के दायित्वों के बीच पिसते जीवन पर बात करके अपनी संवेदनशील दृष्टि का परिचय दिया है। एक छोटा बच्चा,जिसकी दुनिया सिर्फ़ अपनी माँ के आँचल तक सीमित है। जो अपनी छोटी-छोटी जिज्ञासा तक के लिए अपनी मां पर निर्भर है,वह माँ से ध्यान और समय न पाकर धीरे-धीरे पूरी तरह आत्मनिर्भर किशोर में बदल जाता है।उधर युवती खाना बनाने, बर्तन धोने और घर की व्यवस्था संभालने के साथ साथ अपने लेखन को भी ज़ारी रखने की ज़िद ठाने हुए है।इस कहानी का सबसे दु:खद पहलू यह कि न तो वह अपना लिखना-पढ़ना ही ज़ारी रख पाती है और न ही अपने बच्चे के साथ साझा पल ही जी पाती है।एक लड़की के सपनों का पितृसत्ता के द्वारा हरण कर लिया जाना इस कहानी की त्रासदी है। दूसरी त्रासदी इस कहानी की है कि अन्त मे कथा नायिका के पास एक गहरा अपराध बोध बचता है।


 निष्कर्ष रूप में  कह सकते हैं, कि इस कहानी के माध्यम से एक माँ के जीवन की अनगिनत और अनकही कठिनाइयों का चित्रण किया गया है। एक युवती जिसका बच्चा उसकी चाह नहीं है,”विवाह की व्यवस्था ” के तहत उसे थोप दिया गया है, उससे उसे सहज ममता उमड़ आई है लेकिन वह माँ और आत्मनिर्भर महिला दोनों को साधना चाहती है.वह युवती,जो लिखने-पढ़ने से जुड़ी रहना चाहती है, वह अन्त में न अपने सपने पूरे कर पाती है और न अपने बच्चे को उसके हिस्से का प्यार दे पाती है।

 समाज का महत्त्वाकांक्षी और प्रतिभाशाली युवतियों के सपनों के लिए कोई योगदान न होना एक बेहद अफ़सोसजनक बात है। इसका दुष्परिणाम सिर्फ उस युवती को ही नहीं झेलना पड़ता,बल्कि उसकी उस हार की निराशा से उत्पन्न क्षोभ को उससे जुड़े हर व्यक्ति को झेलना पड़ता है। कहानी अंत में कुछ सवाल छोड़ जाती है,जिनका सामना करने से जाने  कब तक सब बचते रहेंगे!!!

-डॉक्टर संजू सदानीरा

विभागाध्यक्ष हिंदी साहित्य

मोहता पीजी कॉलेज

सादुलपुर, चूरू, राजस्थान

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