जनसंख्या वृद्धि : लाभांश या समस्या

 आज का युग विज्ञान और तकनीक का युग है। निरन्तर नवीन शोधों एवं अविष्कारों ने मानव प्रजाति के जीवन में क्रांति ला दी है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं स्वास्थ्य क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव दृष्टिगत हो रहे हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति की जीवन- प्रत्याशा एवं जन्मदर में वृद्धि के साथ ही मृत्युदर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की जा रही है। इसके कुछ नकारात्मक परिणाम भी आए हैं जिनमें से एक है-जनसंख्या विस्फोट ।


जनसंख्या वृद्धि का तात्पर्य ऐसी स्थिति से है, जिसमें लोगों की संख्या में इतनी बढ़ोत्तरी हो जाये कि जीवनयापन के स्रोत कम पड़ जायें। आज विश्व की कुल आबादी 8 अरब के आंकड़े को पार कर चुकी है। इसमें भी भारत जो कि चीन के बाद दूसरा बड़ा देश है, इसकी आबादी 140 करोड़ से ऊपर जा चुकी है। यूनाइटेड नेशन का अनुमान था कि 2027 तक भारत जनसंख्या के मामले में चीन को पीछे छोड़ देगा जबकि वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू (WPR) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2023 में भारत की आबादी 1.423 बिलियन हो चुकी है जो कि चीन की कुल आबादी 1.412 बिलियन के आंकड़े को पार कर चुकी है।


 किसी देश की जनसंख्या जितनी अधिक होगी संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता उतनी ही कम होगी । इस स्थिति में देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बिगड़ जायेगी। क्योंकि संसाधनों के लिये प्रतिस्पर्धा आपेक्षिक वंचन को जन्म देती | वंचन से असंतोष और आख़िरकार वर्ग- संघर्ष तक की आशंका निर्मूल नहीं है, जो कि देश की प्रगति में अन्ततोगत्वा व्यवधान ही उत्पन करेगा। क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया का 7वाँ बड़ा देश भारत विश्व के कुल क्षेत्रफल का 2.4% रखता है जबकि जनसंख्या विश्व का लगभग 18% है| कुछ जलवायवीय कारण जनसंख्या वितरण को प्रभावित करते हैं। प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता, राजनैतिक माहौल, आर्थिक स्थिति आदि कारक भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। भारत में बढ़ती जनसंख्या के कारणों पर ग़ौर किया जाय तो विभिन्न आयाम सामने आते हैं। मृत्युदर की तुलना में जन्मदर मे वृद्धि एक प्रमुख कारण है।परिवार नियोजन का अभाव, जिसके मूल में जानकारी का अभाव भी शामिल है। धार्मिक रूढ़िवादिता के कारण बच्चे भगवान / अल्लाह / प्रभु की देन माने जाते हैं। कम उम्र में विवाह से प्रजनन काल बढ़ जाता है। गरीबी के कारण भी लोग बच्चों को संसाधन मानकर चलते हैं। इन सब कारणों के मूल में अशिक्षा और जन-जागरूकता का अभाव निश्चित तौर पर सम्मिलित है।


जनसंख्या वृद्धि के परिणामों का विश्लेषण करें तो दुष्परिणाम ज्यादा सामने आते हैं। सबसे पहले तो प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। इससे अनियंत्रित दोहन विनाशकारी परिणाम की भूमिका तैयार करता है। गरीबी, लिंगभेद, अशिक्षा, पलायन, संघर्ष, नक्सलवाद, अतिवाद, क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकता, बेरोजगारी, मानसिक बनाव ये सब बढ़ती जनसंख्या के पार्श्व- प्रभाव के रूप में देखे जाते हैं। जनसँख्या वृद्धि के दुष्परिणामों ने उसके प्रति सरकार का ध्यान आकर्षित किया। जिसके फलस्वरूप तमाम नीतियां बनीं। विवाह की न्यूनतम उम्र महिला पुरुष दोनों के लिए 21 वर्ष निर्धारित करना एक सराहनीय कदम है। मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा भी एक कारगर तरीका है, जो दीर्घकाल में अपना प्रभाव छोड़ेगी। दत्तक ग्रहण के प्रति लचीला कानून बनाना भी इसका एक उपाय है। परिवार नियोजन के साधनों आदि का प्रचार प्रसार तथा जागरूकता अभियान टीवी, रेडियो, इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से चलाना आज सरकार के महत्त्वाकांक्षी कार्यों में से हैं।


उपर्युक्त प्रयासों के सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं। विश्व बैंक के अनुसार भारत में प्रति महिला प्रजनन दर 2.1 रह गई है। कोविड महामारी के चलते 10 वर्षों में होने वाली जनगणना जो 2021 में होनी थी, वह स्थगित कर दी गई है। जनसंख्या वृद्धि दर, 2011 के जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 17.64 है जोकि 2001 के 21.54 से काफी कम है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कोई विशेष कमी दर्ज नहीं हो सकी है। सरकार को अपने प्रयासों में तेजी लाने चाहिए। इसके साथ ही नागरिक होने की जिम्मेदारी अगर हम अपने स्तर पर निभाएंगे, व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों स्तरों पर प्रयास किए जाएंगे, तभी जनसंख्या वृद्धि दर में कमी होगी और भारत के महाशक्ति बनने का रास्ता और भी आसान हो जाएगा। साथ ही यह अपने समस्त नागरिकों को गरिमा पूर्ण जीवन का अधिकार भी मुहैया करा पाने में सक्षम होगा।


© प्रीति खरवार

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