नग्नता और नास्तिकता

नग्नता और नास्तिकता

नग्नता और नास्तिकता दुनिया की सबसे प्राकृतिक चीजें हैं वर्ना जो प्रकृति (आपके शब्दों में ईश्वर) इंसान के शरीर की इतनी सूक्ष्म रचना करती है,एक-एक रोएं का निर्माण करती है,वो  जन्म के पहले तन पर एक झबला भी डाल ही सकती थी !!!

 सबसे बड़ी विडंबना कि जो समाज लड़कियों को कपड़े पहनाने पर आमादा है,उसी को उनके कपड़े नोचने के लिए बेकरार  भी पाती हूं।

स्विमिंग कॉस्ट्यूम में लड़कियों के जिस्म पर कम से कम दो जगह कपड़े जरूर होते हैं और आश्चर्य की बात है कि उन ढंकी हुई जगहों को बावजूद कपड़ों के लोग देख लेना चाहते हैं।मतलब नंगा शरीर नहीं,सोच होती है।

“सलीके” के कपड़ों के बावजूद जहां औरतों को हिजाब, घूंघट और दुपट्टा अलग से कैरी करना सिखाया जाता है वहीं मर्द तमाम कपड़े पहन कर सार्वजनिक स्थानों पर मूत्र विसर्जन के लिए अपना प्राइवेट पार्ट दिखाने में शर्म नहीं करते।

पास से गुजरती “सही कपड़ों” के बावजूद लड़कियों को घूरने वाले मर्दों को खुलेआम कम कपड़ों में देख कर मुंह घुमा कर जाते देखती हूं लड़कियों को।

उनका सार्वजनिक शौचालय से निकलते वक्त की मुद्रा से ही वितृष्णा हो जाए,जिस तरह से निकलते हैं।मतलब शरीर ही तो है लेकिन नजरिया देखिए!

मैं नग्नता और नास्तिकता को सपोर्ट नहीं करती (ये सबकी अपनी व्यक्तिगत चॉइस है) लेकिन स्त्री और पुरुष के बीच के इस भेदभावपूर्ण कंडिशंड व्यवहार का विरोध करती हूं।

© डॉ. संजू सदानीरा

 

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