फांसी (मणि मधुकर) कहानी की मूल संवेदना/ सारांश

 फांसी कहानी की मूल संवेदना/सारांश

मणि मधुकर राजस्थान में जन्मे और देश के प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं इन्होंने कई चर्चित उपन्यास कहानी एवं नाटक लिखे। हवा में, अकेले, एकवचन-बहुवचन, रस गंधर्व, सफेद मेमने, सरकंडे की सारंगी, दुलारीबाई, खेला पोलमपुर, इकतारे की आंख, इलायची बेगम, इत्यादि पर इन्हें देश विदेश में पहचान मिली। रस गंधर्व नाटक पर ‘कालिदास पुरस्कार’ मिला। 1975 में ‘साहित्य अकादमी’ का सर्वोच्च पुरस्कार भी प्राप्त किया।


‘फांसी’ मणि मधुकर द्वारा रचित एक अत्यंत मार्मिक कहानी है। यह कहानी भारतीय पारिवारिक व्यवस्था, कृषक जीवन और ससुराल में लड़कियों की दशा इत्यादि पर एक साथ प्रकाश डालती है। इसका मुख्य विषय है- दांपत्य संबंधों में शक़ और उसके परिणाम स्वरूप अपराध। पति अपनी पत्नी पर शक़ करता है कि वह उसके छोटे भाई यानी अपने देवर के साथ अवैध संबंधों में है। इस निराधार शक़ के कारण न सिर्फ़ वह अपने छोटे भाई की हत्या कर देता है, बल्कि अपनी पत्नी के पैर भी काट देता है। वहीं पत्नी अपनी इस स्थिति के बावजूद पुलिस के सामने देवर की हत्या का ग़ुनाह कबूल करती है। लेकिन सारे सबूत उसके विपरीत होने से पुलिस उसके पति को ले जाती है। उस पर गुनाह साबित होता है, उसे फांसी की सज़ा मिलती है।


कहानी नाटकीयता के साथ प्लेटफ़ॉर्म के दृश्य से शुरू होती है। हड़मान कुली के रूप में एक अत्यंत मनोवैज्ञानिक चरित्र के रूप में चित्रित किया गया है। लड़की का एक छोटा सा बच्चा है उसका बूढ़ा बाप अपने दोहिते और बेटी के साथ जेल में बंद जमाई से मिलने जा रहा है। रेलवे स्टेशन पर  बूढ़े और हड़मान की बातचीत किसी भी संवेदनशील इंसान को विचलित कर सकती है। रेलवे डिपार्टमेंट के स्थानीय भ्रष्टाचार का भी इसमें खुलासा किया गया है। जिसमें हर ग्राहक के ऊपर एक चवन्नी की रिश्वत देनी पड़ती है। हड़मान का एकाकीपन उसके प्रति मन में एक गहरी संवेदना जगाता है।


लड़की की सास का लड़की को अपने बेटों के लिए अपराधी मानना ‘एक को खा गई, एक को जेल हो गई’ पितृसत्तात्मक समाज के में औरतों के प्रति नज़रिए को दर्शाता है। कहानी पढ़कर महसूस होता है कि बेशक़ रिश्तो में ग़ैर जानकारी के धोखा चलता रहे, परिवार नहीं बिखरेगा। लेकिन बिना किसी धोखे के भी निराधार शक़ होने के कारण परिवार बिखर सकता है, अपराध कर सकता है।


स्पर्श एक चिकित्सा ही नहीं सुकून और वरदान है, इसका एहसास बच्चे को गोद में लिए हड़मान के माध्यम से होता है। हार चुका, टूटा, ईमानदार इंसान भी सेल्फ हार्म पहुंचा सकता है, यह भी कहानी दर्शाती है। कुल मिलाकर ‘फांसी’ कहानी एक मनोवैज्ञानिक स्पर्श सहित मानव मनों की घुटन, बेबसी और वेदना का जीवंत चित्रण करती है।

© डॉ. संजू सदानीरा 

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