बाल यौन शोषण:कारण, परिणाम और निदान

 रोज-रोज हम अखबारों में, टीवी पर और सोशल साइट्स पर महिला -उत्पीड़न और बाल यौन शोषण की खबरें पढ़ते हैं। कभी किसी नेता,कभी किसी तथाकथित धर्म गुरू तो कभी किसी रिश्तेदार को दोषी पाते और बनाते हैं। दोषी इन समेत हम सब हैं ,सारी व्यवस्था है। भीतर कहीं हम सब जानते हैं कि ये सब पता नहीं कब से चल रहा है, लेकिन कोई मामला तूल पकड़ता है तो सब उस पर बोलने और आक्रोश व्यक्त करने लगते हैं, वे भी, जो खुद इन जैसी गलीज़ हरकतें कर चुके लेकिन कभी पकड़े नहीं गये। 

     कौन हैं ये बलात्कारी, कहाँ से आते हैं? कहीं और से नहीं आते ये, हमारे बीच ही रहते हैं, बल्कि हमारे साथ ही  रहते हैं। ये तो शेल्टर होम हैं, पहले एक का पता लगा, फिर दूसरे का, आप सब बालिका “सुधार” गृह और किशोर “कल्याण” बोर्ड के आवासीय परिसर देख लीजिए, सब जगह यही दरिंदगी पसरी पड़ी है। दरअसल बलात्कार और यौन शोषण हमारे यहाँ  बहुत नयी और अजीब चीज है ही नहीं। हमारी मानसिकता में रची बसी बीमारी है ये। पौराणिक कथाओं से लेकर फिल्मों तक या तो शरीर को शुचिता  से जोड़ा गया है या उत्तेजना से। शुचिता की भावना बलात्कार के बाद लड़की से आत्महत्या तक करवा लेती है, वहीं दूसरी तरफ पौरूष का महिमामंडन होता रहा है, जिससे अपनी शारीरिक उपस्थिति दर्ज करवाना चाहे बलात्कार के ही रूप में ही, असली मर्द होने जैसा बताया जाता रहा है। औरत की अस्मिता उसके शरीर में समेट देने का नतीजा ये निकला कि वो घर में सिमटती चली गई, जबकि दूसरी तरफ पुरुष का अहं  फैलता चला गया। किसी से बदला लेना, मजाक बनाना, नीचा दिखाना और बलात्कार कर देना एक ही बात या इन बातों का जरिया बन गया। घर में बात बेबात लड़कियों को महज लड़की होने के कारण कहीं जाने से रोकना और लड़कों  के ऐसे काम तय मानना दोनों में क्रमशः भय और  दंभ के भाव का अनजाने में ही सृजन करता है। रही बात शेल्टर होम्स की, तो हमारे घर भी अभी पकड़ में आये शेल्टर होम से कम नहीं है। हमारे ही घरों में, हमारी ही नाक के नीचे हमारी ही मासूम बच्चियों के साथ ये सब होता रहता है और हमें खबर ही नहीं होती, कभी खबर हो भी जाती है तो आगे के लिए उन्हें पाबंद करके छोड़ दिया जाता है, कारण, इस मानसिक, शारीरिक हमले या हादसे को हमने बच्ची की इज्ज़त पर हमला समझा। जब तब ये शरीर को इज्ज़त समझने की जाहिल सोच रहेगी, तब तक ये सब चलता रहेगा। बंद कीजिये ये सिलसिला अब। अपराध है ऐसी सोच। इसी सोच के कारण लाखों अपराधी अपराध करके भी बचे रहते हैं कि मामला किसी भी हाल में पुलिस तक नहीं जाएगा। अपने बच्चों पर भरोसा करना सीखना होगा और हर आदमी पर नजर रखनी होगी,जहाँ सबसे ज्यादा इत्मीनान है, वहाँ भी आँख-कान खुले रखने होंगे। दुख के साथ कह रही हूँ कि तमाम एहतियात के बाद भी ये हादसे कम ही होंगे, बंद नहीं हो सकते। पता नहीं, इस सृष्टि की हवा में ही ऐसा कुछ घुला हुआ है कि बच्चों, बच्चियों, बालिकाओं, महिलाओं -किसी के भी प्रति किसी की भी नियत उस स्तर तक बिगड़ सकती हैं कि वह अपनी गरिमा, उम्र और रिश्ता-सब भूल जाये। 

  अपने आसपास माहौल बनाएँँ कि बच्चों की आपसी साझेदारी बढ़े,लड़के-लड़की स्त्री -पुरुष के बजाय मनुष्य के रूप में विकसित हों। हमारा अपना बेटा खुद को बेटा होने के कारण विशेष और बेटी खुद को सिर्फ बेटी होने के कारण कमतर न समझे। गलत करने वाले को हिरासत और सज़ा का डर हो।सब कुछ खुद हमें ही शुरू करना है, और अभी से ही। 

  Dr. Sanju Sadaneera

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