भुवनेश्वर का एकांकी- लेखन में योगदान बताएँ।

 


एकांकीकार भुवनेश्वर की एकांकी कला विशेषताएँ बताइए।

जयशंकर प्रसाद निश्चित रूप से हिन्दी एकांकी विधा के वास्तविक जनक माने जाते हैं,परन्तु कला के उत्तरोत्तर उन्नयन की दृष्टि से भुवनेश्वर प्रसाद को यदि ‘नये एकांकी का जनक’ कहा जाए तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।भुवनेश्वर पाश्चात्य एकांकियों की शैली का हिन्दी में पूर्ण विकास करने की दृष्टि से बहुत विख्यात है। उनका प्रथम एकांकी ‘एक वैवाहिक विडम्बना’ सन् 1939 में प्रकाशित हुआ, जिस पर जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के “फ्रेंडिक” का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। 

आपने सामाजिक रूढ़ियों, मानव मन की विभिन्न जटिलताओं और मानसिक प्रवृत्तियों को अपनी कला का लक्ष्य बनाया। हिन्दू समाज के कठोर नियंत्रण ,रूढ़ियों एवं पाखंड में आधुनिक शिक्षा प्राप्त युवक युवतियों की वासना एवं सभ्यता अनियंत्रित होकर भड़क कर विकृत हो चुकी है। जैसे-जैसे सभ्यता बढ़ रही है, वैसे वैसे शिक्षित एवं आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न मध्यवर्ग की सेक्स ग्रन्थियाँ जटिल होती जा रही हैं। मध्यवर्ग की इन कुंठाओं और बेसिरपैर की उड़ानों का निर्ममतापूर्वक चित्रण आपने किया है। यहाँ दिखावे और छद्म नैतिकता की विनाशकारी प्रवृतियों पर भुवनेश्वर पैनी नज़र डालने में सफल रहे हैं.

उन्मुक्त प्रेम एवं वैवाहिक वैषम्य बाहर से सुसंस्कृत किन्तु अन्दर से अनेक जटिलताओं से युक्त इनके पात्र प्रारंभिक एकांकियों को कृत्रिम और अस्वाभाविक बनाते हैं फिर भी इसमें संदेह नहीं है कि ये एकांकी भारत के लिए आज अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुके हैं।पश्चिमी देशो के विकसित समाज को भारत से संदर्भित कर भुवनेश्वर ने बदलते हिन्दी एकांकी लेखन को युग बोध और समकालीनता का स्वर दिया, उसे जीवन के सामाजिक यथार्थ से जोड़ा। उनके एकांकी लेखन पर जॉर्ज बर्नार्ड शॉ तथा फ्रॉयड के मनोविश्लेषणवाद का अत्यधिक प्रभाव है।

इनके प्रमुख एकांकी समूह हैं- ताँबे के कीड़े, कारवां, स्ट्राइक, आजादी की नींव, सिकन्दर इत्यादि। उनके विषय में डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त ने लिखा है- ” आपने सामाजिक रूढ़ियों, ,विवाह वैषम्य,विभिन्न मनोवृतियों एवं मानसिक प्रवृत्तियों के चित्रण को अपनी कला का लक्ष्य बनाया है।” उनके एकांकियों का भाषा की दृष्टि से भी बहुत महत्व है।एकांकी के विभिन्न तत्वो का विकास,शिल्प विधि के प्रयोग एवं शैली की दृष्टि से उनके एकांकियो का  अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण है।

अतः कहा जा सकता है, की भुवनेश्वर के एकांकी और नाटकों में जीवन-यापन,हताशा तथा निराशा और उदासी के चिह्न मिलते हैं। जीवन के यथार्थ धरातल से एकांकियों की कथावस्तु का चयन किए जाने तथा बुनियादी ढंग से उनका विश्लेषण किए जाने के कारण भुवनेश्वर जी के एकांकियो में मार्मिकता एवं व्यंग्यात्मकता दोनों एक साथ आ गई हैं ।व्यंग्य और विडम्बना के आकस्मिक विस्फोट के कारण उनके एकांकी का शिल्प वस्तुतः आजकल के बुद्धिजीवियों के जीवन की प्रतिकृति हो गई है।

भुवनेश्वर की मृत्यु को लेकर आज भी साहित्यकारों में गहरे असमंजस की स्थिति है। एक महान प्रतिभाशाली साहित्यकार का अंत दुखद परिस्थितियों में होना भी अंततः एक और विडम्बना ही मानी जानी चाहिए।

-डॉक्टर संजू सदानीरा

विभागाध्यक्ष हिंदी साहित्य

मोहता पीजी कॉलेज

सादुलपुर, चूरू, राजस्थान

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