मंहगाई और मिलावट का गठजोड़

 

 मंहगाई और मिलावट का गठजोड़

आज हमारी बड़ी इच्छा हो रही है, यह कहने की कि हम आज़ाद देश के ग़ुलाम नागरिक हैं। हमें शाम होते ही घर लौट आने की हड़बड़ाहट होती है। दोपहर में ठगे जाने का डर होता है। बिजली का बिल हमें डराता है, क्योंकि वह इतना भारी होता है कि सांस फूल जाती है। पानी का बिल जाड़े में गर्मी सा पसीना ला देता है।

हमारा कसूर यह है, कि हम बिजली के मीटर में तार फंसा कर बिजली चोरी नहीं करते और बड़े परिवार के बावजूद गड्ढा खोदकर एक और पाइप डालकर पानी का अवैध कनेक्शन नहीं लगाते। हमें तो अब सोना चांदी नहीं, चीनी सपने में दिखने लगी है। सोचती हूं, डायबिटीज होती तो यही सोचकर संतोष कर लेती कि चीनी खाना मौत को बुलाना है। नमक से कड़वी लगती है आजकल चीनी हमें।

मंहगाई और मिलावट का गठजोड़ सदियों पुराना है। हिंदी के पुराने मुहावरे भी बेचारे दम तोड़ रहे हैं, ‘दाल रोटी खा कर गुजारा करना’, ‘दाल रोटी का जुगाड़ हो जाना’, ‘रोटी पर प्याज धर कर पेट भरना’ जैसे मुहावरे तो अब अपने अर्थ से भटक गए हैं। दाल,चीनी,प्याज जैसी रोज़मर्रा की चीजों का मूल्य उतना ही बढ़ता जा रहा है,जितना कि भ्रष्टाचार।

कल को बच्चे बेचारे इन चीजों से जुड़े मुहावरों का तात्पर्य पूछते भटकेंगे। एक और मुहावरा हुआ करता है, ‘मुफ़लिसी में आटा गीला’।अब वह मुफ़लिस ही क्या,आटा गूंथते वक़्त जिसके आटे में पानी ज्यादा न हो! फिल्मों में भी तो ऐसे ही दिखाते हैं,जैसे ही हीरो बेचारा गरीब होता है तो हीरोइन का बाप भी भाव खाने लगता है । तो भाई लोगों अब ऐसे कहना बंद कर दो कि “आजकल मंहगाई का ज़माना है।” बल्कि इस वाक्य में अब तनिक संशोधन की आवश्यकता है,”आजकल मंहगाई और मिलावट का ज़माना है।”

पैसे लेकर घूमने से भी तो एक तो दूध- घी मिल नहीं रहा। मिले तो क्या गारंटी की सिंथेटिक न हो। हल्दी, धनिया, मिर्च में बचपन से मिलावट की बातें सुन-सुन कर बड़े हुए थे। अख़बारों में बहुत से लेख भी पढ़े कि अमुक वस्तु में मिलावट अमुक विधि से जांच लें (हालांकि एक बार भी जांच कर नहीं पाए)। पर अब तो सही में घोर कलयुग ही कहना पड़ेगा, कि राम-कृष्ण के देश में दूध भी सिंथेटिक मिलता है। हम तो यही समझते थे कि सिर्फ़ कपड़ा ही सिंथेटिक होता है।

बहुत बार मिलावट करने वाले पकड़े गए, कारखाने सीज़ हुए। फिर बाद में शायद कार्रवाई में क्या ‘मिलावट’ हुई, कुछ पता नहीं चला।अब तो मिलावट का खेल महंगाई के साथ गठबंधन करके जनता से सीधे-सीधे कह रहा है- “ले जाएंगे,ले जाएंगे,हम पॉकेट से मनी सब ले जाएंगे”।

हालांकि दावे सरकार मंहगाई से निपटने के कर रही है। पर क्या करें यह सरकार के दावे हैं जो उसके वादों की तरह अधूरे रह जाते हैं पर हमें तो इतना पता है कि यह जो पब्लिक है यह सब जानती है यह जो पब्लिक है…।

 

© डॉ. संजू सदानीरा

 

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Priti Kharwar

प्रीति खरवार एक Freelance Writer हैं, जो शोध-आधारित हिंदी-लेखन में विशेषज्ञता रखती हैं। Banaras Hindu University से Psychology में Masters प्रीति को हिन्दी भाषा में लेखन के लिए भाषा सारथी सम्मान और United Nations Population Fund की तरफ से Laadli Media Fellowship भी मिल चुका है। प्रीति का लक्ष्य हिंदी भाषी पाठकों को Mental health और सामाजिक मुद्दों पर आसान और बोलचाल की भाषा में कंटेंट उपलब्ध कराना है, जिससे लोग अपने जीवन में positive change ला सकें।

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