मकड़ी का जाला एकांकी की मूल संंवेदना

 मकड़ी का जाला एकांकी की मूल संवेदना

 जगदीशचन्द्र माथुर हिन्दी एकांकी के क्षेत्र में एक अत्यंत प्रतिष्ठित नाम है। आईसीएस अधिकारी होते हुए भी जीवन से जुड़े प्रसंगों पर सारगर्भित नाटक एवं एकांकियों की रचना करना उनका साहित्य के लिए प्रेम और सूक्ष्म दृष्टि को दर्शाता है।

“रीढ़ की हड्‌डी” इनका प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक एकांकी है। समीक्ष्य एकांकी” मकड़ी का जाला “माथुर जी का एक प्रासंगिक और सार्थक एकांकी है।

आज जीवन जटिल हो गया है। सपने बड़े गए है और स्वयं जीवन उन सपनों को पूरा करने के लिए छोटा प्रतीत होने लगा।

 फ्लैट्स वाली शहरी ज़िन्दगी में जीवन की भव्यता सिमट गई है, जहाँ खेत की गीली मिट्टी,पेड़ों के झुरमुट और हवाओं के झोंके बिना मोल के समझे जाते हैं। जीवन की रंगीनियाँ अब पेड़-पौधों, भँवरों,तितलियों, गीत-संगीत,कविता और प्रणय (प्रेम) में नहीं, वरन मदिरा-पान, आलीशान होटलों मे खान-पान और शेयर मार्केट की हलचलों में समझी जाती है।


एकांकी का मुख्य पात्र भोलानाथ अपने लिए ऐसा जीवन चुनता है जो प्रेम,संगीत और प्रकृति से अछूता है। बस पैसा कमाना प्रसिद्ध व्यक्ति के तौर पर जाना जाना और व्यस्त दिनचर्या अब उसकी पहचान है । कभी वह भावुक युवा था और उसे गीत-संगीत से लगाव था और उसकी एक प्रेयसी थी। समय के बहाव में अपनी योग्यताओं से वह उपर्युक मानसिक आस्वाद्य वस्तुओं को छोड़कर शहरी भागम-भाग भरी ज़िन्दगी को चुनता है, जिसका उसको  कोई  पछतावा नहीं है। अपने बनाए मकड़ी के जाले (आधुनिक भावहीन जीवन शैली) में न सिर्फ़ वह स्वयं उलझा है बल्कि नये आये युवक चन्द्रभान को भी उसी में जकड़ना चाहता है। इसलिए उसके सामने काम की ऐसी शर्तें रखता है, जिसमें वह सिर्फ़ और सिर्फ़ काम करे, न कविता लिखे(जैसा कि चंद्रभान को पसंद है), न ही प्रकृति के सुंदर रूपों का रसपान करे। चंद्रभान ये सब सुनते ही घबरा कर भाग जाता है।

 चंद्रभान के  चले जाने के बाद उनींदी अवस्था में  भोलानाथ की  अन्तरात्मा उसे झकझोरती है। वह उसे उसके पुराने जीवन की याद दिलाती है। अब चन्द्रभान की उन्मुक्त जीवन शैली को  बचाने का ख़याल भी उसे आता है। 

परन्तु एकांकी का सबसे मार्मिक हिस्सा वह है,जहाँ अगले दिन स्वयं चन्द्रभान अपनी सारी भावुकता भुला कर, उसे नष्ट करने की शर्त पर भी नौकरी के लिए हाजिर होता है।

 पल-भर में ही भोलानाथ का वापस उसी कठोर मुद्रा में हाजिर हो जाना उसके क्षणिक भावुकतापूर्ण व्यक्तित्व और स्थायी रूप से व्यवहार कुशल होने का परिचायक है।



कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जगदीश चन्द्र माथुर द्वारा रचित “मकड़ी का जाला” एकांकी आज के भौतिकवादी जीवन की तस्वीर पेश करता है। आज मनुष्य के मन का सुकून प्रकृति की गोद, रिश्तों की ऊष्मा और साहित्यिक अभिरुचियों में न होकर ऐशोआराम में हो गयी है,(जिनको ये सब किसी कीमत पर हासिल नहीं,उनकी बात नहीं हो रही) फिर चाहे कीमत उसे जीवन के सच्चे सौन्दर्य और स्वभाविकता को मिटाकर चुकानी पड़े! 

डॉ. संजू सदानीरा


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