रश्मिरथी काव्य का मूलभाव/ मूल संवेदना

 रश्मिरथी काव्य का मूलभाव/ मूल संवेदना 

‘रश्मिरथी’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित एक अत्यंत लोकप्रिय खण्डकाव्य है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को साहित्य में राष्ट्रकवि की उपाधि से सम्मानित किया जाता है। उनकी परशुराम की प्रतीक्षा, कुरुक्षेत्र, रसवंती, उर्वशी और रश्मिरथी आदि महत्वपूर्ण काव्य कृतियाँ हैं। ‘उर्वशी’ चम्पू’ काव्य पर रहें साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार ज्ञानपीठ प्रदान किया गया।


रश्मिरथी, जैसा कि पूर्वलिखित है एक खण्डकाव्य है इसका कथानक पौराणिक है। ‘रश्मिरथी’ का अर्थ है वह व्यक्ति जिसका रथ रश्मिरथी अर्थात् पुण्य का हो। इस ग्रंथ में रश्मिरथी नाम कर्ण का है क्योंकि उसका चरित्र पुण्यमय एवं उज्ज्वल है। कर्ण इस खण्ड काव्य का नायक है। सम्पूर्ण खण्डकाव्य कर्ण के जीवन से जुड़ी घटनाओं पर आधारित है। सम्पूर्ण कथानक को सात सर्गों के माध्यम से रचा गया है।


खण्डकाव्य का प्रारंभ हस्तिनापुर की रंगशाला में पाण्डव व कौरव राजकुमारों के शस्त्र कौशल के प्रदर्शन, जो उन्होंने गुरु द्रोणाचार्य के सान्निध्य में सीखा है, से होता है। यहीं पर कर्ण अचानक दर्शकों की भीड़ में उपस्थित होता है और अर्जुन को अपने साथ अस्त्र-शस्त्र संचालन की प्रतियोगिता हेतु ललकारता है। यहाँ रचनाकार ने अपनी लेखनी के माध्यम से बताने की चेष्टा की है कि प्रतिभा का निवास सिर्फ धनाढ्य लोगों में नहीं होता बल्कि निर्धन के घर भी प्रखर प्रतिभा पनप सकती है। इसके साथ ही दिनकर जी ने ज्ञानीजन की यह पहचान बताई है कि वह ऊँच -नीच का भेदभाव नहीं रखते। उनके हिसाब से जिसमें दया – धर्म हो वही प्राणी पूज्य है। कवि ने दिखाया है कि अर्जुन को ललकारने पर अर्जुन से पहले गुरु द्रोणाचार्य क्रोधित हो उठे। उन्होंने व कृपाचार्य का यह कहकर अपमान किया कि राजपुत्र से लड़ने के लिए राजपुत्र या राज्याधिकारी होना आवश्यक है। अपमान की इस अग्नि पर दुर्योधन ने मित्रता का मक्खन लगाते हुए उसे अंगदेश का राजा घोषित करते हुए ताज सर पर रख दिया। इधर द्रोणाचार्य की अनुभवी आँखों ने कर्ण के पौरुष को परख लिया। वे नहीं चाहते थे कि कर्ण व अर्जुन का सामना हो। लेकिन जैसे ही कर्ण के अंगराज बनते ही पुन: इन दोनों के आमने-सामने होने की संभावना देखकर इस बार कृपाचार्य ने कर्ण की जाति और वंश पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया।

 

यहीं से खण्डकाव्यकार ने कर्ण के जन्म, संघर्ष, वीरता एवं पराक्रम और इसके साथ ही उसकी नियति की कथा कहनी शुरू की। इन सब के साथ कर्ण के स्वभाव के दिव्य गुणों का भी अत्यंत रोचक व मानवीय शैली में कवि ने चित्रण किया है। इस काव्य में बताया गया है कि मातृ – पितृ स्नेह विहीन कर्ण के जीवन के दुःख कभी समाप्त नहीं होते। एक के बाद एक विपत्तियाँ उसके जीवन का दुर्भाग्य बनकर प्रकट होती रहीं और अंततः उसकी मृत्यु का कारण बनीं। द्रोणाचार्य से निराश होकर कर्ण परशुराम के पास गए और कीट दंश की घटना के बाद गुरु का कोपभाजन बन और समय पर समस्त शस्त्र विद्या विस्मृत होने का शाप पाकर वेदना पायी । इन्द्र को कवच-कुण्डल देकर दान देने की अपनी प्रतिज्ञा का नकारात्मक प्रतिफल पाया। अंततः निहत्थे, महाभारत के भीषण संग्राम में रथ का पहिया निकालते हुए अर्जुन के हाथों वीरगति को प्राप्त हुए।


 खण्डकाव्य में वीर, सत्यवादी, पुण्यशाली, कोमल हृदय तथापि हतभाग्य कर्ण के जीवन को मार्मिकता के साथ प्रस्तुत करने के साथ कवि ने दुर्योधन एवं कर्ण के माध्यम से मित्रता का महत्त्व भी प्रतिपादित किया है।


खण्डकाव्य में आए सभी पौराणिक चरित्रों यथा- द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कुंती, दुर्योधन, भीष्म इत्यादि का मानवीय धरातल पर चित्रण किया गया है। इन सब चरित्रों की दुर्बलताओं एवं विशेषताओं पर दिनकर ने मनोवैज्ञानिक स्पर्श सहित काम किया है।

इस प्रकार  कहा जा सकता है कि रश्मिरथी एक

सफल खण्डकाव्य है। खण्डकाव्य के सभी तत्त्वों की कसौटी पर यह खण्डकाव्य खरा उतरता है।


© डॉ. संजू सदानीरा 


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