रेत की कोख में कहानी की मूल संवेदना

 

रेत की कोख में कहानी की मूल संवेदना 

 

सत्यनारायण द्वारा लिखित रेत की कोख में कहानी जननी और जन्मभूमि के प्रति पूर्ण समर्पण व प्रेमपूर्ण संवेदना से युक्त है। यह कहानी हृदय को द्रवित करने वाला दर्द, चुप्पी, विरह, वेदना और शहर में मजदूरी कर रहे मजदूर की कष्ट भरी जिंदगी से परिचित करवाती है।

भीषण अकाल से ग्रस्त होने के बाद भी अपनी जन्मभूमि के प्रति अपार प्रेम को अभिव्यक्त करती यह कहानी अभाव के दुख और लगाव की भाषा को अत्यंत गहराई से दर्शाती है। भयावह रेत के धोरों का सन्नाटा, जो अकाल से उपजा है, जिसने व्यक्तियों, जीव-जंतुओं और पेड़ पौधों को भख (खा) लिया है ,इस पर यह अब तक की सबसे सशक्त और विश्वसनीय कहानी है। 

रेत की कोख में कहानी का प्रारंभ एक वयोवृद्ध महिला जो नायक की मां है और अपने बड़े बेटे के साथ रहती है के जिक्र से होता है। नायक ( छोटा बेटा) बड़े भाई और माँ की चिट्ठियों का जवाब भी नहीं दे पाता और हर बार अगले मनी ऑर्डर के साथ लिखने के लिए टाल देता है। बड़े भाई की इस चिट्ठी के साथ घर पहुंचता है कि माँ उसे आखिरी बार देखना चाहती है। 

जब वह अपनी जन्मभूमि में एक लंबे अरसे बाद जाता है तो वहां की धूल वहां की हवा में पुरानी खुशियों की गंध पाकर अपनापे से भर जाता है। बचपन की यादों में नायक का मन अपार दर्द से भर जाता है। अभाव और सूनापन उसे लीलने को आतुर है परन्तु वह अपनी सारी पिछली यादों को शिष्टता और हिम्मत के साथ एक जगह इकट्ठा करता है क्योंकि अभी उसे माँ और बड़े भाई के सम्मुख भी जाना है।

वह गांव की मिट्टी, वह हवा और वह यादों की पिटारी- जैसे ही नायक मग्न होता है तो उसे किसी के दर्द से रोने की आवाज सुनाई देती है और देखता है कि जिस काल में उसने अपनी आंखें खोली थी आज वही काल पेड़-पौधों,जीव-जंतु, पक्षियों और मनुष्यों को भी अपना ग्रास बन चुका है। (लेखक का जन्म जब हुआ था,उस समय भी भीषण अकाल पड़ा था,ऐसा उसने अपनी माँ से सुना था)।

बाड़े में भेड़ प्यास से तड़प कर मर गयी, बड़े भाई भेड़ के सर को बार-बार अपने हाथों में थामे उन्हें सहला के फूट-फूट कर रो रहे हैं। तभी एक उड़ती कमेटी टप से उसके अपने पांव के पास आ गिरती है और फिर वह चौंक पर वेदना से भर जाता है। वह अपनी बिखरी हिम्मत सहेजता है और मां ने आखिरी बार उससे मिलने की इच्छा प्रकट की है और भाई की उन आंखों में सागर सी सुनामी दिखाई दी और वह घर की ओर चला ।

गांव में भूतनी का- सा सन्नाटा छाया था। (कहानी की यह भाषा असहज करती है।) भूख और प्यास से मां मरणासन्न थीं। रेगिस्तान की कठिन ज़िन्दगी और रेत के गुबार के बीच घिसटती जिंदगी को लेखक के परिवार के माध्यम से बड़ी गहराई से दिखाया गया है। 

बेटे को अंतिम बार देख कर माँ का गुज़रना, दोनों भाइयों में देर तक चुप्पी बनी रहना, आपस में नजरों का मिलना और झुकना कहानी को दृश्य की तरह से सामने रख देता है । बड़े भाई का छोटे भाई के साथ शहर जाने की इच्छा जाहिर करना और छोटे की विवशता दिखा कर श्रमिकों के जीवन के अभाव को पूरी मार्मिकता के साथ दिखाया गया है।

लेखक ( छोटे भाई) का अकेले शहर लौटना उसकी नियति है तो माँ की अस्थियों को नदी में न विसर्जित कर गाँव की मिट्टी में बीज की तरह बोना दिखा कर माँ और मातृभूमि के प्रति अनोखा लगाव भी दिखाया गया है तो दूसरी तरफ यह जीवन पर आस्था की प्रतीकात्मकता का भी सृजन है। 

इस प्रकार एक गहरे दुःख लेकिन आशा के साथ रेत की कोख में कहानी समाप्त होती है। इस कहानी में लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि गाँव की जन्मभूमि वर्षों बाद आए अपने शिशु को पहचान कर न सिर्फ उसे गले लगाती है,बल्कि आगंतुक को अपने दायित्व का भी बोध कराती है।यहां प्रकृति के प्रति समर्पण भी दर्शाया गया है और जीवन की अभावग्रस्त कटु परिस्थितियों पर भी विचार किया गया है। 

 

© डॉ. संजू सदानीरा

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Priti Kharwar

प्रीति खरवार एक Freelance Writer हैं, जो शोध-आधारित हिंदी-लेखन में विशेषज्ञता रखती हैं। Banaras Hindu University से Psychology में Masters प्रीति को हिन्दी भाषा में लेखन के लिए भाषा सारथी सम्मान और United Nations Population Fund की तरफ से Laadli Media Fellowship भी मिल चुका है। प्रीति का लक्ष्य हिंदी भाषी पाठकों को Mental health और सामाजिक मुद्दों पर आसान और बोलचाल की भाषा में कंटेंट उपलब्ध कराना है, जिससे लोग अपने जीवन में positive change ला सकें।

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