22 अप्रैल पृथ्वी दिवस : थीम, इतिहास और महत्त्व ; Earth day in Hindi

22 अप्रैल पृथ्वी दिवस : थीम, इतिहास और महत्त्व ; Earth day in Hindi

Earth day


 हमारे सौरमंडल में वैसे तो 8 ग्रह हैं, लेकिन अब तक ज्ञात ग्रहों में से पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन है। पृथ्वी न सिर्फ़ मनुष्यों बल्कि यहां मौजूद सभी जीवों के अस्तित्व के लिए आवश्यक संसाधन प्रदान करती है। पृथ्वी पर उपस्थित वायुमंडल, स्थलमंडल एवं जलमंडल हमारे रूप लिए समान रूप से उपयोगी हैं। इसके महत्त्व को रेखांकित करने के लिए प्रत्येक वर्ष 22 अप्रैल को दुनिया भर में पृथ्वी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन हम न केवल पृथ्वी के महत्त्व पर प्रकाश डालते हैं, बल्कि इसको संरक्षित और संवर्धित करने हेतु उपक्रम भी करते हैं। इसके साथ ही पूर्व में किए गए प्रयासों की समीक्षा और आवश्यकतानुसार उसमें संशोधन भी करते हैं।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 

सबसे पहले 1969 में सैन फ्रांसिस्को में हुए एक सम्मेलन में पृथ्वी दिवस की आधारशिला रखी गई। उस समय कैलिफोर्निया में तेल रिसाव की वजह से डॉल्फिन समेत अनेक समुद्री जीवों का जीवन संकट में आ गया था, जिसके बाद पर्यावरण संरक्षण हेतु यह सम्मेलन आयोजित किया गया था। पृथ्वी दिवस के प्रतिपादक अमेरिकन सीनेटर जेराल्ड नेल्सन थे, जिन्हें पृथ्वी दिवस का पिता भी कहा जाता है। पहली बार व्यवस्थित रूप से पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल 1970 को मनाया गया। इसमें 20 मिलियन से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था। इसके बाद 2016 का पृथ्वी दिवस एक ऐतिहासिक दिन था, जब पेरिस समझौता किया गया। इसमें 175 देशों ने हस्ताक्षर किया था। पेरिस समझौता जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने और वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री तक सीमित रखना के लिए किया गया समझौता था।


पृथ्वी दिवस की थीम 

हर बार जब पृथ्वी दिवस मनाया जाता है तो इसका कोई मुख्य विषय रखा जाता है जिसे हम इस दिवस की थीम कहते हैं। 2024 में पृथ्वी दिवस का थीम है- ‘प्लेनेट वर्सेस प्लास्टिक (Planet versus plastic)’ जबकि पिछले वर्ष इसकी थीम थी ‘इन्वेस्ट इन आर फ्यूचर’ (Invest in our future)। इस बार की थीम प्लास्टिक से होने वाले नुकसान पर फ़ोकस करती है। ग़ौरतलब है कि प्लास्टिक एक ऐसा प्रदूषक है जो सालोंसाल नष्ट नहीं होता, जिसकी वज़ह से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है।


महत्त्व 

दुनिया में विशेष कर एशियाई देशों में जनसंख्या वृद्धि अपने चरम पर है। आज विश्व की जनसंख्या 8 अरब के आंकड़े को पार कर गई है। पृथ्वी पर मौजूद मानव के साथ ही अन्य सभी जीवों के अस्तित्व के लिए पृथ्वी का सुरक्षित रहना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन भौतिकता की अंधी दौड़ ने उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा दिया है। ऐसे में पृथ्वी पर उपस्थित प्राकृतिक संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता दिनों दिन कम हो रही है, जबकि आवश्यकता निरन्तर बढ़ रही है। उद्योग लगाने के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई हो या फिर विभिन्न स्रोतों से होने वाला प्रदूषण यह सभी धरती की सेहत के लिए बहुत हानिकारक हैं। इन सब की वज़ह से वैश्विक तापमान में निरन्तर वृद्धि हो रही है। ऐसे में पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन अनिवार्य बनता जा रहा है। इसलिए पृथ्वी दिवस एक ऐसा अवसर है जब सारा विश्व एक साथ आकर संतुलित और हरित विकास हेतु नीतियां और उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित करें। क्योंकि यह प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है तो यह एक ऐसा अवसर भी साबित होता है जब पिछले साल किए गए वायदों और नीतियों की समीक्षा की जाए और आवश्यकतानुसार संशोधन किये जाएं।


चुनौतियां 

पृथ्वी दिवस को सफल बनाने की राह में बहुत सारी समस्याएं हैं, बढ़ती आबादी इसमें सबसे प्रमुख है। इसके अलावा बाज़ारवाद, भौतिकवाद, अति औद्योगीकरण पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। भ्रष्टाचार की वजह से नीतियों का समुचित क्रियान्वयन नहीं हो पाता। जन-जागरुकता का अभाव व्यक्तिगत स्तर पर होने वाले प्रयासों में बाधा उत्पन्न करता है। इसके साथ ही भारत जैसे विकासशील देशों में शिक्षा की कमी तथा पर्यावरण अनुकूल संसाधनों की बढ़ती लागत आम जनता के लिए मुश्किलें उत्पन्न कर रहे हैं। इसके अलावा विकसित देश एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने में ज़्यादा व्यस्त हैं और पर्यावरण पर समुचित ध्यान नहीं दे रहे। इसी तरह विकासशील देशों के सामने भी विकसित देशों का उदाहरण न होना प्रेरणा की राह में बाधा बनता है। पश्चिम के अंधानुकरण की प्रवृत्ति पूरब के देशों को भी पिछलग्गू बना रही है जो कि पर्यावरण की दृष्टि से नुकसानदेह साबित हो रहा है।


संभावनाएं 

दुनियाभर के पर्यावरणविद पृथ्वी के गिरते पर्यावरण को लेकर चिंतित हैं और समय-समय पर इसके लिए विभिन्न समझौते और सम्मेलन आयोजित किए जाते रहे हैं। 1972 में पृथ्वी के पर्यावरण पर केंद्रित स्टॉकहोम सम्मेलन, 1997 में ग्रीन हाउस गैसों की उत्सर्जन रोकने हेतु क्योटो प्रोटोकॉल, जलवायु परिवर्तन पर बना अंतरसरकारी पैनल (आईपीसीसी) और जलवायु परिवर्तन पर प्रत्येक वर्ष होने वाला कोप सम्मेलन पृथ्वी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीरता को प्रदर्शित करता है। समय-समय पर पर्यावरण अनुकूल नीतियां पर्यावरण में अनुकूल बदलाव लाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। इसके अलावा शिक्षा और जागरुकता की वज़ह से धीरे-धीरे लोग पर्यावरण संवर्धन और संरक्षण के प्रति गंभीर दिख रहे हैं।


पृथ्वी दिवस दुनिया भर के पर्यावरण प्रेमियों को एक साझा मंच प्रदान करता है जहां वे मिलकर पृथ्वी और इसके पर्यावरण को मानवनिर्मित गतिविधियों से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए नीतियां तय कर सकें। इसके साथ ही पूर्व में तय की गई नीतियों के क्रियान्वयन का विश्लेषण कर आगे की कार्यवाही सुनिश्चित करें। हमारी धरती हमारा भविष्य है इसलिए इसे सुरक्षित और संरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी हम सबकी है। हालांकि सरकार पर पर्यावरण अनुकूल नीतियां बनाने और समावेशी विकास सुनिश्चित करने के जवाबदेही है, लेकिन इसके साथ एक नागरिक होने के नाते हम सबका यह कर्तव्य है कि व्यक्तिगत स्तर पर हम अपना योगदान भी सुनिश्चित करें। सिंगल यूज़ प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट पर लगाम लगाना, अनवीकरणीय ऊर्जा का सीमित प्रयोग और अपने आसपास के पर्यावरण को स्वच्छ रखना हमारे मूल कर्तव्यों में से हैं। यदि हम सभी मिलकर अपनी ज़िम्मेदारी समझें तो निश्चित तौर पर समावेशी और संतुलित विकास की ओर मार्ग प्रशस्त कर सकेंगे, जिससे आने वाली पीढ़ी को साफ-सुथरा और स्वच्छ पर्यावरण दे सकें। इस विषय पर महात्मा गांधी एक सटीक और प्रासंगिक कथन है,

“पृथ्वी के पास सभी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं लेकिन एक व्यक्ति के लालच को पूरा करने के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं”।


© प्रीति खरवार 

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