ओवरथिंकिंग (Overthinking) क्या है? आसान भाषा में समझें

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ओवरथिंकिंग (Overthinking) क्या है? आसान भाषा में समझें इसके लक्षण, कारण, नुकसान और इसे कंट्रोल करने के असरदार तरीके

 

क्या आप भी छोटी-छोटी बातों पर घंटों लगातार सोचते रहते हैं? क्या ज़्यादा सोचने की वजह से आपको रात को नींद आने में कठिनाई होती है, जिस वजह से अगले दिन का पूरा रूटीन डिस्टर्ब हो जाता है? अगर हां तो आप ओवरथिंकिंग के शिकार हो सकते हैं। यह अपने आप में कोई बीमारी नहीं है लेकिन बहुत सारी बीमारियों की वजह बन सकती है।

आज के तेज रफ़्तार वाले डिजिटल युग में ओवरथिंकिंग (Overthinking) एक आम समस्या बन गई है। इसमें आप कभी पास्ट में हुई घटनाओं को याद करते रहते हैं तो कभी भविष्य में होने वाली चीजों को लेकर डर और आशंका से घिरे रहते हैं। यह सिर्फ़ ‘ज़्यादा सोचना’ नहीं है बल्कि इसके पीछे गहरी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया काम कर रही होती है।

ओवरथिंकिंग (Overthinking) क्या है?

किसी भी विषय पर बिना किसी सकारात्मक नतीजे के ज़रूरत से ज़्यादा बार-बार और लगातार सोचते रहना ओवरथिंकिंग है। यानी कि बिना किसी ऐक्शन या समाधान के किसी विषय पर लगातार सोचते रहना ओवरथिंकिंग है। इसमें व्यक्ति नेगेटिव इमोशंस और फीलिंग्स की वजह और उसके नतीजों के बारे में लगातार सोच सोच के परेशान हो जाता है। ओवरथिंकिंग का मतलब है किसी भी बात या घटना के बारे में ज़रूरत से ज्यादा सोचना, इतना कि वह आपके काम या फ़ैसले में मदद करने के बजाय आपको उलझा दे।

ओवरथिंकिंग व्यक्ति को पूरी तरह से थका देती है इसमें व्यक्ति की फ़ैसले लेने की क्षमता पर भी असर पड़ता है। ओवरथिंकिंग वैसे तो दिन के किसी भी समय हो सकती है लेकिन सबसे ज़्यादा यह रात के समय होती है जब हम सोने के लिए बिस्तर पर जाते हैं। उस समय पूरे दिन की घटनाएं दिमाग में लगातार घूमती रहती हैं। इसके अलावा अगले दिन होने वाले बातों को लेकर मन में तमाम तरह के डर और आशंकाएं पैदा होती हैं।

ओवरथिंकिंग के प्रकार

ओवरथिंकिंग दो तरीके की होती है। एक तो वह जो पास्ट में हो चुकी बातों और घटनाओं के बारे में होती है। दूसरी भविष्य को लेकर जो चिंता और आशंका होती है । इस तरीके से देखा जाए तो ओवरथिंकिंग दो प्रकार की होती है।

1.रूमिनेशन (Rumination)

अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन (APA) के अनुसार रूमिनेशन एक रिपिटेटिव नेगेटिव थिंकिंग है जिसमें पास्ट पर फोकस किया जाता है। इसमें आप पुरानी ग़लतियों, असफलताओं, अपमान और गिल्ट को बार-बार याद करते हैं। यह समस्या को हल करने की कोशिश लगती है। लेकिन दरअसल यह आपको उलझा कर रखती है, जो लंबे समय में एंज़ायटी, स्ट्रेस और डिप्रेशन को बढ़ावा देता है। इसमें एक तरीके का अफ़सोस और गिल्ट छुपा हुआ होता है। एग्जांपल के तौर पर, “काश मैंने ऐसा नहीं किया होता…!

2.वरी (Worry)

इसमें व्यक्ति को भविष्य की चिंता बनी रहती है। इसमें अनजान चीजों को लेकर डर और आशंका बनी रहती है। आगे क्या होगा इसकी चिंता में व्यक्ति अपने वर्तमान पर फोकस करना भूल जाता है। यह एक तरीके की अनिश्चित से जुड़ा होता है, जिसमें कुछ ग़लत हो जाने की आशंका और डर बना रहता है। कोई भी नया काम शुरू करने से पहले, किसी भी सफ़र पर जाने से पहले या परिस्थितियों में किसी भी तरह के बदलाव से पहले हर इंसान में थोड़ा बहुत डर और आशंका होती है। लेकिन ओवरथिंकिंग करने वाला व्यक्ति लगातार उस पर इतना सोचता है कि उससे उसकी रोज़मर्रा की जिंदगी पर बुरा असर पड़ता है।

यह दोनों ही नेगेटिव थिंकिंग के रूप हैं जो मेंटल हेल्थ के लिए बेहद ख़तरनाक साबित होते हैं। रूमिनेशन व्यक्ति को पीछे की ओर खींचता है जबकि वरी आने वाली अनिश्चितता पर जोर देता है।

 

ओवरथिंकिंग (Overthinking) क्यों होती है?

ओवरथिंकिंग अचानक नहीं होती इसके पीछे बहुत सारी वजहें होती हैं।

1. चिंता और तनाव (Anxiety & Stress)

जब दिमाग को कोई चीज समझ नहीं आती या फिर स्थिति ऐसी होती है कि निश्चित तौर पर कुछ भी न कहा जा सके तो वह ज़्यादा सोचने लगता है। अनिश्चित के समय व्यक्ति सुरक्षा को लेकर ज्यादा सतर्क हो जाता है लेकिन यही जब एक साइकिल बन जाती है जिससे निकलना मुश्किल हो जाता है।

2. परफ़ेक्शन की चाह (Perfectionism)

जो लोग हर काम को बिल्कुल परफ़ेक्ट तरीके से करना चाहते हैं उनके अंदर ओवरथिंकिंग ज़्यादा होती है। हर चीज को परफ़ेक्ट करने की इच्छा ग़लतियों के डर को बढ़ाती है। उनके अंदर बार-बार यह ख़याल आता है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो? यह मुझसे कोई ग़लती हो गई या कुछ छूट गया या फिर मैं अपना बेस्ट नहीं दे पाया तो क्या होगा? परफ़ेक्शन की यह चाहत ओवर थिंकिंग को बढ़ाती है।

3. असफलता का डर (Fear of Failure/Rejection)

बहुत बार कोई काम शुरू करने के पहले इतना ज़्यादा सोच लेते हैं कि अगर मैं फेल हो गया तो क्या होगा, इस वजह से काम शुरू ही नहीं कर पाते हैं। रिसर्चस में पाया गया है की असफलता का डर ओवर थिंकिंग का एक बड़ा कारण है। कोई भी ख़ुद को असफल इंसान के तौर पर देखा जाना पसंद नहीं करता। ऐसे में कुछ भी शुरू करने से पहले इस तरह से सोचना आम बात है। लेकिन जब यह ओवरथिंकिंग इतनी बढ़ जाए कि इस वजह से आप कोई काम शुरू ही न करें तो यह समस्या पैदा करती है।

4. सोशल मीडिया का असर

आज के जमाने में सोशल मीडिया हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। सोशल मीडिया पर दिखने वाले हैप्पी फेसेज रियल लाइफ में कितने खुश हैं यह जाने बिना हम अक्सर उनसे अपनी तुलना कर बैठते हैं। दूसरों से तुलना करने की यह आदत ओवर थिंकिंग को बढ़ाती है। इसमें ऐसा लगता है कि सब खुश हैं, सब सफल हैं, देश विदेश घूम रहे हैं, नई-नई उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं और हम ही सबसे पीछे रह गए हैं। इस तरह की ओवरथिंकिंग लंबे समय में स्ट्रेस और डिप्रेशन का जोख़िम बढ़ाती है।

5. आत्मविश्वास की कमी और ट्रॉमा

बचपन के बुरे अनुभव अक्सर रूमिनेशन को ट्रिगर करते हैं। जब ख़ुद पर भरोसा कम होता है तो हम हर फैसले पर बार-बार सोचते हैं। हमारा दिमाग ख़ुद को किसी भी तरह के ख़तरे से बचाने के लिए एक ही चीज पर बार-बार लगातार सोचता है। ओवरथिंकिंग की वजह से छोटे से छोटा फ़ैसला लेने में घंटों लग जाते हैं। हालांकि इतना समय लगाने के बावजूद व्यक्ति अपने फैसले से संतुष्ट नहीं होता। किसी भी तरह के ट्रॉमा से गुजरने वाला व्यक्ति अक्सर लो सेल्फ एस्टीम और लो कॉन्फिडेंस की वजह से ओवरथिंकिंग का शिकार बन जाता है।

ओवरथिंकिंग के लक्षण (Signs)

ओवरथिंकिंग धीरे-धीरे आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर ऐसी असर डालती है की पता चलना मुश्किल होता है। अगर आपको भी बार-बार पुरानी बातें याद आती हैं छोटे-छोटे फ़ैसले लेने में भी ज़्यादा समय लगता है या हर स्थिति में नेगेटिव ही नज़र आता है तो यह ओवर थिंकिंग के लक्षण हो सकते हैं। इसके अलावा दिमाग लगातार कंफ्यूज और थका हुआ होता है या काम को टालने की आदत (Procrastination) होती है या फिर नींद से जुड़ी समस्याएं यह सब ओवरथिंकिंग की ही लक्षण हैं।

ऐसे में व्यक्ति बार-बार और लगातार सोचता रहता है लेकिन किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच पाता है। इससे मानसिक थकान और ज़्यादा बढ़ जाती है। आपको याद रखना है कि अगर आपका लगातार सोचना समस्या का समाधान निकालने के बजाय उसे और उलझा रहा है तो यह ओवरथिंकिंग हो सकती है। समय रहते इसे पहचानना ज़रूरी है जिससे इससे निजात पाने के लिए उपाय किया जा सके।

ओवरथिंकिंग से होने वाले नुकसान

ओवरथिंकिंग एक ऐसी आदत है जो सिर्फ़ मानसिक ही नहीं बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर डालती है। लगातार ज़्यादा सोचने से स्ट्रेस, एंजायटी और डिप्रेशन का ख़तरा बढ़ जाता है क्योंकि इसमें व्यक्ति एक ही बात पर बार-बार सोचता रहता है और उससे निकल नहीं पता है। इससे फ़ैसले लेने की क्षमता पर भी असर पड़ता है और व्यक्ति अक्सर ग़लत फ़ैसला ले लेता है या फिर फ़ैसले में देरी होने की वजह से काम पर असर पड़ता है। इन सब का नतीजा होता है- काम टालने की प्रवृत्ति यानी प्रोक्रेस्टिनेशन, जिससे पूरा रूटीन और सेल्फ डिसिप्लिन बिगड़ जाता है।

ओवरथिंकिंग का सबसे ज़्यादा असर नींद पर पड़ता है। रात में ज़्यादा सोचते रहने से इनसोम्निया यानी नींद आने में कठिनाई होती है। इससे मानसिक थकान और बढ़ती है। नींद न पूरी होने से सिर दर्द, थकान और भूख न लगने जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। इन सब से प्रोडक्टिविटी कम हो जाती है और व्यक्ति की ग्रोथ रुक जाती है। इस तरह से ओवरथिंकिंग न सिर्फ़ शारीरिक के बल्कि मानसिक सेहत पर भी बुरा असर डालती है। प्रोडक्टिविटी कम होने से हमारा कॅरियर पर प्रभावित होता है साथ ही इससे रिश्तों पर भी असर पड़ता है।

ओवरथिंकिंग (Overthinking) को कैसे रोकें? (आसान और असरदार तरीके)

 

1. अपनी सोच को पहचानें (Awareness)

ओवरथिंकिंग रोकने का सबसे पहला कदम है इसको पहचानना। जब भी दिमाग किसी एक बात पर बार-बार जाए तो ख़ुद से पूछें कि क्या यह मेरी समस्या का समाधान कर रहा है या फिर सिर्फ़ मुझे उलझा रहा है? जैसे किसी ग़लती को बार-बार याद कर रहे हैं तो रुक कर देखें कि क्या इससे कोई फ़ायदा हो रहा है जैसे कोई सबक मिल रहा है या नहीं? अपनी सोच को पहचानने की यह आदत आपको ओवरथिंकिंग को पहचानने में मदद कर सकती है। किसी भी समस्या को पहचाना उसे दूर करने का पहला कदम होता है।

2. सोचने का समय तय करें (Scheduled Thinking)

जब भी कोई बात या ख़याल बार-बार दिमाग में आए तो उसके लिए एक समय सीमा तय कर लें। जैसे इस विषय पर मुझे 15 मिनट तक ही सोचना है या फिर अभी नहीं इस विषय पर मुझे अमुक काम निपटाना के बाद सोचना है। इस तरह से काम को टालने की आदत भी कम होगी और हो सकता है कुछ समय बाद दिमाग उसे बारे में सोच ही न। बार-बार ऐसा करके आप अपने दिमाग को निर्देश देते हैं जो एक समय बाद उस पर असर करने लगता है।

3. अपने विचार लिखें (Journaling)

जब दिमाग में बहुत सारी बातें चल रही हूं तो ऐसे में उन्हें लिखना बेहद कारगर साबित होता है। रात में सोने से पहले दिमाग में जो भी चले उसे कागज पर उतार दें। फिर चाहे वह पास्ट की चिंता हो या आने वाली समय की आशंका। कई रिसर्च में यह साबित हो चुका है कि अपनी फीलिंग्स, स्ट्रेस या किसी भी तरह की बात जो दिमाग में चल रही है उसको कागज पर लिखकर नष्ट कर देने (जला देने या फाड़ देने से) इस मानसिक शांति और सुकून मिलता है।

इसके अलावा अगर आने वाले दिन को लेकर वरी है तो आप अगले दिन की प्लानिंग भी लिखकर कर सकते हैं इससे चीजें ज़्यादा क्लियर दिखने लगती हैं और दिमाग हल्का होता है। जर्नलिंग ओवरथिंकिंग की आदत कम करने में बहुत मददगार साबित होती है।

4. परफेक्शन छोड़ें (Let Go of Perfection)

हमें यह समझना होगा कि कोई भी व्यक्ति परफ़ेक्ट नहीं होता है और कुछ ग़लतियां सभी से होती हैं। हर चीज को परफ़ेक्ट करने की इच्छा ओवरथिंकिंग बढ़ती है। रियल लाइफ में हर छोटे-छोटे फ़ैसले पर ज़्यादा सोचने की वजह है ठीक-ठाक दिखने वाले ऑप्शन को चुनकर आगे बढ़ना सीखना होगा। इसके अलावा फ़ैसला लेने के बाद बार-बार उसको सोचने की आदत पर लगाम लगाना होगा। इसके लिए अपने दिमाग को ट्रेन करना होगा कि जितना सोचना है फ़ैसला लेने के पहले सोच लो उसके बाद इसमें कोई बदलाव नहीं करना है।

5. माइंडफुलनेस और मेडिटेशन करें

माइंडफुलनेस एक ऐसी आदत है जो आपको वर्तमान में रहने की सीख देती है। माइंडफुलनेस का मतलब है वर्तमान में पूरी जागरूकता के साथ बिना जजमेंट के अपने विचारों और भावनाओं को महसूस करना। इसमें पास्ट और फ्यूचर से हटकर ध्यान वर्तमान पर फोकस होता है। इसके लिए मेडिटेशन की प्रैक्टिस भी की जा सकती है।

आजकल मल्टीटास्किंग का ज़माना है यानी हम एक साथ कई काम कर लेना चाहते हैं लेकिन रिसर्चेज में यह साबित हो चुका है कि मल्टीटास्किंग एक मिथ है। जिसे हम मल्टीटास्किंग समझते हैं वह दरअसल एक काम से दूसरे काम पर स्विच करना होता है। इसलिए वर्तमान में रहना और एक समय में एक ही काम पर फ़ोकस करने की आदत विकसित करना ओवर थिंकिंग कम करने में मददगार साबित हो सकती है।

6. सोशल मीडिया का इस्तेमाल कम करें

सोशल मीडिया पर दूसरों की लाइफ देखकर उसे तुलना करना ओवरथिंकिंग बढ़आता है इसलिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल सोच समझकर करना इसे रोकने में मददगार साबित हो सकता है। सोशल मीडिया ऐप्स की नोटिफिकेशंस को बंद रखें। इसके इस्तेमाल के समय भी यह ध्यान रखें कि जो कुछ बाहर से जैसा दिखता है ज़रूरी नहीं की वैसा ही हो। साथ ही सोशल मीडिया पर देखकर दूसरों के लाइफ़ से अपनी तुलना करना बंद करें। इसके अलावा हर दिन सोशल मीडिया इस्तेमाल करने की समय सीमा तय करें और उस पर अमल करें।

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7. शारीरिक रूप से एक्टिव रहें

एक्सरसाइज सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी फ़ायदेमंद होता है। हर दिन 20 से 30 मिनट वॉक, एक्सरसाइज या किसी आउटडोर स्पोर्ट्स के लिए समय निकालें। इसके अलावा आप अपनी पसंद के अनुसार जिम, योगा, एरोबिक्स जैसी एक्टिविटीज में भी हिस्सा ले सकते हैं। इस तरह की फिजिकल एक्टिविटीज करने से स्ट्रेस कम होता है, दिमाग रिलैक्स होता है और इससे ओवरथिंकिंग कम करने में भी मदद मिलती है।

8. हर चीज़ को कंट्रोल करने की कोशिश न करें

आपको याद रखना होगा कि हर चीज आपके कंट्रोल में नहीं होती इसलिए कुछ चीजों को जैसी हैं वैसे ही स्वीकार करना ज़रूरी हो जाता है। जैसे दूसरों की सोच या व्यवहार को बदलने की कोशिश छोड़ देना चाहिए क्योंकि वह आपके हाथ में नहीं है। याद रखें आप किसी के ऐक्शन को कंट्रोल नहीं कर सकते लेकिन अपने रिएक्शन पर कंट्रोल कर सकते हैं। किसी इंसान या स्थिति को बदलना जब आपके कंट्रोल में न हो तो ऐसे में आप अपने सुकून के लिए उसे वैसे ही स्वीकार करें या फिर संभव हो तो दूरी बना लें। जब आप चीजों को स्वीकार करना सीख जाते हैं तो दिमाग बेकार की चिंता से दूर होता है।

ओवरथिंकिंग आपको व्यस्त तो रखती है लेकिन यह कभी ग्रोथ नहीं देती। ओवरथिंकिंग की वजह से अगर नींद आने में समस्या हो रही है तो इसके लिए आपको सोने से एक घंटा पहले से फ़ोन और गैजेट्स से दूरी बनानी होगी। क्योंकि अक्सर ऐसा होता है रात में ओवरथिंकिंग से बचने के लिए हम मोबाइल फोन उठा लेते हैं और इस वजह से नींद और भी ज़्यादा डिस्टर्ब हो जाती है। मकसद यह नहीं कि आप सोचना ही बंद कर दें बल्कि यह है कि सही तरीके से सोचना है।

इसके अलावा अगर ओवरथिंकिंग आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित कर रही है तो कई बार मदद लेना ज़रूरी हो जाता है। इसके लिए आप किसी भरोसेमंद दोस्त या करीबी से बातचीत कर सकते हैं। इससे भी समस्या का समाधान ना हो तो प्रोफेशनल काउंसलर या थैरेपिस्ट की मदद लेने में संकोच न करें। सही गाइडेंस और थेरेपी से आप ओवरथिंकिंग को कंट्रोल कर सकते हैं।

© प्रीति खरवार

स्रोत:

1.https://www.sciencedirect.com/science/article/abs/pii/S0005796715000455

2,https://timesofindia.indiatimes.com/life-style/spotlight/indians-overthinking-for-three-hours-or-more-daily-suggests-india-overthinking-report/articleshow/123059592.cms

FAQs

Q1. क्या ओवरथिंकिंग एक बीमारी है?

नहीं, यह खुद में कोई mental illness नहीं है, लेकिन anxiety और depression से मजबूती से जुड़ी हुई है और उन्हें बदतर बना सकती है।

 

Q2. रात में ओवरथिंकिंग कैसे रोकें?

मोबाइल बंद रखें, विचारों को कागज पर लिखें, गहरी सांस लें, मेडिटेशन करें।

 

Q3. क्या ओवरथिंकिंग दिमाग को नुकसान पहुंचाती है?

सीधे नहीं, लेकिन लगातार तनाव से cognitive function प्रभावित होता है और mental health issues बढ़ते हैं।

 

Q4. ओवरथिंकिंग कितनी आम है?

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित (2025) के अनुसार, 81% Indians रोजाना 3 घंटे या ज्यादा ओवरथिंकिंग करते हैं।

Priti Kharwar

प्रीति खरवार एक स्वतंत्र लेखिका हैं, जो शोध-आधारित हिंदी-लेखन में विशेषज्ञता रखती हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में परास्नातक प्रीति सामान्य ज्ञान और समसामयिक विषयों में विशेष रुचि रखती हैं। निरंतर सीखने और सुधार के प्रति समर्पित प्रीति का लक्ष्य हिंदी भाषी पाठकों को उनकी अपनी भाषा में जटिल विषयों और मुद्दों से सम्बंधित उच्च गुणवत्ता वाली अद्यतन मानक सामग्री उपलब्ध कराना है।

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