रचनात्मकता के विविध आयाम

रचनात्मकता के विविध आयाम

 

रचनात्मकता और कुछ नहीं सोचने का एक तरीका है। यह style of thinking , uniqueness या अनूठापन है। यूं भी कह सकते हैं कि creativity emphasizes making something that is new and different.

मनोवैज्ञानिक आइजेंक( Eysenck)) के अनुसार “सृजनात्मकता वह योग्यता है जिसके द्वारा नए संबंधों का ज्ञान होता है, इसकी उत्पत्ति में चिंतन के परंपरागत प्रतिमानों से हटकर असाधारण विचार उत्पन्न होते हैं।” सृजनात्मकता के समक्ष हमेशा एक चुनौती रहती है – नया कुछ करने की, पुरानेपन से निजात पाने की और यही चुनौतियां, यही जद्दोजहद रचनात्मकता के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती हैं।

प्रत्येक व्यक्ति रचनात्मक हो सकता है – यदि वह स्वयं पर कम करे, अपनी आंतरिक आवाज़ सुने। रचनात्मकता व्यक्ति के अंदर एक प्रकार का विशिष्टता बोध लाती है, पर तब जब वह अपनी रचनात्मकता को समझ पाता है, पकड़ पाता है। कई व्यक्तियों को जैसे कि अविख्यात लोक कलाकार या निरक्षर परंतु विशिष्ट कला से संपन्न व्यक्ति को अपनी सृजनात्मक प्रतिभा का अवरोध तक नहीं होता और वे उससे सार्वजनिकता एवं लोकप्रियता का आनंद नहीं उठा पाते। वे अपनी विशिष्टता को कभी समझ नहीं पाते पर वे विशिष्ट होते हैं।

रचनात्मकता सदैव एक विशिष्ट प्रकार का अभिव्यक्ति कौशल है। चाहे एक कविता हो, कहानी हो, मूर्ति हो, चित्र हो या खेत की क्यारी या गृहिणी द्वारा पकाया गया भोज्य पदार्थ हो, सभी अपने आप में ख़ास प्रकार की अभिव्यक्ति का माध्यम है। इसी से जुड़ा एक तथ्य यह भी है कि प्रत्येक कार्य में इंसान अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन कर सकता है। न सिर्फ ड्राइंग, पेंटिंग, नृत्य, गायन और वादन सृजनात्मकता के आयाम हैं वरन यह एक बहु आयामी प्रक्रिया है।

घर सजाना, बागवानी करना, रसोई में भोजन पकाना यहां तक कि झाड़ू-पोंछा करना भी सृजनात्मक है यदि हमारा तरीका विशिष्ट है और इससे हमें आनंद की उपलब्धि होती है। सृजनात्मकता अपने आप में है क्या, एक प्रकार की विशिष्टता ही तो है, यह जिस भी क्षेत्र में आ जाए, वही सृजनात्मक हो जाएगा!

सृजनात्मकता दैवीय उपहार है या परिवेश व प्रशिक्षण जनित- यह अब तक एक बहस का मुद्दा है। मनोवैज्ञानिक भी इस पर एक मत नहीं हैं। जहां पहले रचनात्मकता को जन्मजात या अनुवांशिक माना जाता था और बहुत ही कम लोगों में इसका होना स्वीकार किया जाता था वहीं अब इसे परिवेशजन्य और प्रशिक्षण पर आधारित माना जाता है। परंतु सच तो यह है कि यह दोनों ही मत एकांगी है।

देखा जाए तो न तो प्रतिभा इस हद तक जन्मजात है कि उसे किसी भी परिवेश, परिस्थिति और प्रशिक्षण की आवश्यकता मात्र न हो और न यह इतनी बाह्यारोपित है कि किसी भी व्यक्ति को परिवेश विशेष में रखकर प्रशिक्षण के माध्यम से किसी भी क्षेत्र में रचनात्मक बना दिया जाए।

इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रत्येक बच्चा जन्म से दूसरे बच्चों से भिन्न होता है। खेलों के माध्यम से, प्रश्नोत्तरी के माध्यम से उनके रचनात्मक आयामों की पहचान करके उन्हें फिर उचित परिवेश और प्रशिक्षण देकर उनकी रचनात्मक क्षमताओं को निखारा जा सकता है। आज बहुत जगह यही हो रहा है। नर्सरी कक्षाओं से बच्चों की कलात्मक अभिरुचियां माता-पिता चिन्हित करने का प्रयास करने लगे हैं और फिर शुरू होता है रियाज, अभ्यास, प्रदर्शन और प्रोत्साहन-पुरस्कारों का सिलसिला!

जन्मजात प्रतिभा न हो तो प्रत्येक बच्चा प्रत्येक कला में प्रवीण हो जाए ,जबकि ऐसा नहीं है और यदि जन्मजात प्रतिभा ही सब कुछ हो तो एक बच्चे को प्रशिक्षण और परिवेश के बगैर निखर कर फर्श से अर्थ तक का सफ़र करते देखना नामुमकिन है। साहित्यिक रचनात्मकता हेतु भी काव्यशास्त्रियों ने प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास ये तीन काव्य हेतु माने हैं। इनमें से प्रतिभा यदि जन्मजात रचनात्मकता का पर्याय मानी जाए तो शेष दो परिवेशगत एवं प्रशिक्षणगत रचनात्मकता के प्रतीक हैं।

कोई भी प्रतिभा सिर्फ़ वैयक्तिक अनुशासन व कठोर प्रशिक्षण से उपजा हुआ क़ायदा मेरे मुताबिक नहीं होती वरन यह तो ख़ुद से ख़ुद का संवाद है, एक आंतरिक आह्लाद है और है स्वयं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम!

कुछ लोग सांचो- ढांचों में रचनात्मकता को बांधने का प्रयास करते हैं या बंधे होना दर्शाते हैं तो उस पर इतना ही विचार है कि सांचों और ढांचों में जो ढल जाए वह वस्तुत: रचनात्मकता है ही नहीं, वह मात्र प्रदर्शन, प्रदर्शनप्रियता और छद्म रचनात्मकता है।

रचनात्मकता सदैव नयेपन का सृजन है। सृजन का मतलब ही है जन्म और जन्म हमेशा एक नई कृति का होता है। परिवर्तन भी रचनात्मकता का एक आयाम है। याद रखें-जो परिवर्तन का विरोध करते हैं, प्राचीन और परंपरा के प्रति दुराग्रही हैं , वे कभी रचनात्मकता के पक्षधर नहीं हो सकते। जो जितनी आसानी से नूतनता को स्वीकार करता है, परिवर्तन का सत्कार करता है, वह उतना ही रचनात्मक है।

साथ ही ज़रूरी नहीं कि हमेशा कुछ नया प्रॉडक्ट ही बनाया जाए, एक नया विचार, मंथन, चिंतन, बदलाव जो कि सकारात्मक हो और रूढ़ सामाजिक ढांचे को बदलने का जज़्बा रखें ये भी रचनात्मक क्षमताओं के अंतर्गत ही परिगणित किया जाना चाहिए। आख़िर को रूढ़ ढांचों को तोड़ कर ही अभिनव का निर्माण संभव होता है।

 

© डॉ. संजू सदानीरा

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Dr. Sanju Sadaneera

डॉ. संजू सदानीरा प्रतिष्ठित मोहता पीजी कॉलेज में प्रोफेसर और हिंदी साहित्य विभाग की प्रमुख हैं। इन्हें अकादमिक क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का समर्पित कार्यानुभव है। हिन्दी, दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान विषयों में परास्नातक डॉ. संजू सदानीरा ने हिंदी साहित्य में नेट, जेआरएफ सहित अमृता प्रीतम और कृष्णा सोबती के उपन्यासों पर शोध कार्य किया है। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के स्नातक के पाठ्यक्रम के लिए इनकी किताबें विशेष उपयोगी हैं। ये "Dr. Sanju Sadaneera" यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी शिक्षा के प्रसार एवं सकारात्मक सामाजिक बदलाव हेतु सक्रिय हैं।

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