गदल कहानी का सारांश/ मूल संवेदना

रांगेय राघव की लिखी गदल कहानी का सारांश/ मूल संवेदना

 

गदल रांगेय राघव की एक अत्यंत चर्चित और लोकप्रिय कहानी है। रांगेय राघव हिंदी साहित्य के उन साहित्यकारों में से हैं, जिनकी साहित्यिक प्रतिबद्धता की मिसाल दी जाती है। समाज के निचले तबके के लोगों के प्रति सहानुभूति और हाशिए के समाज के प्रति परिवर्तन का आग्रह उनकी रचनाओं की ख़ासियत है।

कब तक पुकारूं, मर्दों का टीला और धरती मेरा घर उनके ज़रूरी उपन्यास हैं। गदल, गूंगे, समुद्र के फेन, देवदासी, एयाश मुर्दे, रामराज्य का वैभव, अंगारे न बुझे, इंसान पैदा न हुआ, अधूरी मूरत और जीवन के दाने इत्यादि इनकी महत्त्वपूर्ण कहानियां हैं। इन्होंने ज्वलंत विषयों पर बहुत मर्मस्पर्शी साहित्य रच कर एक प्रकार से साहित्यकारों के लिए उच्च कसौटी तैयार करने का काम किया।

गदल कहानी परिवेशगत चित्रण अत्यंत सजीवता के साथ करने वाली चरित्र प्रधान कहानी है। गदल नायिका प्रधान कहानी है,जो गदल नामक एक अधेड़ उम्र की महिला के जीवन को एक नयी दृष्टि से देखते हुए लिखी गई है।

इस कहानी में एक तरफ़ तो एक स्त्री की ज़िद, प्रेम, जिजीविषा और आत्म सम्मान के प्रति तीव्र ललक देखी जा सकती है तो दूसरी तरफ परंपराओं के प्रति दुराग्रह और मृत्यु पर्यंत है हठ भी दिखाया गया है।

कहानी गदल नामक एक अधेड़ उम्र की महिला के घर छोड़कर अपने से कम उम्र और लगभग अपने बेटे की उम्र के मर्द के साथ रहने के निर्णय से शुरू होती है। महिला के बेटे निहाल को उसके इस कदम से गुस्से से तिलमिलाते दिखाया जाता है। जिस दिन गदल गई थी, उसी दिन शाम को उसे घेर कर वापस लाया जाता है और मां-बेटे के बीच तीखी बहस होती है। गदल के देवर डोडी के हस्तक्षेप से किसी तरह बात टलती है। रात की निस्तब्धता में डोडी द्वारा गदल के इस तरह चले जाने का कारण पूछे जाने पर वह डोडी को ही उसके इस कदम का उत्तरदायी बताती है।

दरअसल डोडी के बड़े भाई और गदल के पति गुन्ना की कुछ सालों पहले मृत्यु हो चुकी है। डोडी की भी पत्नी और बच्चे असमय काल कवलित हो गये। डोडी गदल के परिवार के साथ ही रहा, जो कुछ कमा कर लाता-गदल के हाथ पर ही रख देता। गदल का लगन करने जब डोडी का बड़ा भाई गुन्ना गया तब डोडी भी उसके साथ ही गया था। दोनों हम उम्र थे। बाल पन की उस पहली मुलाकात से ही गदल की डोडी के साथ आत्मीयता बराबर बनी रही।

अब गदल भी साथी विहीन है और डोडी तो पहले से अकेला था। डोडी ने अपने बड़े भाई की मृत्यु के बाद भी संकोचवश कभी गदल से साथ हो जाने की बात होठों पर आने नहीं दी जबकि उनकी बिरादरी में यह सहज स्वीकार्य था। इधर गदल की बहू उसे ताने देती, कठोर शब्दों का प्रयोग करती। डोडी की खामोशी ने गदल के आत्म-सम्मान को जो ठेस पहुंचाई, उसकी परिणति मौनी के घर की चौखट में प्रवेश से हुई।

पूरी गदल कहानी उतार-चढ़ाव और नाटकीयता से भरपूर है। डोडी की उदासी गदल के चले जाने के बाद जिस प्रकार से दिखाई गई है, वह महज उदासी नहीं वरन जीवन से उदासीनता का आभास देती है। यही हुआ भी। घर में गदल की अनुपस्थिति डोडी चौबीस घंटे भी नहीं झेल पाया और उसका शरीर शांत हो गया। यह खबर सुनते ही जिस प्रकार से गदल बेचैन हुई, उससे उसके डोडी के प्रति प्रेम का पता चलता है। मौनी (उसका नया पति) के कड़े पहरे के बावजूद वह चुपचाप वहां से निकल जाती है और वापस अपने घर पहुंच जाती है।

बेटों के साथ उसकी थोड़ी देर स्वाभाविक तकरार के बाद डोडी के क्रिया कर्म और श्राद्ध का ज़िम्मा गदल तमाम पाबंदियों के बाद भी ले लेती है। मिलिट्री शासन है और 25 से ज़्यादा लोगों को भोज खिलाने पर प्रतिबंध है। गदल का सारे गांव को न्योता देना, पैसा पानी की तरह बहाना थानेदार को रिश्वत देना सब कहानी में अत्यंत स्वाभाविक रूप से चित्रित हुआ है। गदल के वापस चले जाने से उसके एक दिन के युवा पति मौनी की जलन गदल की मौत का कारण बनती है।

गदल गांव के थानेदार से रिश्वत देकर भोज का निश्चिंत आयोजन करती है और उधर मौनी शहर के बड़े अफसर से इस भोज की रिपोर्ट कर देता है। नौकरी जाने के भय से मजबूरी में थानेदार को आना पड़ता है। भयंकर गोलीबारी में गदल मारी जाती है। मरने के पहले वह आखरी पंगत तक को निपटा देता है। इतना ही नहीं अपने बेटों को पत्नी बच्चों सहित अपनी सुगंध देकर घर से दूर भेजना उसकी प्रगाढ़ ममता को दर्शाता है।

कहानी का अंत दुखद है। पुलिस का अकेली महिला के घर में होने और गोली लगने के बाद पूछने कि “तू है कौन” का जवाब -”जो एक दिन अकेला न रह सका उसी की..” भीतर तक मन को भिगो जाता है।

राजस्थान के मरुस्थलीय जीवन और देश के दूर दराज इलाकों में बसे मूल निवासियों का प्रतिनिधित्व करने वाली यह कहानी जातिगत विद्वेष, स्त्री के निर्णय को परिवार की नाक से जोड़ने की जो स्थिति दिखाती है, वह लगभग सारे देश की मानसिकता से मेल खाती है।

नया है तो गदल का साहस, जो अपने देवर से कह डालती है कि उसका भाई (गदल का पति) जब तक ज़िंदा था, तब तक उसने पति के साथ-साथ उसके पूरे परिवार की चाकरी की, अब जब वही नहीं रहा तो क्यों किसी की ठोकरों में रहे, दया के टुकड़ों पर पले और कठोर बातें सुने? डोडी उसे पत्नी रूप में स्वीकार लेता तो फिर वह उसी रौब से डोडी को अपना स्वामी मान कर वहां रहती।

अपना मजाक बनाये जाने पर वह अपने नये पति मौनी की भाभी दुल्लो को भी खरी-खरी सुनाने से नहीं चूकती है। यहां तक कि मौनी को भी नहीं बख़्शती। टोकते ही गदल मौनी को अपने सामने बच्चा तक बता देती है। एक प्रकार से गदल अपनी उम्र पर भी गर्व ही करती है और किसी से नहीं दबती। बस उसकी एक बात खटकती है कि वह पति की डांट-मार को स्वाभाविक समझती है ,उसे पत्नी के लिए सम्मान की तरह देखती है। यह उसकी पितृसत्तात्मक समाज से प्राप्त कंडीशनिंग है।

इस प्रकार गदल कहानी स्त्री मन की थाह-चाह, स्वाभिमानी स्त्री की प्रकृति, परंपराओं के प्रति दुराग्रह, स्वाभिमान मिश्रित प्रेम, सामुदायिक रूढ़ियों का चित्रण, पारिवारिक कलह का स्वाभाविक वर्णन, स्त्री के निर्णय से पुरुषवाद पर चोट, सामाजिक वातावरण का विशद अंकन और न्याय प्रणाली की असलियत जैसी बहुत सारी स्थितियों को बयान करती है।

प्रेम पाने की टीस,उसके अभाव से मिलने वाला खोखलापन और साहस का अनूठा संगम गदल कहानी में पूरी मार्मिकता के साथ दिखाया गया है। हिंदी साहित्य में गदल कहानी का अपने कथ्य और शिल्प के अनूठेपन के कारण अक्षुण्ण स्थान है।

 

© डॉ. संजू सदानीरा

फैसला कहानी का सारांश यहां पढ़ें..

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Dr. Sanju Sadaneera

डॉ. संजू सदानीरा प्रतिष्ठित मोहता पीजी कॉलेज में प्रोफेसर और हिंदी साहित्य विभाग की प्रमुख हैं। इन्हें अकादमिक क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का समर्पित कार्यानुभव है। हिन्दी, दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान विषयों में परास्नातक डॉ. संजू सदानीरा ने हिंदी साहित्य में नेट, जेआरएफ सहित अमृता प्रीतम और कृष्णा सोबती के उपन्यासों पर शोध कार्य किया है। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के स्नातक के पाठ्यक्रम के लिए इनकी किताबें विशेष उपयोगी हैं। ये "Dr. Sanju Sadaneera" यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी शिक्षा के प्रसार एवं सकारात्मक सामाजिक बदलाव हेतु सक्रिय हैं।

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