फैसला कहानी का सारांश या मूल संवेदना
फैसला मैत्रेयी पुष्पा की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कहानी है। मैत्रेयी पुष्पा हिंदी की जानी-मानी कथाकार है। इन्होंने अनेक उपन्यास और कहानी लिखीं जिन में इन्होंने समाज के शोषित और वंचित वर्गों की पीड़ा को दर्शाया है।
चिन्हार, गोमा हंसती है, ललमनिया, पियरी का सपना इत्यादि इनकी प्रमुख कहानियां हैं।बेतवा बहती रही, इदन्नमम, चाक, झूला नट, अल्मा कबूतरी, कही ईसुरी फाग इत्यादि इनके अत्यंत चर्चित उपन्यास हैं। गुड़िया भीतर गुड़िया इनकी आत्मकथा है।
फैसला इनकी बहुत ज़रूरी कहानी है,जिस पर टेलीफिल्म “वसुमती की चिट्ठी” नाम से बनाई गई है।
फैसला कहानी का विषय अत्यंत मार्मिक एवं प्रासंगिक है। कहानी को पत्र शैली में लिखा गया है। कथा नायिका वसुमती अपने शिक्षक को पत्र लिखकर गांव में अभी-अभी संपन्न हुए प्रमुख के चुनाव परिणाम की जानकारी दे रही है।इस चुनाव में सिर्फ एक वोट से उसके पति की हार होती है, जो पूर्व में इसी पद पर थे और अपनी जीत के लिए पूरी तरह से आश्वस्त थे। इस घटनाक्रम के साथ ही कहानी फ़्लैश बैक में चलने लगती है, जहां उसका, उसके पति रनवीर का पूरे इलाके का जीवन सामने आ जाता है।
गांव में प्रधानी और प्रमुख के चुनाव में होने वाली कुत्सित राजनीति, घात-प्रतिघात, दलितों का शोषण, पत्नी के नाम और उसके पद का दुरुपयोग, पैसे खाकर गरीबमारी करना और रसूखदारों के हक में फैसला देना, निरपराध को फंसाना, न्याय की गुहार लगाते निर्दोष का थक कर मर जाना जैसी दुखद स्थितियों का मार्मिक और जीवंत चित्रण इस कहानी में किया गया है।
महिला प्रत्याशी को जिताने के लिए महिलाओं में एकजुटता, महिला नेत्री के नेतृत्व के प्रति औरतों में उत्साह परंतु मर्दों में इसके प्रति उदासीनता और आक्रोश- यह सब भी इस कहानी में बहुत कुछ ईमानदारी के साथ दिखाया गया है। पैसों के लालच में अपनी ही बेटी की जिंदगी बर्बाद करना और उसके पति को ही उसका हत्यारा साबित करना पुलिस- प्रशासन, नेता और व्यापारियों का खतरनाक गठजोड़ को दर्शाता है।
कहानी अंत में इस आशा के साथ खत्म होती है कि अंतरात्मा की आवाज को अनसुना नहीं किया जाना चाहिए और तमाम कारगुजारियों के बाद भी शासको के हाथ से फिसल कर सत्ता शोषितों/आम आदमी के पास आ सकती है। श्रेष्ठता बोध की अमानवीय आदत और दलितों को राज-काज संभालने के योग्य न मानने की रूढ़िवादी सोच पर भी कहानी व्यंग्यात्मक प्रहार करती है।
पति से बार-बार अपमानित होने वाली वसुमती अंत में उसके प्रतिपक्षी को अपना वोट दे देती है और सिर्फ एक वोट से प्रमुख का चुनाव रनवीर हार जाता है। यहां कहानी में एक सवर्ण मर्द से सत्ता को एक दलित युवक के हाथ में जाते दिखाया गया है।
रनवीर अपनी हार से धराशाई सा हो गया है।एक पत्नी की पारंपरिक भूमिका में नजर आते हुए यहां वसुमती उसके लिए दुखी है, उसको सांत्वना देने की हरसंभव कोशिश करती है लेकिन अपना वोट उसे न देकर वह उस अपमान का बदला ले लेती है जो उसे अन्याय को चुनौती देने से रोकता था।
रनवीर प्रधान चुनाव जीती हुई अपनी पत्नी को न वह पद संभालने देता था न वह उसे उस योग्य ही मानता था। उस पद को वह अपनी कृपा मानता था क्योंकि वह एक साथ दो चुनाव नहीं लड़ सकता था जबकि कहानी में दिखाया गया है कि वसुमती महिलाओं की एकतरफा उसके लिए वोटिंग से जीती है। यह दूसरी बात है कि वह महिलाओं के लिए काम करने नहीं दी जाती। न्याय देने जाती पत्नी को घर की दहलीज में रोक लेना, उसे घर की शोभा समझना पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बनाये रखना है और रनवीर यह बराबर करता रहा।
इसके अलावा हर फैसला उसने प्रभावशाली लोगों के हित में दिया। वसुमती रनवीर की हार से अपने अंदर की ईसुरिया ( कहानी की स्वाभिमानी बकरी पालक महिला) को ज़िन्दा रखने की बात कहकर मनुष्यता पर भरोसा बनाये रखने का संदेश देती है। ईसुरिया वस्तुत: इस कहानी की सबसे सशक्त स्त्री पात्र है,जिसकी प्रेरणा ही कहीं न कहीं वसुमती को वह जज्बा देती है,जो चुनाव का फैसला बदल देता है।
© डॉ. संजू सदानीरा
फुलवा कहानी पर प्रश्नोत्तर यहां पढ़ सकते हैं..



