फुलवा कहानी पर प्रश्नोत्तरी

रत्नकुमार सांभरिया की फुलवा कहानी  और उस पर प्रश्नोत्तरी

 

रामेश्वर के हाथ में कागज का एक पुर्जा है। वह कॉलोनी की गली-गली गाह रहा है, दोपहर से। उसे पं. माताप्रसाद का मकान नहीं मिला। समूचा गाँव पंडित जी की ढोक देता था, शहर आकर बौने हो गए। ऐसे बौने, कोई जानता तक नहीं है। जिससे पूछो वही प्लॉट नम्बर पूछता है, उनका। प्लॉट नम्बर हुए कि पंडित जी का पतरा हो गया। कारज सधता ही नहीं है उसके बगैर।

जिस ससुरी बात का रामेश्वर टेंटुआ दबाए था, वही बात उसके सिर पर चढ़कर बैठ गई थी। शहर आकर शहरी हो जाना चाहिए। रात निकलते बेर लगती है! फुलवा भी इसी कॉलोनी में रहती है। उसके लड़के का पूरा पता है रामेश्वर की जेब में। उसने जेब से दूसरा पुर्जा निकाल लिया। एक युवक गेट के सामने अपना स्कूटर खड़ा कर रहा था। रामेश्वर दो कदम आगे बढ़ा।

कागज पढ़कर युवक ने रामेश्वर को सिर से पैर तक ताका। शख्सियत के नाम पर बयालिस-तिरालीस के दरमियान उम्र, मध्यम काठी, गेहुँआ रंग, खुटिया श्वेत-श्याम दाढ़ी-मूँछें, कानों में सोने की भारी-भारी मुर्कियाँ। दोलाँघी धोती और कुर्ता, सिर पर छींट का गुमटीदार साफा। साफे का छोर उसकी कमर के पृष्ठ भाग का स्पर्श करता था। रामेश्वर को चिन्ता और परेशानी में डूबा देखकर युवक ने उससे पूछा, “राधा मोहन साहब के घर जाना है तुम्हें?”

“जी बाबू साहब।” रामेश्वर के स्वर में चिन्ता, उदासी और आजिजी थी। उसने बगल में दबाए अपने बैग को हाथ में ले लिया था।

“कुछ लगते हो उनके?”

“लगता तो नही हूँ। गाँव का हूँ उसके।” रामेश्वर ने पतले कंठ से उत्तर दिया। युवक स्कूटर स्टार्ट करते हुए बोला, “वे चौथी गली में रहते हैं। बादल आ जाएँगे। स्कूटर पर बैठिए। मैं छोड़ आता हूँ तुम्हें।”

रामेश्वर का सिर भिन्ना उठा। पंडित जी को कोई नहीं जानता, फुलवा के छोरे को पोर-पोर जानता है। स्कूटरवाला उसे एक कंगूरेदार आलीशान कोठी के सामने छोड़कर चला गया था। रामेश्वर को आश्चर्य ने झिंझोड़ा। फुलवा की कोठी है यह ? उसने हौले-हौले गेट बजाया। बाहर बरामदे में बैठी एक बुढ़िया वहाँ आ गई थी। मुटाई देह। गोरे चेहरे पर पड़ी झुर्रियों में कान्ति दिपदिपा रही थी। उसकी आँखों पर चश्मा था और वह धुली हुई धवल साड़ी पहने थी। उसने साड़ी को सिर पर लेते हुए गेट खोला।

फुलवा थी वह। न रामेश्वर फुलवा को पहचान पाया, न फुलवा रामेश्वर को पहचान पाई। दोनों एक-दूसरे को अजनबीपन से टुकुर-टुकुर देखते रहे। फुलवा ने नाक के सिरे तक चश्मा लाकर देखा, लेकिन उसकी समझ, समझ न पाई।

रामेश्वर ने आँखें सिकोड़ीं, “फुलवा!”

“कौन, रामेश्वर?”

“हाँ, भाभी।”

फुलवा ने माथे पर थपकी मारी, “हाय राम, गाँव से आई तो मुटियार थे। बुढ़ा गए हो पन्द्रह साल में ही। अन्दर आइए न।” फुलवा फूली नहीं समा रही थी। उसके घर-गाँव के जमींदार के कुँवर आए हैं।

वह दुर्दिन था। फुलवा का पति, जमींदार के एक बिगड़ैल बैल को सीधा कर रहा था। नकेल ढीली पाते ही उस गुस्सैल बैल ने उसके पेट में सींग डाल दिया। वह तड़पा, फड़फड़ाया। फुलवा की माँग पुँछ गई थी। फुलवा का बेटा राधा मोहन दसेक साल का था, तब। टहलुवई फुलवा को उत्तराधिकार में मिल गई थी, जैसे साहूकार को साहूकारी मिल जाती है, जमींदार को जमींदारी। दो पेट थे। वह जमींदार के घर घास छीलती, पानी भरती और पशुओं को चारा-पानी करती थी।

बाहर बेंत की कुर्सियाँ और टेबलें पड़ी थीं। फुलवा बेंत की कुर्सी पर बैठ गई थी। उसने दूसरी कुर्सी की ओर इशारा किया, “बैठिए ना, रामेश्वर जी।”

रामेश्वर कुर्सी पर बैठ गया था। सफेद रंग के छबरैल से दो कुत्ते अन्दर से आए। उन्होंने रामेश्वर को सूँघा और उसके मुँह की ओर देखकर सूँ-सूँ करने लगे। उसने पाँव ऊपर उठा लिये और डर से गठरी हो गया। फुलवा ने कुत्तों को डपटा, “पम्पी, मीनू अन्दर जाओ। ये तो रामेश्वर जी हैं, गाँव के जमींदार। मेहमान हैं अपने।”

दोनों कुत्ते किसी समझदार बच्चे की भाँति वहाँ से चले गए थे। रामेश्वर का वहम यथार्थ में तब्दील हो गया था। फुलवा किरायेदार नहीं, मालकिन है, कोठी की। जात्याभिमानी रामेश्वर डाह से सुलगने लगा था।

फुलवा रामेश्वर की ओर देखकर उठ खड़ी हुई थी। उसने सामने के कमरे का जालीदार किवाड़ खोला और रामेश्वर को अन्दर ले गई। कोठी में दस-बारह कमरे हैं। दीवारों पर डिस्टेम्पर है। संगमरमर बिछा है। फर्श देखकर रामेश्वर की आँखें चुधिया गईं। उसकी घरवाली काँसे की थाली भी साफ नहीं करती है, ऐसी तो। फुलवा के परिवार में पाँच सदस्य हैं। फुलवा, उसका बेटा राधामोहन, बहूरानी एक पोता और एक पोती।

फुलवा की खुशी के डैने फैले थे। हवा में तिरने लगी थी वह। वह कोठी की एक-एक चीज रामेश्वर को दिखाएगी। ऐसी चीजें, गाँव के जमींदारों और बनिये-बाभनों के घरों में भी शायद हों। वह रामेश्वर को लाउंज में ले गई। वहाँ डाइनिंग मेट पड़ा था। सफेद सनमाइका की टेबल पर रामेश्वर ने झुककर देखा। टेबल के भीतर भी रामेश्वर था, जैसा काँच में होता है। फुलवा का सुनहरी फ्रेमवाला चश्मा लूज था। वह नाक तक सरक आता था। चश्मा ठीक करके फूलवा ने उसे बताया, *रामेश्वर जी, शाम को हम सब यहीं बैठकर भोजन करते हैं। मेहमान भी यहीं भोजन करते हैं। आज रात तुम भी यहीं बैठकर भोजन करोगे।”

रामेश्वर को सूई-सी चुभी। उसके यहाँ तो मेहमानों के लिए चटाई बिछती है। फुलवा के मन में एक ऐसा उछाह था, जो ज्वार की तरह बढ़ भी रहा था और फैल भी रहा था। वहाँ रखे फ्रीज को उसने खोला। फ्रीज में पानी की ठंडी बोतलें, कोल्ड ड्रिंक्स, आम, सेब, सन्तरे आदि रखे हुए थे। आइस बॉक्स के चौकोरों में बर्फ के टुकड़े थे। फुलवा ने बॉक्स निकालकर रामेश्वर से कहा, “इन खानों को पानी से भर देते हैं। पानी बर्फ बन जाता है। हम तो दूध की कुल्फी भी फ्रीज में ही जमाते हैं।”

पास ही मिक्सी रखी थी। रामेश्वर की जिज्ञासु आँखें जब उस पर टिकी रहीं, तो फुलवा ने उसे बताया, “यह मिक्सी है, रामेश्वर जी। इसमें से आम, सन्तरा, अंगूर, गाजर और टमाटर का जूस निकालते हैं। चूरमा भी आँख के सुरमा की मानिन्द महीन हो जाता है इसमें।”

फुलवा रामेश्वर को रसोई में ले आई। संगमरमर से बनी रसोई कीमती बर्तनों से अटी पड़ी थी। रसोई देखकर रामेश्वर की आँखें वहीं खड़ी रह गईं। गैस थी। फुलवा ने लाइटर उठाया और बटन चालू करके चूल्हा जला दिया। रामेश्वर का मुँह बया की तरह खुला रह गया था। चूल्हा फूंकते उसकी घरवाली की आँखें झरने लगती हैं। फुलवा का चूल्हा पलक झपकते ही धधक उठा। फुलवा ने गैस बन्द कर दी थी। वहाँ नल लगा हुआ था। उसने नल खोला तो गल्ल-गल्ल पानी कूदने लगा। फुलवा ने उसे बताया, “चौबीस घंटे पानी आता है, हमारे नल में।”

सोलह-सत्रह साल की जेहन में पड़ी बात रामेश्वर को याद आ गई थी। फुलवा की जातवालों को जमींदारों के कुएँ पर चढ़ने की मनाही थी। वह जिस कुएँ से पानी लाती थी, वह आधा कोस दूर था, उसके घर से। रामेश्वर कुएँ पर नहा रहा था। फुलवा कुएँ के घेर के नीचे खड़ी थी मटका लिये। वह रामेश्वर को बार-बार हाथ जोड़ रही थी, “आज मुझे गाँव जाना है, रामेश्वर जी। दो बाल्टी पानी उड़ेल दो मटके में।”

फुलवा का बार-बार ‘रामेश्वर’ कहना रामेश्वर को काट गया था। उसने गुस्सा कर मटके पर थूक दिया था। फुलवा ने मटका वहीं फोड़ दिया और वह रोती आँखें लिये घर लौट आई थी। एकाएक फुलवा की पिपनियाँ गीली हो गई थीं, मानो उसे भी वही घटना याद हो आई थी, जैसे दो हाथ एक ही समय गुल्लक में पड़े हों। समय सौदागर है। रामेश्वर आज भी उसी कुएँ से पानी भरता है। फुलवा की रसोई में भी नल है।

रामेश्वर को साथ लेकर फुलवा एक कमरे में गई। वहाँ उसकी पोती पढ़ रही थी। बॉब स्टाइल में कटे बाल। स्कर्ट और शर्ट में बैठी वह षोडशी रामेश्वर की आँख की किरकिरी बन गई। फुलवा की पोती की जोड़ की एक भी लड़की नहीं है, उसके गाँव में। निकलते कद की यह लड़की कितनी ख़ूबसूरत है। लड़की ने पढ़ाई छोड़कर रामेश्वर को नमस्कार करने की औपचारिकता की और पुनः पढ़ने लग गई। वह क्रोधित हुआ, उसे देखकर फुलवा की पोती खड़ी नहीं हुई। दूसरे कमरे में फुलवा का पोता अध्ययनरत था। अपनी दादी माँ के साथ आया देखकर उसने रामेश्वर को नमस्कार किया और फिर अपने काम में जुट गया था।

फुलवा रामेश्वर को अब अपने कमरे में ले आई। उस बड़े कमरे में दो पंखे लगे थे। कूलर था। दो पलंग पड़े थे। कूलर ऑन करके वह रामेश्वर से बोली, “मैं तो कभी-कभार ही चलाती हूँ, इसे। शरीर चिपचिपा हो जाता है।” कूलर बन्द कर दिया था फुलवा ने।

फुलवा की बात सुनकर रामेश्वर क्रोध से उबल पड़ा। इसका मुँह नोच लें। कैसे चोंचले चुभला रही है, फुलवा की बच्ची। खेत में तो खूड़ों में लेटकर नींद निकाल लेती थी, आज कूलर से शरीर चिपचिपाता है। फुलवा ने जब रामेश्वर को ठेला तो वह चौंक पड़ा। वह उसे मेहमानों वाले कमरे में ले गई। कमरे की भव्यता देखकर रामेश्वर का रोम-रोम सुलग उठा।

वह कमरा क्या था, बड़ा-सा एक हॉल था। उसमें दो डबल बेड बिछे थे। उन पर मोहक बिस्तर लगे थे। ऐसे मोहक कि अँगुली लगे मैले हो जाएँ। एक तरफ कलर टी.वी. रखा था। स्टडी टेबल थी। दो-तीन कुर्सियाँ पड़ी थीं। अन्दर ही बाथरूम था। फुलवा बोली, “रामेश्वर जी, रात को तुम यहीं सोओगे। यह कलर टी.वी. है। तुम्हें भाए, चला लेना।”

फुलवा की कोठी में अनगिनत चीजें थीं, जो कीमती भी थीं और अनूठी भी। वह उन सभी चीजों को आज ही नहीं बताएगी रामेश्वर को। वह एक-दो दिन यहाँ रोकेगी, उसे। शहर भी दिखाकर लाएगी, गाड़ी में बिठाकर। वह छत की सीढ़ियों के पास आ गई थी। उसने रामेश्वर से कहा, “रामेश्वर जी, आओ छत पर चलते हैं।”

वह डग-डग सीढ़ियाँ चढ़ती छत पर पहुँच गई थी। फुलवा भूल गई थी, उसका बूढ़ा शरीर है और ज्यादा चलने-फिरने से उसकी पिंडलियाँ दर्द करने लगती हैं। चार सौ वर्ग गज की कोठी पर छत थी। रामेश्वर की आँखें मिचमिचा गईं। यह तो छत क्या मैदान है। उसकी हवेली का जितना आँगन, फुलवा के घर की उतनी छत। रामेश्वर ने माथा पीटा समय-समय की बात है। बरसात के दिनों में एक दिन झंझा आ गया था। फुलवा की छान उड़-बिखर गई थी। तब उसने ही पचास पूले गिनकर उसे दिये थे कि छान सँवरवा लेगी।

फुलवा रामेश्वर को साथ लेकर अब ड्राइंग रूम में आ गई थी। उसे ड्राइंग रूम कहना नहीं आता है। वह उसे ‘बैठक’ ही कहती है, जैसे गाँव में कहते हैं। गाँव में मेहमानों और आए-गए के लिए होती है, बैठक। ड्राइंग रूम में सोफा सेट पड़ा था। बीच में ग्रेनाइट की सेंटर टेबल रखी थी। स्टूल पर फोन रखा था।

दीवारों पर लकड़ी की जीवन्त कलाकृतियाँ टंगी थीं। तीनों ओर की दीवारों में तीन अलमारियाँ थीं, उन पर काँच के फ्रेम जुड़े थे और उनमें भाँति-भाँति की आकर्षक मूर्तियाँ रखी थीं। आमने-सामने पेंटिंग के बोर्ड लगे थे। फर्श पर कीमती मखमली कालीन बिछा था। फुलवा बोली, “रामेश्वर जी, यह अपनी बैठक है।” उसने सोफा की ओर संकेत करके उससे कहा, “बैठिए, रामेश्वर जी।”

रामेश्वर जब सोफे पर बैठा तो छह इंच नीचे धँस गया था।

दुखों से झुलसी फुलवा के बदन पर फफोले पड़ गए थे। आज वह इतनी बड़ी कोठी में सुखों में भीगी बैठी थी। उसे अतीत स्मरण हो आया था। फुलवा के कच्चे घर की छान पर फूस नहीं होती थी। सूरज सारे दिन उसके घर में रहता था। बरसात बाहर भी होती थी और घर में भी होती थी। पानी निकालते उसके हाथ टूटने लगते थे। बेदर्द जाड़ा दिन-रात घर में घुसा रहता था। फुलवा ने चश्मा सरका कर ड्राइंग रूम को निहारा। आत्मविभोर उसकी आँखों में उतर आया था। उसने उँगलियों से

आँखें पोंछकर रामेश्वर से पूछा, “रामेश्वर जी, कितने बच्चे हैं तुम्हारे?” रामेश्वर ने बताया, “तीन लड़कियाँ और दो लड़के हैं। अब तो बड़े लड़के को भी लड़का हो गया है, फुलवा।”

फुलवा सोचने लगी, दो-एक दिन में जब रामेश्वर जी गाँव जाएँगे तो वह उसके बैग में खिलौने रखवा देगी। ऐसे खिलौने पड़े हैं, जो चाभी भरते ही दौड़ते हैं, बोलते हैं। गाँव दौड़ेगा देखने, फुलवा ने भेजे हैं, ऐसे भागते, दौड़ते, बतियाते खिलौने। बच्चों की एक बग्घी भी पड़ी है, अटाले में। उसे भी वह रामेश्वर को दे देगी। पोता खेल लेगा।

सोफे पर बैठा रामेश्वर बार-बार उकस रहा था मानो उसके नीचे कुछ सुलग रहा हो। उसने सूखा-सा मुँह चुभलाया और जेब से बीड़ी-माचिस निकाल लिये थे। बीड़ी जलाकर उसने तीली कालीन पर पटक दी और उसके ऊपर अपनी जूती रख दी थी। उसने बीड़ी पीकर टोंटा वहीं पटक दिया। उसे मालूम था, फुंकी हुई बीड़ी, सिगरेट, तीली, टेबल पर रखी ऐश ट्रे में डालते हैं। लेकिन उसने ईर्ष्यावश ऐसा किया था। फुलवा चौंकी, “रामेश्वर जी, बीड़ी सुलग रही है। कालीन जल गई हो तो कभी।”

रामेश्वर ने गर्दन हिलाई, “नहीं फुलवा भाभी, जूती से रगड़ दिया है, मैंने उसे।”

फुलवा उठी। उसने टोटा उठाकर ऐश-टे में पटक दिया था। बोली, “अच्छा नहीं लगता है।”

फुलवा ने आवाज लगाई, “कुँवर।”

पच्चीस-छब्बीस साल की एक महिला वहाँ आकर खड़ी हो गई थी। बदन सुता हुआ था। रंग साँवला था। चेहरे पर चेचक के दाग जरूर थे, लेकिन बहते पानी की तरह साफ था। उसकी लाल साड़ी पर हरी बॉर्डर थीं। वह साड़ी का पल्लू माथे तक सरकाकर फुलवा की ओर देखने लगी थी। फुलवा ने उससे कहा, “कुँवर, दो बढ़िया कॉफी बनाना। बर्फी, नमकीन और गोंद के लड्डू भो संग ले आना।”

कुँवर लौट गई। रामेश्वर ने साफा हटाकर सिर खुजलाया, तो कई दिनों से धुले उसके सिर से रूसी उड़ने लगी थी। उसने पुनः साफा सिर पर रख लिया था। वह गम्भीर होता चला गया था तले तक। फुलवा चालाक निकली। इसने सौ पापड़ बेल लिये, लेकिन राधा मोहन के हाथ से किताब नहीं छूटने दी, वरना उसकी हथेली तले हमारा हल होता आज।

फुलवा ने चोंगा उठाया और नम्बर घुमाकर बोली, “हेलो। कौन? राधा मोहन?”

“हाँ, माँ।”

“बेटे, रामेश्वर जी आए हैं। जल्दी आ जाना घर पर।” फुलवा ने फोन रख दिया था।

रामेश्वर की त्योरियाँ चढ़ गई थीं, “बावली-सी फुलवा में इतना सयानापन आ गया है, फोन भी कर लेती है।”

कुँवर पानी के दो गिलास पहले रख गई। वह कॉफी, बर्फी, नमकीन और गोंद के लड्डू ले आई थी। खड़ी रहकर उसने फुलवा के अन्य किसी आदेश का इन्तजार किया और लौट गई। कुँवर की ओर देखकर रामेश्वर फुलवा से मुखातिब हुआ, “बहू है, तेरी?”

फुलवा ने बताया, “नहीं रामेश्वर जी, बहू नहीं है। नौकरानी है, अपनी। कुँवर नाम है, उसका। हमने तो आज तक बेचारी से पूछा नहीं, किस जात की है। खुद ही कहती है, राजपूत हूँ। गाँव में छत्तीस फाँक हैं। शहर में दो ही जात होती हैं, अमीर और गरीब। एक दिन कुँवर आँखों में आँसू भरे गेट के सामने खड़ी सुबक रही थी। जब मैं वहाँ गई, तो वह मेरे पाँवों में गिर पड़ी। सिसकियाँ और सुबकियाँ रुक नहीं पा रही थीं, उसकी। बोली, “अम्मा जी, दुखिया हूँ। भीख नहीं माँगूँगी। नौकरानी रख लो, मुझे।”

फुलवा ने आँखों से चश्मा उतारकर हाथ में ले लिया। कहने लगी, “रामेश्वर जी, दया आ गई मुझे और मैंने उसे रख लिया। पाँच-छह साल का एक लड़का भी है उसके साथ। आज उसका जी ठीक नहीं है। अन्दर सो रहा होगा।”

फुलवा ने विषाद भरे अपने कंठ को खखारकर कहा, “आदमी कितने बेदर्द होते हैं, रामेश्वर जी। कुँवर अनपढ़ है। उसका पढ़ा-लिखा आदमी अफसर बना कि कुँवर उसके मन से उतर गई। उसने पढ़ी-लिखी किसी लड़की से शादी कर ली है। बेचारी कुँवर, न कोर्ट जानती है, न कचहरी जानती है।”

फुलवा ने आँखों पर चश्मा चढ़ा लिया और एक आह ली, “औरत का बिसवास। कुँवर रोज माँग भरती है और रोज रोती है। अब तो कुँवर मेरी बेटी-सी है, रामेश्वर जी।”

रामेश्वर शर्म और ग्लानि से नीचे धँसता चला गया था-इतनी बड़ी जात की औरत, फुलवा जैसी छोटी जात के घर नौकरानी। और वह भी उस फुलवा के घर जो खुद थेंगली जैसी बेस्वाद ज़िन्दगी जीती थी। दूसरे ही क्षण उसने अपनी छाती पर रखा पत्थर खुद सरका दिया-आड़े वक्त आदमी असहाय हो जाता है। एक समय राजा हरिशचन्द्र ने भी नीची जात के घर पर पानी भरा था।

कॉफी, नमकीन, बर्फी और लड्डू रामेश्वर के सामने रखे थे। उसका मन बार-बार ललचा रहा था। खा-पीकर चट कर जा, क्या धरा है, जात-पाँत जैसी छोटी बात में…। उसका धर्म आड़े आ गया था।

उसने दो-तीन लम्बी-लम्बी साँसें लीं और पूछा, “फुलवा, पंडित माताप्रसाद जी की कोठी भी तो इसी कॉलोनी में है, ना?”

“हाँ, उनका मकान यहाँ से दो-तीन गली आगे है। तुम कुछ खा-पी लो।” रामेश्वर ने बहाना बनाया, “क्या बताऊँ भाभी, मैंने दाढ़ निकलवाई थी, कल। दर्द से दोहरा हुआ जा रहा हूँ।” “मैंने भैया को फोन कर दिया है। वे आते ही होंगे। उनसे मिल लेना। वे बड़े अफसर हैं। कोई काम हो तो बता देना बेझिझक।”

रामेश्वर के गाल पर जैसे तमाचा पड़ा। उनकी चिरौरी करते फुलवा का मुँह बिसुरा रहता था। आज वह उसी फुलवा के बेटे से अपने बेटे की नौकरी की सिफारिश करेगा। अरे, चुल्लू-भर पानी में डूबकर मर जाएगा, रामेश्वर सिंह।

सोफे पर बैठा रामेश्वर जब बार-बार उकसने लगा, तो फुलवा ने आवाज लगाई, “कुँवर।”

कुँवर दौड़ी-दौड़ी आई, “हुक्म अम्मा जी।” वह खड़ी होकर फुलवा की ओर देखने लगी थी।

“बहूरानी को भेजना, रामेश्वर जी से मिल लेगी।”

संती गोरी चिट्टी थी। बदन छरहरा था। गुलाबी रंग का सूट उसकी देह पर खूब फब रहा था। उसके हाथों में कड़े, कानों में सोने के टॉप्स, गले में सोने का मंगलसूत्र था। उसके बालों में सोने की क्लिपें खुसी थीं। छत्तीस-सैंतीस की उम्र में भी पच्चीस की लगती थी, वह।

अपने गाँव के जमींदार।” फुलवा ने उससे रामेश्वर का परिचय कराया, “बहुरानी, ये रामेश्वर जी हैं।” संती ने रामेश्वर को नमस्कार किया। थोडी देर वह खड़ी रही और फिर लौट गई। रामेश्वर दाँत घिसने लगा था। उसकी आँखें चढ़कर सुर्ख हो गई थीं। वह तो सोचकर बैठा था, फुलवा की बहू गज-भर घूंघट में आकर उसके पाँव छुएगी। आई है, जैसे गाँव की छोरी हो। न आदर, न मान। अगर ऐसी बेहूदगी गाँव में की होती, उसका झोंटा पकड़कर खींचता और…।

फुलवा ने रामेश्वर के मन की बात पकड़ ली, “रामेश्वर जी, पढ़ी-लिखी मेम साहब हैं। नहीं आती, इसे घूँघट गाती।” वह हल्की-सी हँसी, “भागों वाली भी है। ब्याह हुआ और राधा मोहन के साथ शहर आ गई। तुम्हारी हवेली तो इसने देखी तक नहीं है।”

रामेश्वर उठ खड़ा हुआ था, “फुलवा, पंडित जी के प्लाट नम्बर बता दें। मैं चला जाता हूँ।”

फुलवा उठी और अलमारी में से फोल्डिंग छाता निकाल लिया। छाता बगल में दबाकर वह कहने लगी, “नहीं रामेश्वर जी, अच्छा नहीं लगता है, मैं छोड़कर आऊँगी, तुम्हें।”

गेट से बाहर निकलकर वे दस-पन्द्रह कदम ही चले होंगे कि लाल बत्ती की एक कार कोठी के सामने आकर रुक गई थी। फुलवा ने पीछे मुड़कर देखा। राधा मोहन कार से उतर रहे थे। उसके पाँव वहीं ठिठक गए और रामेश्वर से कहने लगी, “वापस चलो। भैया आ गए हैं, उनसे मिल लो पहले।”

रामेश्वर ने आगे की ओर कदम भरते हुए कहा, “फुलवा, बादल बोल रहे हैं, बरसात आएगी। जल्दी कर तू।”

ऐसा नहीं था, वह आज भी रामेश्वर से डरती थी या उसके अहसानों से दबो हुई थी। उसमें आतिथ्य भाव था और नेकी को भगवान मानती थी। फिर अपनी शोहरत दिखाने का बहुत ही सुनहरा अवसर हाथ लगा था, उसको। फुलवा ने मन में उठे क्रोध को वहीं दबा दिया था।

पं. माताप्रसाद का मकान आ गया था। कोलतार के दो ड्राम सीधे करके गेट बनाया हुआ था। गेट! महज आड़ थी। गेट के पास ही लैटरिन-बाथरूम खड़े थे। लैटरिन के दरवाजे पर बोरी का पल्ला झूल रहा था। बाथरूम में फर्श नहीं था। दो कमरे थे। सटा हुआ एक गैरेज था। गैलरी में रसोई थी। रसोई में थोड़े से बर्तन थे। पं. माताप्रसाद की पोती बत्ती के स्टोव पर वहाँ रोटियाँ सेंक रही थी।

 

फुलवा की कोठी देखकर जहाँ रामेश्वर की आँखें कुत्सा और द्वेष से सिकुड़ी हुई थीं। पंडित जी का मकान देखकर उसकी आँखें हसरत और विस्मय से फैल गई थीं। यह विस्मय, खेद और खिदमत से सना था। पं. माताप्रसाद की विधवा परती और फुलवा के बीच गाँव में चाहे कितनी दूरियाँ थीं। एक-दूसरे से कपड़े बचाकर चलती थीं। लेकिन शहर आकर वे दोनों एक दाँत काटी रोटी खाने लग गई थीं।

परती के मकान पर भी फुलवा अपने घर जैसा अधिकार समझती थी। पंडिताइन का पूरा मकान दिखाकर वह रामेश्वर को एक कमरे में ले आई थी। कमरे में दो चारपाइयाँ, दो कुर्सियाँ और एक स्टूल पड़े थे। फुलवा चारपाई पर बैठ गई और कुर्सी की ओर हाथ करके बोली, “बैठिए रामेश्वर जी।”

परती, उसकी बहू और पोती ‘बाहर’ गई थीं। वे लौट आई थीं। मर्द की खाँस सुनकर पंडिताइन यहाँ आ गई। उसकी बहू और पोती दूसरे कमरे में चली गई थीं। रामेश्वर की आँखें पंडिताइन को देखती रह गई थीं। उसकी कमर कमान की तरह मुड़ गई थी। उसके भूरे, घुँघराले बाल सफेद और मटमैले से हो गए थे। उसकी पलकों पर भी सफेदी थी। सफेद साड़ी और सफेद ब्लाउज में लिपटी सफेदी का पुतला-सी लग रही थी, वह। रामेश्वर उठा और उसके पाँव में ढोक दी। पंडिताइन नहीं पहचान पाई, वह कौन है। रामेश्वर खड़ा हो गया और हाथ जोड़ दिये, “दादी मैं हूँ रामेश्वर। आपका पोता।”

“हूँ, हैं!” उसने चश्मे के भीतर आँखें झपकाई। “नहीं पहचाना। जमींदार बलकार सिंह का बेटा, रामेश्वर।”

पंडिताइन ने एक कष्टमय आह भरी, “ओह, रामेश्वर!”

वह दस-बारह साल बाद उससे मिल रही थी। रामेश्वर को देखकर उसका माथा ठिनक गया। फुलवा को पाकर वह गद्गद हो गई। सप्ताह बाद मिली है, फुलवा उससे।

फुलवा पाँयती सरकी। पंडिताइन ने उसका हाथ पकड़कर सिरहाने बैठा दिया। वह उसे फुलवा नहीं, फुलवन्ती कहती थी। ताकीद की, “देख फुलवन्ती, तूने ही एक दिन कहा था न, कि तू मुझसे एक साल बड़ी है। जब बड़ी है, तो पाँयती बैठकर मुझे पाप में गलाएगी?”

रामेश्वर ने साफा उतारकर सिर खुजलाया और फिर रख लिया। रामेश्वर, जैसे भंवर में फँसा कोई तिनका। पंडिताइन पाँयताने। फुलवा सिरहाने। देहरी की ईंट चौबारे। अनुरक्ति और विरक्ति के बीच ईर्ष्या और द्वेष ऐसी जलन पैदा कर रहे थे, जैसे अधपके फोड़े में पीब और लहू।

परती की पोती तीन कप चाय ले आई थी। उसने स्टूल पर ट्रे रखी और लौट गई। भूख से बेहाल रामेश्वर ने कप उठा लिया और घूँट-घूंट पीने लगा। फुलवा ने कप उठाया और पंडिताइन के कप में उड़ेलने लगी, “दिन-भर में दस चाय हो जाती हैं, परती।” और वे दोनों एक-दूसरे को ठेल-ठेलकर बतियाती रहीं। रामेश्वर चिबुक पर हाथ रखकर उनकी बतकही सुनता रहा था, जैसे दो बच्चों का खेल देख रहा हो।

फुलवा ने कप रख दिया और उठते हुए अपना छाता सँभाला। रामेश्वर से बोली, “रामेश्वर जी, सुबह कोठी पर आ जाना। इतने तुम्हारी दाढ़ का दर्द भी ठीक हो जाएगा। देशी घी का हलवा बनवाऊँगी, कुँवर से।”

पंडिताइन ने दो-तीन बार खाट थपककर फुलवा की ओर संकेत कर दिया था।

फुलवा पुलककर बोली, “परती पोती को भेज दे मेरे साथ, छोड़ आएगी मुझे।” रामेश्वर ने अपनी कुर्सी पंडिताइन के नजदीक सरका ली। वह आस्था और विश्वास भरे स्वर में बोला, “दादी, गाँव में क्या घरा है, मौज में हो यहाँ।”

“हाँ, ठीक हूँ।”

“दादी, दादा नजर नहीं आ रहे हैं?”

“दो साल हो गए उनका स्वर्गवास हुए।” पंडिताइन की आँखें भर आई थीं। वे दोनों कुछ देर तक नीचे देखते रहे, मानो शोक में डूब गए हों।

पंडिताइन ने आँखें पोंछकर उससे पूछा, “किसी काम से आया था, रामेश्वर तू?”

रामेश्वर ने पंडिताइन के पाँव दबाने के लिए हाथ बढ़ाए, तो उसने अपने पाँव सिकोड़ लिये। वह खिसियाकर कहने लगा, “दादी, आपका पोता है न दीपसिंह, उसने पाँच-छह साल पहले मैट्रिक पास कर ली थी। अब मारा-मारा घूम रहा है।”

वह थोड़ा रुका और बोला, “दादी, सौ बीघा जमीन थी मेरे बाप के नाम। हम पाँच भाइयों में बँट गई, बीस-बीस बीघा। जमींदार नहीं रहा, अब। दीपसिंह को कहीं नौकरी पर चिपकवा दो।”

पंडिताइन ने चश्मा उतारकर खाट पर रख दिया और चुधियाई आँखें मिचमिचाने लगीं, “फुलवन्ती की कोठी पर गया था, तू?”

रामेश्वर ने सूखा थूक निगला, “दादी, फुलवा सोने की हो जाए, रहेगी उसी जात की। मैंने तो उसके घर का पानी तक नहीं पिया। धर्म भ्रष्ट होने से मर जाना अच्छा समझता है, रामेश्वर सिंह।”

पंडिताइन ने उसे डपटा, “तू तो कुएँ का मेढक ही रहा रामेसरिया। अब तो पद और पैसे का जमाना है, जात-पाँत का नहीं। फुलवन्ती का राधा मोहन कोई छोटा-मोटा अफसर नहीं है। एस.पी. है, एस.पी.। एक बात बताऊँ तुझे। जाकर मेम साब के पाँव पकड़ ले और तब तक मत छोड़, वह हाँ न कह दें।”

पंडिताइन ने ठंडी साँस ली, “चरण छुऊँ बहूरानी के। मेरे बेटे को तो उसी ने दूसरी जिन्दगी दी है।”

रामेश्वर के शरीर पर जैसे किसी ने तेजाब उड़ेल दिया था। जिजिस औरत को वह द्रोपदी-सा बेआबरू करने की सोच रहा था, उसी के पाँव पकड़ ले। पंडिताइन ने बात कह दी, अगर दूसरा होता, कंठ पर अँगूठा रख देता।

पंडिताइन की पोती थाली ले आई थी। पंडिताइन की बात से रामेश्वर का जी ऐसा उतरा हुआ था कि आलू की सूखी सब्जी और चुपड़े फुल्के भी भरपेट नहीं खा सका था।

पंडिताइन चिन्ता में थी। लड़का बाहर टूर पर गया है। दो कमरे हैं। उनके बीच में दीवार है, लेकिन गेट है। गेट पर पर्दा है। पर्दा तो शर्म होता है, आड़ नहीं होता। बहू है, जवान लड़कियाँ हैं। जमींदार और जानवर का क्या भरोसा, उसकी नीयत कब खराब हो जाए। उसने चश्मा पहना और उठते हुए कहा, “रामेश्वर, हार-थक रहा होगा, तू। बिस्तर लगा दिये हैं तेरे। आ, मेरे साथ।”

चारपाई पर पड़े बिस्तर देखकर रामेश्वर के तन-मन में आग लग गई थी। ये तो वही बिस्तर थे जो फुलवा के एक कमरे में पड़े थे। रामेश्वर ने विवशता में डूबी साँस मारी, दूसरी जात की गाय, भैंस, बकरी जब बामन के घर आ जाती हैं तो बामनी बन जाती हैं। रात निकाल, रामेश्वर।

एक कोने में बकरी खड़ी थी। गेट के पास कुत्ता बँधा था। पंडिताइन कुत्ते की चेन को एक गाँठ मारकर कहने लगी, “रामेश्वर, कुत्ता बीमार है, खाँसेगा जरूर। भीतर की साँकल लगाकर चुपचाप सो जा, तू तो।”

बकरी के मिंगन और पेशाब से समूचा गैरेज बास मार रहा था। कुत्ते की खों-खों अलग। रामेश्वर की नींद कोसों दूर भाग गई थी। वह आँखें मींचे रहता, करवट बदलता, लेकिन नींद नहीं आती थी।

एकाएक कुत्ते की खाँसी बढ़ गई थी और यह उल्टी करने लगा था। बदबू से रामेश्वर के नकसोर सँधने लगे। मितली आ गई उसे। वह चारपाई पर उठ बैठा था। उसने बत्ती ऑन करके घड़ी देखी। पौने बारह बजे थे। अपना बैग लेकर वह बाहर निकल आया था।

आकाश में बिजली चमक रही थी और बूँदें गिरने लगी थीं। उसके कदम अनायास ही फुलवा की कोठी की ओर बढ़ने लगे थे।

(हंस, मई 1997)

 

फुलवा कहानी पर प्रश्नोत्तर

प्रश्न – फुलवा कहानी के कहानीकार का नाम बताएं।

उत्तर – फुलवा कहानी के कहानीकार का नाम रत्नकुमार सांभरिया है।

प्रश्न – फुलवा कौन थी?

उत्तर – फुलवा गांव की दलित महिला थी जिसने अपने पति की मृत्यु और जातिगत शोषण झेलने के बाद भी अपने स्वाभिमान को बनाए रखा। उसने अपनी मेहनत से अपने बेटे को पढ़ा- लिखा कर एक दिन एसपी बनाया।

प्रश्न – फुलवा के आलीशान घर को देखकर किसे जलन हुई?

उत्तर – जमींदार बलकार सिंह के बेटे रामेश्वर को फुलवा की बदली हुई जिंदगी को देखकर बहुत जलन महसूस हुई।

प्रश्न – फुलवा की सहेली कौन थी?

उत्तर – पंडिताइन।

प्रश्न – रामेश्वर क्यों हैरान रह जाता है?

उत्तर – रामेश्वर फुलवा और पंडिताइन की दोस्ती को देखकर हैरान रह जाता है जहां फुलवा सिरहाने और पंडिताइन पैताने बैठी है और दोनों हमजोलियों की तरह एक दूसरे से हंसी ठट्ठा करते हुए चाय पी रही है।

प्रश्न – रामेश्वर शहर क्यों आया था?

उत्तर – वह अपने बेटे दीप सिंह की नौकरी की सिफारिश पंडिताइन से करने आया था लेकिन पंडिताइन के कहने पर यह सिफारिश उसे फुलवा से लगानी पड़ी।

प्रश्न- फुलवा कहानी में पंडित का नाम क्या था?

उत्तर पंडित माताप्रसाद।

प्रश्न- पंडित माताप्रसाद की पत्नी और फुलवा की सहेली का नाम क्या था?

उत्तर-परती।

प्रश्न फुलवा के बेटे का नाम क्या था?

उत्तर- राधा मोहन।

प्रश्न – फुलवा की बहु और राधा मोहन की पत्नी का नाम क्या था?

उत्तर – संती।

प्रश्न – फुलवा कहानी का मूल संदेश अथवा संवेदना स्पष्ट करें।

उत्तर -फुलवा कहानी पढ़ कर पता चलता है कि जिन लोगों ने कभी जातिगत शोषण किया हो, वे कभी शोषितों को अच्छा जीवन जीते देखकर खुश नहीं हो पाते।वे अतीत की तरह उन्हें गिड़गिड़ाते देखना चाहते हैं लेकिन अब समय बदल गया है। आजादी के बाद न सिर्फ उन्हें दलितों-पिछड़ों के उन्नत जीवन को बर्दाश्त करना पड़ता है बल्कि अपने बच्चों की नौकरियों के लिए भी उनके पास सिफारिश करने के लिए जाना पड़ता है।

कहानी जमींदारों-सामंतों के भेदभावपूर्ण रवैये और अपने ही जैसे लोगों को अपने से हेय समझने की दृष्टि को उजागर करती है और यह बताने में सफल होती है कि शोषकों को एक दिन भले पछतावा न हो लेकिन अपने शोषण से बाहर आने पर विवश होना पड़ता है। दूसरी तरफ अवसर मिलने पर वंचित भी अपनी प्रतिभा दिखा कर आश्चर्य में डुबो सकते हैं।

 

© डॉ. संजू सदानीरा

आप फुलवा कहानी का भावार्थ यहां पढ़ सकते हैं…

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Dr. Sanju Sadaneera

डॉ. संजू सदानीरा प्रतिष्ठित मोहता पीजी कॉलेज में प्रोफेसर और हिंदी साहित्य विभाग की प्रमुख हैं। इन्हें अकादमिक क्षेत्र में 22 वर्षों से अधिक का समर्पित कार्यानुभव है। हिन्दी, दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान विषयों में परास्नातक डॉ. संजू सदानीरा ने हिंदी साहित्य में नेट, जेआरएफ सहित अमृता प्रीतम और कृष्णा सोबती के उपन्यासों पर शोध कार्य किया है। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के स्नातक के पाठ्यक्रम के लिए इनकी किताबें विशेष उपयोगी हैं। ये "Dr. Sanju Sadaneera" यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी शिक्षा के प्रसार एवं सकारात्मक सामाजिक बदलाव हेतु सक्रिय हैं।

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