अज्ञेय की कहानी शरणदाता पर प्रश्नोत्तरी

 

सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय


जन्म : 1911 ई.


मृत्यु: 1987 ई.


हिन्दी साहित्य के इतिहास में अपनी तरह की विरल एवं अद्वितीय प्रतिभा अज्ञेय ने अपने साहित्यिक जीवन में जिस विधा में लिखा, यह ऐतिहासिक, उल्लेखनीय और सार्थक ही लिखा। वे कवि, रचनाकार, यात्रा लेखक, आलोचक, पत्रकार, अनुवादक, नाटककार थे। उनकी लेखनी का स्पर्श पाकर कई विधाएँ अपने इतिहास में सोच और दृष्टि के उन्मेष से भर उठीं।


वे हिन्दी की लीक विद्रोही आधुनिकता और सर्जनात्मकता के संयोग का अनुपम उदाहरण हैं। उन्हें प्रयोगवादी काव्य का उन्नायक भी कहा जाता है। अज्ञेय एक ऐसे रचनाकार हैं जो परम्परा की रचनात्मक चुनौतियाँ स्वीकारते हुए उन पर अपना नया भाष्य रचते हैं। आधुनिक हिन्दी में नई भाषा, नये बिम्ब, प्रतीक और नवीन शिल्प उनकी अप्रतिम देन है।


शरणदाता आजादी के साथ देश विभाजन की त्रासदी से जुड़ी कथा रचना है। इसमें कहानीकार आपसी सद्भाव व भाईचारे का सन्देश दे रहा है। यह कहानी एक साथ इंसानियत एवं हैवानियत को दर्शाती है। मानवतावादी आचरण इस कहानी का सन्देश है।


शरणदाता


‘यह कभी हो ही नहीं सकता, देविन्दरलालजी ! ” रफीकुद्दीन वकील की वाणी में आग्रह था, चेहरे पर आग्रह के साथ चिन्ता और कुछ व्यथा का भाव। उन्होंने फिर दुहराया, “यह कभी नहीं हो सकता देविन्दरलालजी!’ देविन्दरलालजी ने उनके इस आग्रह को जैसे कबूलते हुए, पर अपनी लाचारी जताते हुए कहा, “सब लोग चले गए। आपसे मुझे कोई डर नहीं, बल्कि आपका तो सहारा है, लेकिन आप जानते हैं, जब एक बार लोगों को डर जकड़ लेता है, और भगदड़ पड़ जाती है, तब फिजा ही कुछ और हो जाती है, हर कोई हर किसी को शुबहे की नज़र से देखता है, और खामखाह दुश्मन हो जाता है। आप तो मुहल्ले के सरवरा हैं, पर बाहर से आने-जानेवालों का क्या ठिकाणा है? आप तो देख ही रहे हैं, कैसी-कैसी वारदातें हो रही हैं।


रफीकुद्दीन ने बात काटते हुए कहा, “नहीं साहब, हमारी नाक कट जाएगी! कोई बात है भला कि आप घर बार छोड़कर अपने ही शहर में पनाहगर्जी हो जाएँ? हम तो आपको जाने न देंगे बल्कि जबरदस्ती रोक लेंगे। मैं तो इसे मेजारिटी फ़र्ज मानता हूँ कि वह माइनारिटी की हिफ़ाज़त करे और उन्हें घर छोड़-छोड़कर भागने न दे। हम पड़ोसी की हिफाजत न कर सके तो मुल्क की हिफाजत क्या खाक करेंगे! और मुझे पूरा यकीन है कि बाहर की तो खैर बात ही क्या, पंजाब में ही कोई हिन्दू भी, जहाँ उनकी बहुतायत है, ऐसा ही सोच और कर रहे होंगे। आप न जाइए, न जाइए। आपकी हिफ़ाजत की ज़िम्मेदारी मेरे सिर, बस!”


 देविन्दरलाल के पड़ोस के हिन्दू परिवार धीरे-धीरे एक-एक करके खिसक गए थे। होता यह कि दोपहर शाम जब कभी साक्षात् होता, देविन्दरलाल पूछते, “कहो लालजी (क बाऊजी या पंडज्जी) क्या सलाह बगायी है आपने?” और वे उत्तर देते, “जी, सलाह क्या बणायी है, यहीं रह रहे हैं, देखी जाएगी…”


 पर शाम को या अगले दिन सवेरे देविन्दरलाल देखते कि वे चुपचाप जरूरी सामान लेकर कहीं खिसक गए हैं, कोई लाहौर से बाहर, कोई लाहौर में ही हिन्दुओं के मुहल्ले में और अन्त में यह परिस्थिति आ गई थी कि अब उनके दाहिनी ओर चार मकान खाली छोड़कर एक मुसलमान गूजर का अहाता पड़ता था, जिसमें एक ओर गूजर की भैंसे और दूसरी ओर कई छोटे-मोटे मुसलमान कारीगर रहते थे। बायीं ओर भी देविन्दर और रफीकुद्दीन के मकानों के बीच के मकान खाली थे और रफ़ीकुद्दीन के मकान के बाद मोजंग का अड्डा पड़ता था, जिसके बाद तो विशुद्ध मुसलमान बस्ती थी। देविन्दरलाल और रफीकुद्दीन में पुरानी दोस्ती थी, और एक-एक आदमी के जाने पर उनमें चर्चा होती थी। अन्त में जब एक दिन देविन्दरलाल ने जताया कि वह भी चले जाने की बात पर विचार कर रहे हैं तब रफीकुद्दीन को धक्का लगा और उन्होंने व्यथित स्वर में कहा, “देविन्दरलालजी, आप भी! “


रफीकुद्दीन का आश्वासन पाकर देविन्दरलाल रह गए। तब यह तय हुआ कि अगर खुदा न करे, कोई खतरे की बात हुई भी, तो रफ़ीकुद्दीन उन्हें पहले ही खबर कर देंगे और हिफाजत का इन्तजाम भी कर देंगे― चाहे जैसे हो। देविन्दरलाल की स्त्री तो कुछ दिन पहले की जालंधर मायके गई हुई थी, उसे लिख दिया गया कि अभी न आए, वहीं रहे। रह गए देविन्दर और उनका पहाड़िया नौकर सन्तु ।


किन्तु यह व्यवस्था बहुत दिन नहीं चली। चौथे ही दिन सवेरे उठकर उन्होंने देखा, सन्तू भाग गया है। अपने हाथों चाय बनाकर उन्होंने पी, धोने को बर्तन उठा रहे थे कि रफ़ीकुद्दीन ने आकर खबर दी, सारे शहर में मारकाट हो रही है और थोड़ी देर में मोजंग में भी हत्यारों के गिरोह बंध-बंधकर निकलेंगे। कहीं जाने का समय नहीं है, देविन्दरलाल अपना जरूरी और कीमती सामान ले लें और उनके साथ उनके घर चले चलें। यह बला टल जाए तो फिर लौट आएँगे-


‘कीमती’ सामान कुछ था नहीं। गहना छन्ना सब स्त्री के साथ जालंधर चला गया था, रुपया थोड़ा-बहुत बैंक में था; और ज्यादा फैलाव कुछ उन्होंने किया नहीं था। यों गृहस्थ को अपनी गिरस्ती की हर चीज कीमती मालूम होती है— देविन्दर लाल घंटे भर बाद ट्रंक-बिस्तर के साथ रफीकुद्दीन के यहाँ जा पहुँचे।


तीसरे पहर उन्होंने देखा, हुल्लड़ मोजंग में आ पहुंचा है। शाम होते-होते उनकी निर्निमेष आँखों के सामने ही उनके घर का ताला तोड़ा गया और जो कुछ था, लुट गया। रात को जहाँ वहाँ लपटें उठने लगीं, और भादों की उमस धुआँ खाकर और भी गलाघोंटू हो गई—


रफ़ीकुद्दीन भी आँखों में परायज लिए चुपचाप देखते रहे। केवल एक बार उन्होंने कहा, “यह दिन भी था देखने को—और आजादी के नाम पर ! या अल्लाह! लेकिन ख़ुदा जिसे घर से निकालता है, उसे फिर गली में भी पनाह नहीं देता।


देविन्दरलाल घर से बाहर तो निकल ही न सकते, रफ़ीकुद्दीन ही आते-जाते। काम करने का तो वातावरण ही नहीं था, वे घूम-घाम आते, बाज़ार कर आते। और शहर की खबर ले आते, देविन्दर को सुनाते और फिर दोनों बहुत देर तक देश के भविष्य पर आलोचना किया करते। देविन्दर ने पहले तो लक्ष्य नहीं किया लेकिन बाद में पहचानने लगा कि रफीकुद्दीन की बातों में कुछ चिन्ता का, और कुछ एक और पीड़ा का भी स्वर है जिसे वह नाम नहीं दे सकता-थकान? उदासी? विरक्ति? पराजय? न जाने!


शहर तो वीरान हो गया था। जहाँ-तहाँ लाशें सड़ने लगीं; घर लुट चुके थे और अब जल रहे थे। शहर के एक नामी डॉक्टर के पास कुछ प्रतिष्ठित लोग गए थे यह प्रार्थना लेकर कि वे मुहल्लों में जावें; उनकी सब लोग इज्जत करते हैं, इसलिए उनके समझाने का असर होगा और मरीज भी वे देख सकेंगे। वे दो मुसलमान नेताओं के साथ निकले। दो-तीन मुहल्ले घूमकर मुसलमानों की बस्ती में एक मरीज को देखने के लिए स्टेथस्कोप निकालकर मरीज पर झुके थे कि मरीज के ही एक रिश्तेदार ने पीठ में छुरा भोंक दिया…


हिन्दू मुहल्ले में रेलवे के एक कर्मचारी ने बहुत-से निराश्रितों को अपने घर में जगह दी थी जिनके घर-बार सब लुट चुके थे। पुलिस को उसने खबर दी थी कि वे निराश्रित उसके घर टिके हैं, हो सके तो उनके घरों और माल की हिफ़ाजत की जाए। पुलिस ने आकर शरणागतों के साथ उसे और उसके घर की स्त्रियों को गिरफ्तार कर लिया और ले गई! पीछे घर पर हमला हुआ, लूट हुई और घर में आग लगा दी गई। तीन दिन बाद उसे और उसके परिवार को थाने से छोड़ा गया और हिफ़ाजत के लिए हथियारबन्द पुलिस के दो सिपाही साथ किये गए। थाने से पचास क़दम के फ़ासले पर पुलिसवालों ने अचानक बन्दूक उठाकर उस पर और उसके परिवार पर गोली चलाई। वह और तीन स्त्रियाँ मारी गई। उसकी माँ और स्त्री घायल होकर गिर गई और सड़क पर पड़ी रहीं।


विषाक्त वातावरण, द्वेष और घृणा की चाबुक से तड़फड़ाते हुए हिंसा के घोड़े, विष फैलाने को सम्प्रदायों को अपने संगठन और उसे भड़काने को पुलिस और नौकरशाही! देविन्दरलाल को अचानक लगता कि वह और रफीकुद्दीन ही गलत हैं जो कि बैठे हुए हैं जबकि सब कुछ भड़क रहा है, उफन रहा है, झुलस और जल रहा है-और वे लक्ष्य करते कि वह अस्पष्ट स्वर, जो वे रफ़ीकुद्दीन की बातों में पाते थे, धीरे-धीरे कुछ स्पष्ट होता जाता है—एक लज्जित-सी रुखाई का स्वर-


हिन्दुस्तान पाकिस्तान की अनुमानित सीमा के पास एक गाँव में कई सौ मुसलमानों ने सिक्खों के गाँव में शरण पायी। अन्त में जब आस-पास के गाँव के और अमृतसर शहर के लोगों के दबाव ने उस गाँव में उनके लिए फिर आसन्न संकट की स्थिति पैदा कर दी, तब गाँव के लोगों ने अपने मेहमानों को अमृतसर स्टेशन पहुँचाने का निश्चय किया जहाँ से वे सुरक्षित मुसलमान इलाके में जा सकें, और दो-ढाई सौ आदमी किरपानें निकालकर उन्हें घेर में लेकर स्टेशन पहुँचा आए- किसी को कोई क्षति नहीं पहुँची।


घटना सुनकर रफ़ीकुद्दीन ने कहा, ” आखिर तो लाचारी होती है, अकेले इनसान को झुकना ही पड़ता है। यहाँ तो पूरा गाँव था, फिर भी उन्हें हारना पड़ा। लेकिन आखिर तक उन्होंने निवाहा, इसकी दाद देनी चाहिए। उन्हें पहुँचा आए-‘ देविन्दरलाल ने हामी भरी। लेकिन सहसा पहला वाक्य उनके स्मृति पटल पर “


उभर आया-“ आखिर तो लाचारी होती है—अकेले इनसान को झुकना ही पड़ता है!”


उन्होंने एक तीखी नजर से रफीकुद्दीन की ओर देखा, पर वे कुछ बोले नहीं। अपराहन में छःसात आदमी रफ़ीकुद्दीन से मिलने आए। राफीकुद्दीन ने उन्हें अपनी बैठक में ले जाकर दरवाजे बन्द कर लिए। डेढ़-दो घंटे तक बातें हुई। सारी बात प्रायः धीरे-धीरे ही हुई, बीच-बीच में कोई स्वर ऊँचा उठ जाता और एक-आध शब्द देविन्दरलाल के कान में पड़ जाता ‘बेवकूफी’, ‘गद्दारी’, ‘इस्लाम’ वाक्यों को पूरा करने की कोशिश उन्होंने आयासपूर्वक नहीं की दो घंटे बाद जब उनको विदा करके रफीकुद्दीन बैठक से निकल कर आए, तब भी उनसे लपककर पूछने की स्वाभाविक प्रेरणा को उन्होंने दबाया। पर जब रफ़ीकुद्दीन उनकी ओर न देखकर खिंचा हुआ चेहरा झुकाये उनकी बगल से निकलकर बिना एक शब्द कहे भीतर जाने लगे तब उनसे न रहा गया और उन्होंने आग्रह के स्वर में पूछा, “क्या बात है, रफ़ीक साहब, खैर तो है?”


रफीकुद्दीन ने मुँह उठाकर एक बार उनकी ओर देखा, बोले नहीं। फिर आँख


काल अब देविन्दरलाल ने कहा, “मैं समझता हूँ कि मेरी वजह से आपको जलील होना पड़ रहा है। और खतरा उठाना पड़ रहा है सो अलग। लेकिन आप मुझे जाने दीजिये। मेरे लिए आप जोखिम में न पड़ें आपने जो कुछ किया है उसके लिए मैं । बहुत शुक्रगुजार हूँ । आपका एहसान — “


रफीकुद्दीन ने दोनों हाथ देविन्दरलाल के कन्धों पर रख दिये। कहा, “देविन्दरलाल जी ! ” उनकी साँस तेज चलने लगी। फिर वह सहसा भीतर चले गए। लेकिन खाने के वक्त देविन्दरलाल ने फिर सवाल उठाया। बोले, “आप खुशी से न जाने देंगे तो मैं चुपचाप खिसक जाऊँगा। आप सच सच बतलाइए, आपसे


उन्होंने कहा क्या?” “धमकियाँ देते रहे और क्या?”


“फिर भी, क्या धमकी आखिर….


“धमकी को भी ‘क्या होती है क्या? उन्हें शिकार चाहिए- हल्ला करने न


मिलेगा तो आग लगा कर लेंगे। “


“ऐसा! तभी तो मैं कहता हूँ, मैं चला मैं इस वक्त अकेला आदमी हूँ, कहीं निकल हो जाऊँगा, आप घर-बार वाले आदमी ये लोग तो सब तबाह कर डालने पर तुले हैं। “


“गुंडे हैं बिलकुल!”


“मैं आज की चला जाऊँगा…” “यह कैसे हो सकता है? आखिर आपको चले जाने से हमीं ने रोका था, हमारी भी तो कुछ जिम्मेदारी है…”


” आपने भला चाहकर ही रोका था उसके आगे कोई जिम्मेदारी नहीं है…. “आप जायेंगे कहाँ…


“देखा जाएगा…” “


“नहीं, यह नामुमकिन बात है।”


किन्तु बहस के बाद तय हुआ कि देविन्दरलाल वहाँ से टल जाएँगे। राफ्रीकुद्दीन और कहीं पड़ोस में उनके एक और मुसलमान दोस्त के यहाँ छिपकर रहने का प्रबन्ध कर देंगे-वहाँ तकलीफ़ तो होगी पर खतरा नहीं होगा, क्योंकि देविन्दरलाल घर में रहेंगे। वहाँ पर रहकर जान की हिफ़ाज़त तो रहेगी, तब तक कुछ और उपाय सोचा जाएगा निकलने का…


देविन्दरलाल शेख अताउल्लाह के अहाते के अन्दर पिछली तरफ पेड़ों के झुरमुट की आड़ में बनी हुई एक गैराज में पहुँच गए। ठीक गैराज में तो नहीं, गैराज की बगल में एक कोठरी थी जिसके सामने दीवारों से घिरा एक छोटा-सा आँगन था। पहले शायद यह ड्राइवर के रहने के काम आती हो। कोठरी में ठीक सामने और गैराज की तरफ के किवाड़ों को छोड़कर खिड़की वगैरह नहीं थी। एक तरफ एक खाट पड़ी थी, आले में एक लोटा फर्श कच्चा, मगर लिपा हुआ गैराज के बाहर लोहे की चादर का मजबूत फाटक था, जिसमें ताला पड़ा था। फाटक के अन्दर ही कच्चे फर्श में एक गढ़ा-सा खुदा हुआ था जिसकी एक ओर चूना मिली मिट्टी का ढेर और एक मिट्टी का लोटा देखकर गढ़े का उपयोग समझते देर न लगी।


देविन्दरलाल का ट्रंक और विस्तर जब कोठरी के कोने में रख दिया गया और बाहर आँगन का फाटक बन्द करके उसमें भी ताला लगा दिया गया, तब थोड़ी देर वे हतबुद्धि खड़े रहे। यह है आजादी! पहले विदेशी सरकार लोगों को कैद करती थी, वे आजादी के लिए लड़ना चाहते थे, अब अपने ही भाई अपनों को तनहाई कैद रहे हैं क्योंकि वे आज़ादी के लिए ही लड़ाई रोकना चाहते हैं! फिर मानव प्राणी का स्वाभाविक वस्तुवाद जागा, और उन्होंने गैराज कोठरी-आँगन का निरीक्षण इस दृष्टि से आरम्भ किया कि क्या-क्या सुविधाएँ वे अपने लिए कर सकते हैं।


गैराज—ठीक है; थोड़ी-सी दुर्गन्ध होगी, ज्यादा नहीं; बीच का किवाड़ बन्द, कामचलाऊ रोशनी आँगन से प्रतिबिम्बित होकर आ जाती है, क्योंकि आँगन की एक ओर सामने की मकान की कोनेवाली बत्ती से रोशनी पड़ती है। बल्कि आँगन में इस जगह खड़े होकर शायद कुछ पढ़ा भी जा सके। लेकिन पढ़ने को हैं ही कुछ नहीं, यह तो ध्यान ही न रहा था!


देविन्दरलाल फिर ठिठक गए। सरकारी कंद में तो गा-चिल्ला भी सकते हैं, ‘यहाँ तो चुप रहना होगा!


उन्हें याद आया, उन्होंने पढ़ा है, जेल में लोग चिड़िया, कबूतर, गिलहरी, बिल्ली आदि से दोस्ती करके अकेलापन दूर करते हैं; यह भी न होती तो कोठरी में मकड़ी- चीटी आदि का अध्ययन करके…उन्होंने एक बार चारों ओर नजर दौड़ाई। मच्छरों से भी बन्धु-भाव हो सकता है, यह उनका मन किसी तरह नहीं स्वीकार कर पाया।


वे आँगन में खड़े होकर आकाश देखने लगे। आजाद देश का आकाश! और नीचे से, अभ्यर्थना में— जलते हुए घरों का धुआँ ! धूपेन धापयामः । लाल चन्दन रक्त चन्दन…. अचानक इन्होंने आँगन की दीवार पर एक छाया देखी—एक बिलार! उन्होंने बुलाया, “आओ, आओ!” 

पर वह वहीं बैठा स्थिर दृष्टि से ताकता रहा।

जहाँ बिलार आता है, वहाँ अकेलापन नहीं है। देविन्दरलाल ने कोठरी में जाकर विस्तरा विछाया और थोड़ी देर में निर्द्वन्द्व भाव से सो गए। दिन छिपे के वक्त केवल एक बार खाना खाता था। यों वे दो वक्त के लिए काफी होता था। उसी समय कोठरी और गैराज के लोटे भर दिए जाते थे। लाता था एक जवान लड़का, जो स्पष्ट ही नौकर नहीं था; देविन्दरलाल ने अनुमान किया कि शेख साहब का लड़का होगा। वह बोलता बिलकुल नहीं था। देविन्दरलाल ने पहले दिन पूछा था कि शहर का क्या हाल है तो उसने एक अजनबी दृष्टि से इन्हें देख लिया था। फिर पूछा कि अभी अमन हुआ है या नहीं? तो उसने नकारात्मक सिर हिला दिया था। और सब खैरियत ? तो फिर सिर हिलाया था— हाँ।


देविन्दरलाल चाहते तो खाना दूसरे वक्त के लिए रख सकते थे; पर एक बार आता तो एक बार ही खा लेना चाहिए, यह सोचकर वे डरकर खा लेते थे और बाक़ी विलार को दे देते थे। बिलार खूब हिल गया था, आकर गोद में बैठ जाता और खाता रहता, फिर हड्डी बड्डी लेकर आँगन के कोने में बैठकर चबाता रहता या ऊब जाता तो देविन्दरलाल के पास आकर घुरघुराने लगता।


इस तरह शाम कट जाती थी, रात घनी हो जाती थी। तब वे सो जाते थे। सुबह उठकर आँगन में कुछ वरजिश कर लेते थे कि शरीर ठीक रहे; बाक्री दिन कोठरी में बैठे कभी कंकड़ों से खेलते, कभी आँगन की दीवार पर बैठनेवाली गोरैया देखते कभी दूर से कबूतर से गुटरगूँ सुनते और कभी सामने के कोने से शेखजी के घर के लोगों की बातचीत भी सुन पड़ती। अलग-अलग आवाजें वे पहचानने लगे थे, और तीन-चार दिन में ही वे घर के भीतर के जीवन और व्यक्तियों से परिचित हो गए थे। एक भारी—जनाना आवाज थी— शेख साहब की बीवी की एक और तीखी जनाना आवाज़ थी जिसके स्वर में वय का खुरदरापन था घर की कोई और बुजुर्ग स्त्री; एक विनीत युवा स्वर था जो प्रायः पहली आवाज़ की ‘जैबू! जैबूनी!’ पुकार के उत्तर में बोलता था और इसलिए शेख साहब की लड़की जैबुन्निसा का स्वर था। दो मर्दानी आवाजें भी सुन पड़ती थीं एक तो आविद मियाँ की जो, शेख साहब का लड़का हुआ और यह वही लड़का है जो खाना लेकर आता है, और एक बड़ी भारी और चरवी से चिकनी आवाज जो शेख साहब की आवाज है। इस आवाज़ को देविन्दरलाल सुन तो सकते लेकिन इसकी बात के शब्दाकार कभी पहचान में न आते-दूर से तीखी आवाजों के बोल ही स्पष्ट समझ आते हैं।


जैबू की आवाज़ से देविन्दरलाल का लगाव था। घर की युवती लड़की की आवाज़ थी, इस स्वाभाविक आकर्षण से ही नहीं, वह विनीत भी थी। इसलिए। मन ही मन वे जेबुन्निसा के बारे में अपने ऊहापोह का रोमानी खेलबाड़ कहकर अपने को थोड़ा झिझक भी लेते थे, पर अक्सर वे यह भी सोचते थे कि क्या यह आवाज भी लोगों में फ़िरकापरस्ती का जहर भरती होगी? भर सकती होगी? शेख साहब पुलिस के किसी दफ्तर में शायद हेड क्लर्क हैं। देविन्दरलाल को यहाँ लाते समय रफ़ीकुद्दीन ने यही कहा था कि पुलिसियों का घर तो सुरक्षित होता है।


वह बात ठीक है, लेकिन सुरक्षित होता है इसलिए शायद बहुत से उपद्रवों की जड़ भी होता है। ऐसे घर में लोग जहर फैलानेवाले हों तो अचम्भा क्या….. लेकिन खाते वक्त भी वे सोचते, खाने में कौन-सी चीज किस हाथ की बनी होगी, परोसा किसने होगा। सुनी बातों से वे जानते थे कि पकाने में बड़ा हिस्सा तो उस तीखी खुरदरी आवाज़वाली स्त्री का रहता था, पर परोसना शायद जेबुन्निसा के ही जिम्मे था। और यही सब सोचते-सोचते देविन्दरलाल खाना खाते और कुछ ज्यादा ही खा लेते थे…


खाने में बड़ी-बड़ी मुसलमानी रोटी के बजाय छोटे-छोटे हिन्दू फुल्के देखकर देविन्दरलाल के जीवन की एकरसता में थोड़ा-सा परिवर्तन आया। मांस तो था, लेकिन आज रबड़ी भी थी जबकि पीछे मीठे के नाम पर एक-आध बार शाह टुकड़ा और एक बार फिरनी आयी थी। आबिद जब खाना रखकर चला गया, तब देविन्दरलाल क्षण-भर उसे देखते रहे। उनकी उँगलियाँ फुल्कों से खेलने-सी लगीं— उन्होंने एकाध को उठाकर फिर रख दिया; पल-भर के लिए अपने घर का दृश्य उनकी आँखों के आगे दौड़ गया। उन्होंने फिर दो-एक फुल्के उठाये और फिर रख दिये।


हठात् वे चौंके।


तीन-एक फुल्कों की तह के बीच में काग़ज की एक पुड़िया- सी पड़ी थी।


देविन्दरलाल ने पुड़िया खोली। पुड़िया में कुछ नहीं था।


देविन्दरलाल उसे फिर गोल करके फेंक देनेवाले ही थे कि हाथ ठिठक गया। उन्होंने कोठरी से आँगन में जाकर कोने में पंजों पर खड़े होकर बाहर की रोशनी में पुर्जा देखा, उस पर कुछ लिखा था केवल एक सतर-अ


“खाना कुत्ते को खिलाकर खाइएगा।”


देविन्दरलाल ने कागज की चिन्दियाँ कीं। चिन्दियों को मसला। कोठरी से गैराज में जाकर उसे गड्ढे में डाल दिया। फिर आँगन में लौट आए और टहलने लगे। मस्तिष्क ने कुछ नहीं कहा। सन्न रहा। केवल एक नाम उसके भीतर खोया-सा चक्कर काटता रहा, जैबू… जैबू जैबू..


थोड़ी देर बाद वह फिर खाने के पास जाकर खड़े हो गए।


यह उनका खाना है— देविन्दरलाल का। मित्र के नहीं, तो मित्र के मित्र के यहाँ से आया है। और उनके मेज़बान के, उनके आश्रयदाता के।


जैबू के


जैबू के पिता के ।


कुत्ता यहाँ कहाँ है?


देविन्दरलाल टहलने लगे।


आँगन की दीवार पर छाया सरकी। बिलार बैठा था। देविन्दरलाल ने बुलाया। वह लपककर कन्धे पर आ रहा। देविन्दरलाल ने उसे गोद में लिया और पीठ सहलाने लगे। वह घुरघुराने लगा। देविन्दरलाल कोठरी में गए। थोड़ी देर बिलार को पुकारते रहे, फिर धीरे-धीरे बोले, “देखो, बेटा, तुम मेरे मेहमान, मैं शेख साहब का, है न? वे मेरे साथ जो करना चाहते हैं, वहीं मैं तुम्हारे साथ करना चाहता हूँ। चाहता नहीं हूँ, पर करने जा रहा हूँ। वे भी चाहते हैं कि नहीं, पता नहीं, यही तो जानना है। इसीलिए तो मैं तुम्हारे साथ वह करना चाहता हूँ जो मेरे साथ वे पता नहीं चाहते हैं कि नहीं… नहीं, सब बात गड़बड़ हो गई। ” अच्छा, रोज मेरी जूठन तुम खाते हो, आज तुम्हारी मैं खाऊँगा। हाँ, यह ठीक है। लो, खाओ… “


बिलार ने मांस खाया। हड्डी झपटना चाहता था, पर देविन्दरलाल ने उसे गोदी में लिये-लिये ही रबड़ी खिलाई- वह सब चाट गया। देविन्दरलाल उसे गोदी में लिये सहलाते रहे।


जानवरों में तो सहज ज्ञान होता है खाद्य-अखाद्य का, नहीं तो वे बचते कैसे? सब जानवरों में होता है, और बिल्ली तो जानवरों में शायद सबसे अधिक ज्ञान के सहारे जीनेवाली है, तभी तो कुत्ते की तरह पलती नहीं… बिल्ली जो खा ले वह सर्वथा खाद्य है-यों बिल्ली बड़ी मछली खा ले जिसे इनसान न खाये वह और बात है….


सहसा बिलार ज़ोर से गुस्से से चीखा और उछलकर गोद से बाहर जा कूदा, चीखता – गुर्राता-सा कूदकर दीवार पर चढ़ा और गैराज की छत पर जा पहुँचा। वहाँ से थोड़ी देर तक उसके कानों में अपने-आपसे ही लड़ने की आवाज आती रही। फिर धीरे-धीरे गुस्से का स्वर दर्द के स्वर में परिणत हुआ, फिर एक करुण रिरियाहट में, एक दुर्बल चीख में, एक बुझती हुई-सी कराह में, फिर एक सहसा चुप हो जानेवाली लम्बी साँस में-


मर गया…. देविन्दरलाल फिर खाने को देखने लगे। वह कुछ साफ़-साफ़ दीखता हो सो नहीं; पर देविन्दरलाल जी की आँखें निःस्पन्द उसे देखती रहीं। आज़ादी भाईचारा देश-राष्ट्र….


एक ने कहा कि हम जोड़ करके रखेंगे और रक्षा करेंगे, पर घर से निकाल दिया। दूसरे ने आश्रय दिया, और विष दिया और साथ में चेतावनी कि विष दिया जा रहा है।


देविन्दरलाल का मन ग्लानि से उमड़ आया। इस धक्के को राजनीति की भुरभुरी रेत की दीवार के सहारे नहीं दर्शन के सहारे ही झेला जा सकता था। देविन्दरलाल ने जाना कि दुनिया में खतरा बुरे की ताक़त के कारण नहीं, अच्छे की दुर्बलता के कारण है। भलाई की साहसहीनता ही बड़ी बुराई है। घने बादल से रात नहीं होती, सूरज के निस्तेज हो जाने से होती है। उन्होंने खाना उठाकर बाहर आँगन में रख दिया। दो घूँट पानी पिया। फिर टहलने लगे।


तनिक देर बाद उन्होंने आकर ट्रक खोला। एक बार सरसरी दृष्टि से सब चीजों को देखा, फिर ऊपर के खाने में दो-एक काराज, दो-एक फोटो, एक सेविंग बैंक की पासबुक और एक बड़ा-सा लिफाफा निकालकर, एक काले शेरवानी-नुमा कोट की जेब में रखकर कोट पहन लिया। आँगन में आकर एक क्षण-भर कान लगाकर सुना । फिर वे आँगन की दीवार पर चढ़कर बाहर फाँद गए और बाहर सड़क पर निकल आए वे स्वयं नहीं जान सके कि कैसे!


इसके बाद की घटना, घटना नहीं है। घटनाएँ सब अधूरी होती हैं। पूरी तो कहानी होती है। कहानी की संगति मानवीय तर्क या विवेक या कला या सौन्दर्य बोध की बनाई हुई संगति मानव पर किसी शक्ति की कह लीजिए काल या प्रकृति या संयोग या दैव या भगवान की बनाई हुई संगति है। इसलिए मानव को सहसा नहीं भी दीखती। इसलिए इसके बाद जो कुछ हुआ और जैसे हुआ, वह बताना ज़रूरी नहीं। इतना बताने से काम चल जाएगा कि डेढ़ महीने बाद अपने घर का पता लेने के लिए देविन्दरलाल अपना पता देकर दिल्ली रेडियो से अपील करवा रहे थे तब एक दिन उन्हें लाहौर की मुहरवाली एक छोटी-सी चिट्ठी मिली थी।


” आप बचकर चले गए, इसके लिए ख़ुदा का लाख लाख शुक्र है मैं मनाती हूँ कि रेडियो पर जिनके नाम आपने अपील की है, वे सब सलामती से आपके पास पहुँच जाएँ अब्बा ने जो किया या करना चाहा, उसके लिए मैं माफ़ी माँगती हूँ और यह भी याद शायद दिलाती हूँ कि उसकी काट मैंने ही कर दी थी। अहसान नहीं जताती— मेरा कोई अहसान आप पर नहीं है—सिर्फ़ यह इल्तजा करती हूँ कि आपके मुल्क में अकलियत का कोई मज़लूम हो तो याद कर लीजिएगा।


इसलिए नहीं कि वह मुसलमान है, इसलिए कि आप इनसान हैं। खुदा हाफिज! ” देविन्दरलाल की स्मृति में शेखउल्लाह की चरबी से चिकनी भारी आवाज गूँज गई, “जैबू जैबू!” और फिर गैराज की छत पर छटपटाकर धीरे-धीरे शान्त होनेवाली बिलार की वह दर्द-भारी कराह, जो केवल एक लम्बी साँस बनकर चुप हो गई थी। उन्होंने चिट्ठी को छोटी-सी गोली बनाकर चुटकी से उड़ा दी।


प्रश्नोत्तरी


1.शरणदाता किसकी कहानी है?

उत्तर:- शरणदाता अज्ञेय की कहानी है।


2.अज्ञेय को किस प्रकार का कहानीकार (उपन्यासकार] माना जाता है?

उत्तर:- अज्ञेय को मनोविश्लेषणात्मक कहानीकार (उपन्यासकार) माना जाता है।



4.अज्ञेय की चार कहानियों के नाम बताओ।

उत्तर:- अज्ञेय की चार कहानियाँ निम्नलिखित हैं-

(1)हीली बोन की बतखें

(2) पठार का धीरज

(3) जयदोल

(4) रोज


5.रोज कहानी का प्राचीन नाम क्या हैं?

उत्तर:- रोज कहानी का प्राचीन नाम गैंग्रीन (जिसकी वजह से पाँव गल जाता है।


6.देवीन्दर लाल एवम् रफीकुद्दीन किस कहानी के पात्र हैं?

उत्तर:- देवीन्दर लाल एवम् रफीकुद्दीन ‘शरणदाता’ कहानी के पात्र हैं।


7.”शरणदाता” कहानी की मूल संवेदना स्पष्ट करें। उत्तर:- इस कहानी मे भारत की आज़ादी के साथ-साथ होने वाले देश विभाजन के समय की परिस्थितियों को यथार्थ रूप में दिखाया गया है। कहानी में ये बताया गया है, कि एक तरफ जहाँ मानवीय मूल्य दम तोड़ रहे थे और विश्वास शब्द काल्पनिक लगने लगा था, वहीं दूसरी तरफ उम्मीद और भरोसे का नया रूप सृजित हो रहा था। धोखे के लिए किसी एक धर्म या महजब को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि कहानी के अनुसार सभी धर्मों में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग थे। नफरत और विश्वास एक ही साथ एक ही व्यक्ति में देखे जा सकते हैं। सफेद और काले के अलावा धूसर (ग्रे) भी एक रंग होता है जो कहानी पढ़ कर पता चलता है।


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