चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ की कहानी उसने कहा था पर प्रश्नोत्तरी

 चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’: संक्षिप्त परिचय


जन्म : 1883 ई.

मृत्यु : 1922 ई.


पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी हिन्दी कहानी के वे शीर्ष पुरुष, जिन्होंने आधुनिक हिन्दी कहानी के इतिहास को न केवल नई राह ही दिखाई, बल्कि आनेवाले कथाकारों के सामने आधुनिक हिन्दी कहानी का स्थापत्य रचा, बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने कथाकार, व्यंग्यकार, निबन्धकार और सम्पादक की भूमिकाओं को बखूबी निभाया और न केवल निभाया ही वरन् उन क्षेत्रों में अपनी अद्वितीय प्रतिभा का लोहा भी मनवाया।


वे हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, प्राकृत, बांग्ला, मराठी, जर्मन तथा फ्रेंच भाषाओं के गहरे जानकार थे। उनकी रुचि धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुरातत्त्व, दर्शन, भाषा विज्ञान के साथ साहित्य और शिक्षा शास्त्र में भी रही। इसके अलावा लोककला, चित्रकला, संगीत, राजनीति और समसामयिक स्थिति के साथ रीति-रिवाज पर भी उनका व्यापक अध्ययन उनके लेखन में दिखाई देता है। वे अमर कहानी उसने कहा था के रचयिता के रूप में विश्वविश्रुत हैं। यह हिन्दी कहानी में मील का वह पहला पत्थर हैं जहाँ से आधुनिक हिन्दी कहानी की यात्रा प्रारम्भ होती है।


इस कहानी में कथाकार ने पहली बार फ्लैश बैक (पूर्वाभास शैली) का प्रयोग करते हुए निष्काम प्रेम, त्याग, वीरता और वचनबद्धता जैसे जीवन मूल्यों को शानदार ढंग से चित्रित किया है।


उसने कहा था


बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्टवालों की बोली का मरहम लगावें। जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते हुए, इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट सम्बन्ध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की उँगलियों के पोरों को चीथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और संसार भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने, नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले, तंग चक्करदार गलियों में, हर एक लड्ढी वाले के लिए ठहरकर सब्र का समुद्र उमड़ाकर, ‘बचो खालसा जी’, ‘हटो माईजी!’, ‘ठहरना भाई!’, ‘आने दो लालाजी!’, ‘हटो बाछा!” कहते हुए सफेद फेंटों, खच्चरों और बतकों, गन्ने और खोमचे और भारेवालों के जंगल में से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि ‘जी’ और ‘साहब’ बिना सुने किसी को हटना पड़े ! यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती ही नहीं, चलती हैं, पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं-


‘हट जा, जीणे जोगिए; हट जा करमावालिए; हट जा पुताँ प्यारिए; बच जा, लम्बी उमराँवालिए!’ समष्टि में इनके अर्थ हैं कि तू जीने योग्य है, तू भाग्यों वाली हैं, पुत्रों को प्यारी हैं, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिए के नीचे आना चाहती है?… बच जा।


ऐसे बम्बूकार्ट वालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दुकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिक्ख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था, और यह रसोई के लिए बड़ियाँ। दुकानदार एक परदेसी से गुँथ रहा था, जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था।


“तेरे घर कहाँ हैं?”


“मगरे में; – और तेरे?”


“मौझे में:- यहाँ कहाँ रहती है?”


” अतरसिंह की बैठक में; वे मेरे मामा होते हैं। “


“मैं भी मामा के यहाँ आया है, उनका घर गुरु बाजार में है।” इतने में दुकानदार निबटा और इनको सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनों साथ- साथ चले। कुछ दूर जाकर लड़के ने मुस्कुराकर पूछा, “तेरी कुड़माई’ हो गई?” इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ाकर ‘धत्’ कहकर दौड़ गई और लड़का मुँह


देखता रह गया।


दूसरे-तीसरे दिन सब्जीवाले के यहाँ, दूधवाले के यहाँ, अकस्मात् दोनों मिल जाते। महीना भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, “तेरी कुड़माई हो गई?” और उत्तर में वही ‘धत्’ मिला। एक दिन जब लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की, लड़के की सम्भावना के विरुद्ध बोली, “हाँ, हो गई।”


‘कब?” “कल; देखते नहीं यह रेशम से कड़ा हुआ सालू!”


लड़की भाग गई। लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में धकेल दिया, एक छाबड़ी वाले की दिन भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभी वाले के ठेले में दूध उँडेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।


2


“राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है! दिन-रात खंदकों में बैठे-बैठे हड्डियाँ अकड़ गई। लुधियाना से दस गुना जाड़ा और मेह तथा बरफ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धँसे हुए हैं। जमीन कहीं दीखता नहीं घंटे-दो घंटे में कान के पर्दे फाड़नेवाले धमाके के साथ सारी खंदक हिल जाती है और सौ-सौ गज धरती उछल पड़ती है। इस गैबी गोले से बचे तो कोई लड़े। नगरकोट का जलजला सुना था, यहाँ दिन में पच्चीस जलजले होते हैं। जो कहीं खंदक से बाहर साफा या कुहनी निकल गई तो चटाक से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए हैं वा घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं। “


“लहनासिंह और तीन दिन हैं। चार तो खंदक में बिता ही दिये। परसों ‘रिलीफ’ आ जाएगी और फिर सात दिन की छुट्टी अपने हाथों झटका’ करेंगे और पेट भर खाकर सो रहेंगे। उसी फिरंगी’ मेम के बाग में मखमल की-सी हरी घास है। फल और दूध की वर्षा कर देती है। लाख कहते हैं, दाम नहीं लेती। कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आए हो। “


“चार दिन तक पलक नहीं झपी। बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही मुझे तो संगीन चढ़ाकर मार्च का हुक्म मिल जाए। फिर सात जर्मनों को अकेला मारकर न लौटें तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो पाजी कहीं के, कलों के घोड़े, संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं, और पैर पकड़ने लगते हैं। यो अँधेरे में तीस-तीस मन के गोले फेंकते हैं। उस दिन धावा किया था—चार मील तक एक जर्मन नहीं छोड़ा था। पीछे जनरल साहब ने हट आने का कमान दिया, नहीं तो…।”


“नहीं तो सीधे बर्लिन पहुँच जाते, क्यों?” सूबेदार हजारासिंह ने मुस्कुराकर


कहा, “लड़ाई के मामले जमादार या नायक के चलाए नहीं चलते। बड़े अफसर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है। एक तरफ बढ़ गए तो क्या होगा? ” “सूबेदार जी, सच है, ” लहनासिंह बोला, “पर करें क्या? हड्डियों हड्डियों में तो जाड़ा भैंस गया है। सूर्य निकलता नहीं और खाई में दोनों तरफ से चम्बे की


बावलियों के-से सोते झर रहे हैं। एक धावा हो जाए, तो गर्मी आ जाए।” “उदमी, उठ, सिगड़ी में कोयले डाल वजीरा, तुम चार जने बाल्टियाँ लेकर खाई का पानी बाहर फेंको। लहनासिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाजे का पहरा


बदलवा दे।” यह कहते हुए सूबेदार सारी खंदक के चक्कर लगाने लगे।


वजीरासिंह पलटन का विदूषक था। बाल्टी में गँदला पानी भरकर खाई के


बाहर फेंकता हुआ बोला, “मैं पांधा बन गया हूँ। करो जर्मनी के बादशाह का


तर्पण!” इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गए।


लहनासिंह ने दूसरी बाल्टी भरकर उसके हाथ में देकर कहा, ” अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो ऐसा खाद का पानी पंजाब भर में नहीं मिलेगा।” “हाँ, देश क्या है, स्वर्ग है। मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस घुमाव जमीन


यहीं माँग लूँगा और फलों के बूटेर लगाऊँगा।” “लाड़ी होरी को भी यहाँ बुला लेंगे? या वही दूध पिलानेवाली फिरंगी मेम….”


‘चुप कर। यहाँ वालों को शरम नहीं ।”


‘देश देश की चाल है। आज तक मैं उसे समझा नहीं सका कि सिक्ख तम्बाकू नहीं पीते। वह सिगरेट देने में हठ करती है, होंठों में लगाना चाहती है। और मैं पीछे हटता हूँ तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क के लिए लड़ेगा नहीं।”


‘अच्छा, अब बोधासिंह कैसा है?”


‘अच्छा है।”


‘जैसे मैं जानता ही न होऊँ ! रात-भर तुम अपने दोनों कम्बल उसे उढ़ाते हो और आप सिगड़ी के सहारे गुजर करते हो उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो अपने सूखे लकड़ी के तख्तों पर उसे सुलाते हो, आप कीचड़ में पड़े रहते हो। कहीं तुम न माँदे पड़ जाना जाड़ा क्या है— मौत है, और निमोनिया से मरनेवालों को मुरब्बे नहीं मिला करते।” 

“मेरा डर मत करो। मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूँगा। भाई कीरतसिंह की गोद में मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाए हुए आँगन के आम के पेड़ की छाया होगी।”


वजीरासिंह ने त्यौरी चढ़ाकर कहा, “क्या मरने-मराने की बात लगाई है? मरें जर्मन और तुरक! हाँ भाइयो, कुछ गाओ! ” सारी खंदक गीत से गूंज उठी और सिपाही फिर ताजे हो गए, मानो चार दिन से सोते और मौज हो करते रहे हों।


3


दो पहर रात हो गई। अँधेरा है सन्नाटा छाया हुआ है। बोधासिंह खाली बिस्कुटों के तीन टोनों पर अपने कम्बल बिछाकर और लहनासिंह के दो कम्बल और एक बरानकोट ओढ़कर सो रहा है। लहनासिंह पहरे पर खड़ा हुआ है। एक आँख खाई के मुख पर है और एक बोधासिंह के दुबले शरीर पर। बोधासिंह कराहा।


“क्यों बोधा भाई, क्या है?”


“पानी पिला दो।”


लहनासिंह ने कटोरा उसके मुँह से लगाकर पूछा, “कहो, कैसे हो?’ पानी पीकर बोधा बोला, “कंपनी’ छूट रही है। रोम-रोम में तार दौड़ रहे हैं।


दाँत बज रहे हैं।”


‘अच्छा, मेरी जरसी पहन लो।”


“और तुम?”


“मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है, पसीना आ रहा है।” “ना, मैं नहीं पहनता, चार दिन से तुम मेरे लिए…”


“हाँ, याद आई। मेरे पास दूसरी गरम जरसी है। आज सबेरे ही आई है। विलायत से मेमें बुन-चुनकर भेज रही हैं। गुरु उनका भला करें।” यों कहकर लहना अपना कोट उतारकर जरसी उतारने लगा।


“सच कहते हो?”


” और नहीं झूठ! ” यों कहकर नाहीं करते बोधा को उसने जबरदस्ती जरसी


पहना दी और आप खाकी कोट और जीन का कुरता भर पहनकर पहरे पर जा खड़ा हुआ। मेम की जरसी की कथा केवल कथा थी। “


आधा घंटा बीता। इतने में खाई के मुँह से आवाज आई, ” सूबेदार हजारासिंह!”

“कौन, लपटन साहब? हुकुम हुजूर!” कहकर सूबेदार तनकर फौजी सलाम करके सामने हुआ।


“देखो, इसी समय धावा करना होगा। मील-भर की दूरी पर पूरब के कोने में एक जर्मन खाई है। उसमें पच्चास से जियादह जर्मन नहीं हैं। इन पेड़ों के नीचे दो खेत काटकर रास्ता है। तीन-चार घुमाव हैं जहाँ मोड़ है, वहाँ पन्द्रह जवान खड़े कर आया हूँ। तुम यहाँ दस आदमी छोड़कर सबको साथ ले उनसे जा मिलो। खंदक छीनकर वहीं, जब तक दूसरा हुक्म न मिले, डटे रहो। हम यहाँ रहेगा।”


” जो हुकुम।”


चुपचाप सब तैयार हो गए। बोधा भी कम्बल उतारकर चलने लगा, तब लहनासिंह ने उसे रोका। लहनासिंह आगे हुआ तो बोधा के बाप सूबेदार ने उँगली से बोधा की ओर इशारा किया। लहनासिंह समझकर चुप हो गया। पीछे दस आदमी कौन रहें, इस पर बड़ी हुज्जत हुई। कोई रहना नहीं चाहता था। समझा-बुझाकर सूबेदार ने मार्च किया। लपटन साहब लहना की सिगड़ी के पास मुँह फेरकर खड़े हो गए और जेब से सिगरेट निकालकर सुलगाने लगे। दस मिनट बाद उन्होंने लहना की ओर हाथ बढ़ाकर कहा, “लो, तुम भी पियो। “


आँख मारते-मारते लहनासिंह सब समझ गया। मुँह का भाव छिपाकर बोला, “लाओ, साहब।” हाथ आगे करते ही उसने सिगड़ी के उजाले में साहब का मुँह देखा। बाल देखे। तब उसका माथा ठनका। लपटन साहब के पट्टियों वाले बाल एक दिन में कहाँ उड़ गए और उनकी जगह कैदियों से कटे हुए बाल कहाँ से आ गए? शायद शराब पिए हुए हैं और उन्हें बाल कटवाने का मौका मिल गया है।


लहनासिंह ने जाँचना चाहा। लपटन साहब पाँच वर्ष से उसकी रेजीमेंट में थे। ” क्यों साहब, हम लोग हिन्दुस्तान कब जाएँगे?’


“लड़ाई खत्म होने पर क्यों, क्या यह देश पसन्द नहीं?” “नहीं साहब, शिकार के वे मजे यहाँ कहाँ? याद है, पारसाल नकली लड़ाई के


पीछे हम-आप जगाधरी के जिले में शिकार करने गए थे?” “हाँ-हाँ”-” वहीं जब आप खोते’ पर सवार थे और आपका खानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मंदिर में जल चढ़ाने को रह गया था।” “बेशक, पाजी कहीं का”” सामने से वह नीलगाय निकली कि ऐसी बड़ी मैंने कभी न देखी थी, और आपकी एक गोली कन्धे में लगी और पुट्ठे में निकली। ऐसे अफसर के साथ शिकार खेलने में मजा आता है।


क्यों साहब! शिमले से तैयार होकर उस नीलगाय का सिर आ गया था न? आपने कहा था कि रेजीमेंट की मैस में लगाएँगे।” “हाँ, पर मैंने वह विलायत भेज दिया!” “ऐसे बड़े-बड़े सींग दो-दो फुट के तो होंगे?”


“हाँ, लहनासिंह, दो फुट चार इंच के थे। तुमने सिगरेट नहीं पीया ?”

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“पीता हूँ साहब, दियासलाई ले आता हूँ।” कहकर लहनासिंह खंदक में घुसा। अब उसे सन्देह नहीं रहा था। उसने झटपट निश्चय कर लिया था कि क्या करना चाहिए।


अँधेरे में किसी सोनेवाले से वह टकराया।


“कौन? वजीरासिंह?” “हाँ, क्यों लहना? क्या कयामत आ गई? जरा तो आँख लगने दी होती!”


“होश में आओ। कयामत आई है और लपटन साहब की वर्दी पहनकर आई है। ” ” क्या?”


“लपटन साहब या तो मारे गए हैं या कैद हो गए हैं। उनकी वर्दी पहनकर यह कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुँह नहीं देखा। मैंने देखा और बातें की हैं। सौहरा साफ उर्दू बोलता है, पर किताबी उर्दू और मुझे पीने को सिगरेट दिया है।” ” तो अब?”


” अब मारे गए, धोखा सूबेदार कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई


पर धावा होगा। उधर उन पर खुले में धावा होगा। उठो, एक काम करो। पलटन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गए होंगे। सूबेदार से


कहो कि एकदम लौट आएँ। खंदक की बात झूठ है चले जाओ खंदक के पीछे


से निकल जाओ। पत्ता तक न खड़के। देर मत करो। “


“हुकुम तो यह है कि यहीं… “


“ऐसी-तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम — जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहाँ सबसे बड़ा अफसर है, उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की खबर लेता हूँ।” “पर यहाँ तो तुम आठ ही हो।”


‘आठ नहीं, दस लाख। एक-एक अकालिया सिक्ख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।”


लौटकर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खंदक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार-सा बाँध दिया। तार के आगे सूत की एक गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी पर रखने ही वाले थे….


बिजली की तरह दोनों हाथों से उल्टी बन्दूक को उठाकर लहनासिंह ने साहब की कोहनी पर तानकर दे मारा। धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी। लहनासिंह ने एक कुंदा साहब की गर्दन पर मारा और साहब ‘आख! मीन गौट्ट’।’ कहते हुए चित हो गए। लहनासिंह ने तीनों गोले बीनकर खंदक के बाहर फेंके और साहब को घसीटकर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफाफे और एक डायरी निकालकर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया।


साहब की मूर्च्छा हटी। लहनासिंह हँसकर बोला, “क्यों, लपटन साहब! मिजाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं। यह सीखा कि सिक्ख सिगरेट पीते हैं। यह सीखा कि जगाधरी के जिले में नीलगाएँ होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियों पर जल चढ़ाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं। पर यह तो कहो, ऐसी साफ उर्दू कहाँ से सीख आए? हमारे लपटन साहब बिना ‘डैम’ के पाँच लफ्ज भी नहीं बोल सकते थे।” लहना ने पतलून की जेबों की तलाशी नहीं ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए दोनों हाथ जेबों में डाले।


लहनासिंह कहता गया, “चालाक तो बड़े हो, पर माझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिए चार आँखें चाहिए। तीन महीने हुए, एक तुरकी मौलवी मेरे गाँव में आया था। औरतों के बच्चे होने के तावीज बाँटता था और बच्चों को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजार बिछाकर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं। वेद पढ़ पढ़कर उसमें से विमान चलाने की विद्या जान गए हैं। गौ को नहीं मारते। हिन्दुस्तान में आ जाएँगे तो गौहत्या बन्द कर देंगे। मंडी के बनियों को बहकाता था कि डाकखाने से रुपए निकाल लो, सरकार का राज जानेवाला है। डाक बाबू पोल्हूराम भी डर गया था। मैंने मुल्ला जी की दाढ़ी मूँड़ दी थी और गाँव से बाहर निकालकर कहा था कि जो मेरे गाँव में अब पैर रखा तो….”


साहब की जेब से पिस्तौल चला और लहना की जाँघ में गोली लगी। इधर लहना की हैनरी मार्टिनी के दो फायरों ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी। धड़ाका सुनकर सब दौड़ आए।


बोधा चिल्लाया, “क्या है?” लहनासिंह ने उसे यह कहकर सुला दिया कि ‘एक हड़का हुआ कुत्ता आया


‘था, मार दिया’, और, औरों से सब हाल कह दिया। सब बन्दूकें लेकर तैयार हो गए। लहना ने साफा फाड़कर घाव के दोनों ओर पट्टियाँ कसकर बाँधीं। घाव मांस में ही था। पट्टियों के कसने से लहू निकलना बन्द हो गया।


इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े। सिक्खों की बन्दूकों की बाढ़ ने पहले धावे को रोका, दूसरे को रोका, पर यहाँ थे आठ (लहनासिंह तक- तककर मार रहा था—वह खड़ा था, और सब लेटे हुए थे और वे सत्तर। अपने मुर्दा भाइयों के शरीर पर चढ़कर जर्मन आगे घुस आते थे। थोड़े-से मिनटों में वे….


अचानक आवाज आई, ‘वाह गुरुजी दी फतह ! वाह गुरुजी दा खालसा !! ” और धड़ाधड़ बन्दूकों के फायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौके पर जर्मन चक्की के दो पाटों के बीच में आ गए। पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालों ने भी संगीन पिरना शुरू कर दिया।


एक किलकारी और अकाली सिक्ख दी फौज आई ! वाह गुरुजी दी फतह ! वाह गुरुजी दा खालसा!! सत श्री अकाल पुरुष!!! और लड़ाई खत्म हो गई। तिरसट जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिक्खों में पन्द्रह के प्राण गए। सूबेदार के दाहिने कन्धे में से गोली आर-पार निकल गई। लहनासिंह की पसली में एक गोली लगी। उसने घाव को खंदक की गीली मिट्टी से पूर लिया और बाकी का साफा कसकर कमरबन्द की तरह लपेट लिया। किसी को खबर न हुई कि लहना को दूसरा घाव — भारी घाव लगा है।


लड़ाई के समय चाँद निकल आया था – ऐसा चाँद जिसके प्रकाश से संस्कृत कवियों का दिया हुआ ‘क्षयी’ नाम सार्थक होता है और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा में ‘दंतवीणोपदेशाचार्य’ कहलाती है। वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मन-भर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी, जब मैं दौड़ा-दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिंह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर उसकी तुरन्त बुद्धि को सराह रहे थे और कह रहे थे कि तू न होता तो आज सब मर जाते।


इस लड़ाई की आवाज तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी। उन्होंने टेलीफोन कर दिया था। वहाँ से झटपट दो डॉक्टर और बीमार ढोने की गाड़ियाँ चलीं, जो कोई डेढ़ घंटे के अन्दर अन्दर आ पहुँचीं। फील्ड अस्पताल नजदीक था। सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जाएँगे, इसलिए मामूली पट्टी बाँधकर एक गाड़ी में घायल लिटाए गए और दूसरी में लाशें रखी गई। सूबेदार ने लहनासिंह की जाँघ में पट्टी बँधवानी चाही, पर उसने यह कहकर टाल दिया कि थोड़ा घाव हैं, सवेरे देखा जाएगा। बोधासिंह ज्वर में बर्रा रहा था। वह गाड़ी में लिटाया गया। लहना को छोड़कर सूबेदार जाते नहीं थे। यह देख लहना ने कहा, “तुम्हें बोधा की कसम है, और सुबेदारनी जी की सौगन्ध है जो इस गाड़ी में न चले जाओ।”


” और तुम?”


“मेरे लिए वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना, और जर्मन मुर्दों के लिए भी तो गाड़ियाँ आती होंगी। मेरा हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं, मैं खड़ा हूँ? वजीरासिंह मेरे पास ही है।” ‘अच्छा, पर…’


“ बोधा गाड़ी पर लेट गया। भला! आप भी चढ़ जाओ। सुनिए तो, सूबेदारनी होरों को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उसने कहा था, वह मैंने कर दिया।”


गाड़ियाँ चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते चढ़ते लहना का हाथ पकड़कर कहा, ” तूने मेरे और बोधा के प्राण बचाए हैं लिखना कैसा? साथ ही घर चलेंगे अपनी सूबेदारनी को तू ही कह देना, उसने क्या कहा था?”


“अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैंने जो कहा, वह लिख देना, और कह भी देना।” गाड़ी के जाते ही लहना लेट गया, “बजीरा, पानी पिला दे और मेरा कमरबन्द खोल दे। तर हो रहा है।”


5


मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है। जन्म-भर की घटनाएँ एक- एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यों के रंग साफ होते हैं, समय की धुंध बिलकुल उन पर से हट जाती है।


लहनासिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है। दहीवाले के यहाँ, सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं, उसे एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है, ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ तब ‘धत्’ कहकर वह भाग जाती है। एक दिन उसने वैसा ही पूछा तो उसने कहा, ‘हाँ, कल हो गई। देखते नहीं, यह रेशम के बूटों वाला सालू?’ सुनते ही लहनासिंह को दुःख हुआ। क्रोध हुआ क्यों हुआ? ” वजीरासिंह, पानी पिला दे।”


पच्चीस वर्ष बीत गए। अब लहनासिंह नं. 77 राइफल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा। न मालूम वह कभी मिली थी या नहीं? सात दिन की छुट्टी लेकर जमीन के मुकदमे की पैरवी करने वह अपने घर गया। वहाँ रेजिमेंट के अफसर की चिट्ठी मिली कि फौज लाम पर जाती है, फौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिट्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं। लौटते हुए हमारे घर होते जाना। साथ ही चलेंगे। सूबेदार का गाँव रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा।


जब चलने लगे तब सूबेदार बेड़े में से निकलकर आया बोला, ‘लहना! सूबेदारनी तुमको जानती है, बुलाती है। जा, मिल आ।’


लहनासिंह भीतर पहुँचा। सूबेदारनो मुझे जानती है? कब से? रेजिमेंट के क्वार्टरों में कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं दरवाजे पर जाकर मत्था टेकना’ कहा। ‘असीस सुनी।’


लहनासिंह चुप ।


‘मुझे पहचाना?’


‘नहीं।’


‘तेरी कुड़माई हो गई? – धत्— कल हो गई—देखते नहीं, रेशमी बूटों वाला


सालू-अमृतसर में—’ भावों की टकराहट से मूर्च्छा खुली। करवट बदली, पसली का घाव बह निकला।


” वजीरा, पानी पिला, ” उसने कहा था।


स्वप्न चल रहा है। सूबेदारनी कह रही है, ‘मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूँ। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर में जमीन दी है, आज नमक हलाली का मौका आया है। पर सरकार ने हम तीमियों की एक घघरिया पलटन क्यों न बना दी, जो मैं भी सूबेदार जी के साथ चली जाती ? एक बेटा है। फौज में भर्ती हुए उसे एक ही बरस हुआ। उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी नहीं जिया’ सूबेदारनी रोने लगी।


‘अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग तुम्हें याद है, एक दिन टाँगे वाले का घोड़ा दहीवाले की दुकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाए थे। आप घोड़े की लातों में चले गए थे और मुझे उठाकर दुकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना, यह मेरी भिक्षा है तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ।’ रोती रोती सुबेदारनी ओबरी’ में चली गई। लहना भी आँसू पोंछता हुआ बाहर


आया। “बजीरासिंह, पानी पिला, उसने कहा था। H


लहना का सिर गोद में रखे वजीरासिंह बैठा है। जब माँगता है, तब पानी पिला देता है। आध घंटा तक लहना चुप रहा, फिर बोला, “कौन! कीरतसिंह?”


वजीरासिंह ने कुछ समझकर कहा, “हाँ।”


“भइया, मुझे और ऊँचा कर ले। अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले। “


वजीरा ने वैसा ही किया।


“हाँ, अब ठीक है। पानी पिला दे । बस, अबके हाड़’ में यह आम खूब फलेगा। चाचा-भतीजा दोनों यहीं बैठकर आम खाना जितना बड़ा तेरा भतीजा है उतना ही यह आम है। जिस महीने उसका जन्म हुआ था, उसी महीने में मैंने इसे लगाया था।”


वजीरासिंह के आँसू टप टप टपक रहे थे।


कुछ दिन पीछे लोगों ने अखबारों में पढ़ा फ्रांस और बेल्जियम, 68वीं सूची- मैदान में घावों से मरा-नं. 77 सिक्ख राइफल्स, जमादार लहनासिंह।


प्रश्नोत्तरी 


1.”उसने कहा था” कहानी के लेखक कौन हैं?


उत्तर:-” उसने कहा था” कहानी के कहानीकार चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ है।

2.” उसने कहा था” कहानी का नायक कौन है?


उत्तर-” उसने कहा था” कहानी का नायक लहना सिंह है।


3 “उसने कहा था” कहानी का संदेश/ उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:- कहानीकार चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने इस कहानी में प्रेम के उदात्त रूप का चित्रण करते हुए प्राप्त करने की किसी भी लालसा से रहित त्याग और बलिदान का रूप दिखाया है। इस कहानी मे “प्लेटॉनिक लव” को भी किया महसूस जा सकता है।

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